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पड़ताल: सबक देते फ्रांस के दंगे, अपने ही पड़ोस की बर्बादी के लिए उकसाता युवाओं का विद्रोह

फ्रांस्वा ड्युबे
Updated Mon, 10 Jul 2023 08:19 AM IST

सार

फ्रांस में पिछले चालीस साल में हुए शहरी विद्रोहों में ऐसे युवाओं का गुस्सा हावी रहा है, जो शासन और देश के प्रतीकों- जैसे, टाउन हॉल, सामाजिक केंद्रों, स्कूलों और दुकानों को अपना निशाना बनाते रहे हैं। यह ऐसा गुस्सा है, जो सबके सामने लोगों को अपने ही पड़ोस को नष्ट कर देने के लिए उकसाता है।
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फ्रांस में विरोध-प्रदर्शन। - फोटो : सोशल मीडिया


फ्रांस में पिछले चालीस साल में हुए शहरी विद्रोहों में ऐसे युवाओं का गुस्सा हावी रहा है, जो शासन और देश के प्रतीकों-जैसे, टाउन हॉल, सामाजिक केंद्रों, स्कूलों और दुकानों को अपना निशाना बनाते रहे हैं। यह ऐसा गुस्सा है, जो सबके सामने लोगों को अपने ही पड़ोस को नष्ट कर देने के लिए उकसाता है। सभी नागरिक ऐसी हरकतों की निंदा करते हैं, लेकिन यह भी समझ सकते हैं कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है। निर्वाचित प्रतिनिधि, संघ, चर्च और मस्जिदें, सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षक अपनी लाचारी स्वीकार कर लेते हैं और इससे एक संस्थागत और राजनीतिक खालीपन सामने आता है।


ऐसे सभी विद्रोहों में, 1981 की 'समर ऑफ मिंगुएत' में भड़का विद्रोह ही एकमात्र था, जिसने सामाजिक आंदोलन का रास्ता दिखाया था। दिसंबर, 1983 में समानता और नस्लवाद के खिलाफ जो मार्च निकला था, वह इसी का परिणाम था। इसमें एक लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए थे और मीडिया ने इसे प्रमुखता से जगह दी थी। फ्रांस में यह अपनी तरह का पहला प्रदर्शन था। इसके बाद अभी तक ऐसा कोई आंदोलन उभरता नहीं दिखा है।


हर दंगे में राजनेता वही पुरानी घिसी-पिटी भूमिकाएं निभाने के लिए तत्पर रहते हैं। दक्षिणपंथी हिंसा की निंदा करते हैं, आस-पड़ोस और पुलिस का शिकार हुए लोगों को कलंक ठहराने लगते हैं, वामपंथी अन्याय की निंदा करते हैं और सामाजिक नीतियों का वादा करते हैं। साल 2005 में तब के आतंरिक मामलों के मंत्री निकोलस सरकोजी पुलिस के पक्ष में खड़े थे। फ्रांस के मौजूदा राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने नेंतेरे में पुलिस की गोली से मारे गए लड़के के लिए सहानुभूति जताई है, पर संबंधित पड़ोसी इलाकों में राजनेताओं और राष्ट्रपति की बात शायद ही लोग सुनते हैं। हम तब तक चुप्पी साधे रहते हैं, जब तक कि बॉनलिए (फ्रांस के उपनगर) और यहां की पुलिस की समस्याओं को व्यापक रूप से समाज फिर से नहीं खोजने लगता। फ्रांस के शहरी इलाकों में बार-बार भड़कने वाले दंगों और उनके परिदृश्यों से कुछ आसान सबक मिलते हैं। पहला तो यही कि देश की शहरी नीतियां अपने लक्ष्यों से चूक जाती हैं। पिछले चालीस वर्षों में आवास और सुविधाओं के लिए काफी कोशिशें हुईं। अपार्टमेंट बेहतर गुणवत्ता वाले हैं, सामाजिक केंद्र, स्कूल और कॉलेज हैं, सार्वजनिक परिवहन है। दूसरी ओर, लाभ से वंचित उपनगरों की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता में गिरावट आई है। ज्यादातर लोग गरीब या आर्थिक रूप से असुरक्षित हैं और या तो वे अप्रवासियों के वशंज हैं या स्वयं अप्रवासी हैं।


