काफी अरसे से तरह-तरह के जीवाणु यानी बैक्टीरियाई संक्रमण के चलते असरकारक एंटीबायोटिक्स बेहतर विकल्प के रूप में आए जरूर, लेकिन संक्रमित जीवाणु भी अपनी फितरत बदलकर दोगुनी चुनौती बनते गए। ये बैक्टीरिया एंटीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर नए सुपरबग्स पैदा करने लगे और एंटीबायोटिक्स भी बेअसर होने लगे। मेडिकल पत्रिका लैंसेट ने कुछ समय पहले भारत और पाकिस्तान के एक बैक्टीरिया से बचने के लिए आगाह कर चेताया कि सुपरबग पर एंटीबायोटिक्स का कोई असर नहीं होता। लेकिन इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने सुपरबग के हौवे को भारत में इलाज के लिए विदेशियों के झुकाव से होने वाले मेडिकल टूरिज्म को प्रभावित करने और विदेशी दवाओं को भारत में बेचने की बाहरी कंपनियों की चाल बताया। इस बारे में सबसे पहले ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने ही लैंसेट की एक रिपोर्ट में सुपरबग का नाम नई दिल्ली सुपरबग-1 देकर दुनिया में डर फैलाया था।
दरअसल, विदेश के मुकाबले भारत में इलाज सस्ता है, जिससे लाखों विदेशी आने लगे और अरबों रुपये के सस्ते इलाज का कारोबार होने लगा। यह साजिश भारत के खिलाफ एक तरह का डर भी पैदा करने में काफी हद तक सफल रही। भारत ने इसे गंभीरता से लिया और यह मानकर कि भारत में सुपरबग खतरा न बने, इस पर अपनी कोशिशें शुरू कर कामयाबी की ओर बढ़ने लगा। चेन्नई की एक फार्मा कंपनी ने एनमेटाजोबैक्टम नाम की इंजेक्शन वाली दवा विकसित की, जो देश की पहली एंटीमाइक्रोबायल है, जो मूत्र नलिका संक्रमण, न्यूमोनिया और रक्त प्रवाह के रोगों में जबर्दस्त असरकारक है। यह दवा सीधे संक्रमण पर प्रहार कर जबर्दस्त काम करती है। इसके अलावा मुंबई की भी एक प्रतिष्ठित फार्मा कंपनी नए एंटीबायोटिक के सफल परीक्षण पर पहुंची है। बंगलूरू की भी एक प्रतिष्ठित फार्मा कंपनी भी इस दिशा में तेजी से काम कर रही है। अब वह दिन दूर नहीं, जब भारत में ही विकसित और दुनिया भर के लिए उपयोगी एंटीबायोटिक्स न केवल सुपरबग, बल्कि दूसरे घातक बैक्टीरियल संक्रमणों के लिए भी वरदान साबित होंगे।