सबसे पहले, जो लोग जल्दी बॉनलिए छोड़ कर जा सकते हैं, उन्हें अवसर और संसाधन दिए जाते हैं और ऐसा सिर्फ तभी किया जाता है, जब दूर के गरीब लोगों को वहां बसाया जाता है। इस तरह बनाए माहौल से जहां स्थितियां सुधर रही हैं, वहां सामाजिक हालात भी बेहतर हो रहे हैं। हालांकि हो सकता है, सुविधाओं से वंचित इलाकों के बारे में लोग बात करने को इच्छुक न हों, पर यहां काम करने वाली एक सामाजिक प्रक्रिया को वास्तव में एक यहूदी बस्ती में देखा जा सकता है, जहां पड़ोसी इलाकों और उनके माहौल के बीच बढ़ती खाई साफ है, पर यह बस्ती भीतर से मजबूत और आत्म-नियंत्रित है। नकदी और स्थानीय प्रतिनिधियों की सदिच्छा के बावजूद लोग समाज से बहिष्कृत सिर्फ इसलिए महसूस करते हैं, क्योंकि उनके मूल, संस्कृति या धर्म अलग हैं। सामाजिक नीतियों और प्रतिनिधियों के काम के बाद भी बस्तियों के पास अपने संस्थागत या राजनीतिक संसाधन नहीं हैं। जबकि अक्सर कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले उपनगरों को वाम झुकाव वाले राजनीतिक दलों, ट्रेड यूनियनों और लोकप्रिय शिक्षा आंदोलनों के मजबूत समर्थन से काफी लाभ मिला है, मगर आज के उपनगरों के पास शायद ही अपना कोई नेता है, जो आवाज उठाए।


सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षकों की सदिच्छा में कोई कमी नहीं है, लेकिन ज्यादातर लोग वहां नहीं रहते, जहां ये लोग काम करते हैं। यह दूरी दोनों तरीके से काम करती है और पिछले दिनों हुए दंगों से पता चला है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों और एसोसिएशनों की ऐसी बस्तियों पर कोई पकड़ नहीं रह गई है, जहां लोग अपने को बेसहारा महसूस करते हैं। शांति की अपीलों की अनसुनी की जा रही है। यह दरार सिर्फ सामाजिक ही नहीं, राजनीतिक भी है। हम तेजी से नौजवानों को पुलिस के साथ जूझते हुए देख रहे हैं। दोनों समूह अपनी-अपनी नफरतों और इलाकों के साथ 'गिरोह' की तरह काम कर रहे हैं। ऐसे में राज्य कानूनी हिंसा और नौजवान अपने वास्तविक या संभावित अपराध के दायरे में सिमट कर रह गए हैं। पुलिस को इस आधार पर मशीनी रूप से नस्लवादी माना जा रहा है कि कोई भी नौजवान पहली नजर में संदिग्ध होता है। नौजवान पुलिस से नफरत करते हैं, इससे पुलिस नस्लवाद और युवा हिंसा को बढ़ावा मिलता है।


ऐसा युद्ध आमतौर पर बहुत ही निचले स्तर पर खेला जाता है। जब कोई नौजवान मारा जाता है, तो हर जगह हर चीज में विस्फोट हो जाता है। लेकिन इस बार ऐसी दुखद पुनरावृत्ति में कुछ नया है। पहला तो दक्षिणपंथ का उदय है, जो राजनीतिक परिदृश्य के सिर्फ एक तरफ ही नहीं है। विद्रोह के नस्लवादी कारण तेजी से उभर रहे हैं, जो बर्बरता और आप्रवासन की बात कर रहे हैं और इस बात का डर है कि इससे चुनावी कामयाबी मिल सकती है। दूसरा यह कि राजनीतिक वामपंथ को राजनीतिक और बौद्धिक तौर पर लकवा मार गया है। ऐसा नहीं लगता कि इसने पुलिस सुधार के अलावा किसी तरह का कोई राजनीतिक हल सुझाया हो।
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जब तक बाहरी बस्तियों की उपेक्षा होती रहेगी, जब तक फ्रांस के नौजवानों और सुरक्षा बलों में टकराव होता रहेगा, तब तक यह देख पाना मुश्किल होगा कि पुलिस की अगली चूक और उसके बाद होने वाले दंगे न हों।   -समाजशास्त्री, एमेरिटस प्रोफेसर, यूनिवर्सिटी द बोरदो। (द कन्वर्सेशन)

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