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क्रिकेट के खेल में सुधार के लिए

Wed, 20 Jul 2016 12:37 PM IST
धर्मेंद्रपाल सिंह
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धर्मेंद्रपाल सिंह
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सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) और उसकी राज्य इकाइयों को पारदर्शिता, जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन के कड़े नियमों से बांध दिया है, जिस कारण अगले छह माह के भीतर देश में क्रिकेट की सूरत बदल जाएगी। सर्वोच्च अदालत ने लोढ़ा समिति की अधिकांश सिफारिशों पर अपनी मोहर लगा दी है। नए नियमों के अनुसार, अब एक राज्य से केवल एक इकाई को मान्यता मिलेगी, मंत्री या नौकरशाह बीसीसीआई के पदाधिकारी नहीं बन पाएंगे और न ही सत्तर वर्ष से ज्यादा का कोई व्यक्ति बोर्ड में किसी कुर्सी की 'शोभा' बढ़ा सकेगा। 'एक व्यक्ति एक पद' का सिद्धांत सख्ती से लागू होगा तथा कोई पदाधिकारी लगातार दो कार्यकाल का 'सुख' नहीं भोग पाएगा। न ही कोई व्यक्ति तीन से अधिक बार चुनाव लड़ सकेगा। इसके अलावा खिलाड़ियों की एसोसिएशन के प्रतिनिधियों को भी पहली बार बोर्ड बैठकों में भाग लेने का अधिकार दिया गया है। साथ ही वित्तीय लेन-देन पर नज़र रखने के लिए कंट्रोलर ऐंड ऑडिटर जनरल का एक प्रतिनिधि बीसीसीआई में मौजूद रहेगा।
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इस आदेश के बाद अब शरद पवार, एन श्रीनिवासन और निरंजन शाह जैसे बुजुर्गों को बोर्ड की राजनीति से संन्यास लेना पड़ेगा और महाराष्ट्र और गुजरात का रुतबा कम हो जाएगा। अभी इन दोनों सूबों से तीन-तीन सदस्य हैं, जो घटकर एक-एक रह जाएंगे। भविष्य में रेलवे, सेना, विश्वविद्यालय, क्रिकेट क्लब ऑफ़ इंडिया (मुंबई) तथा नेशनल क्रिकेट क्लब (कोलकाता) पूर्ण नहीं, सहायक सदस्य होंगे तथा बीसीसीआई के सदस्यों की संख्या भी घटकर 21 रह जाएगी। एक व्यक्ति एक पद फॉर्मूले पर अमल के चलते मौजूदा अध्यक्ष अनुराग ठाकुर सहित कई पदाधिकारियों पर गाज गिरेगी।

इस ऐतिहासिक फैसले के बाद पिछले 88 बरस से क्रिकेट का कारोबार चला रही बीसीसीआई के पैरों में बेड़ियां पड़ गई हैं। समय-समय पर बोर्ड की कारगुजारियों का भंडाफोड़ होता रहता था। इसका पुख्ता प्रमाण 2013 में इंडियन प्रीमियम लीग के दौरान तब मिला, जब मैच फिक्सिंग और सट्टेबाजी के काले कारनामे सामने आए, जिससे देश के करोड़ों खेल प्रेमी हतप्रभ रह गए। बीसीसीआई के आला अधिकारी दोषियों को सजा देने के बजाय उन्हें बचाने की जुगत लड़ाते दिखे, जिसके विरोध में कुछ लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। अंततः मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा।
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सुप्रीम कोर्ट ने सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग के दोषियों की पहचान के लिए मुद्गल समिति गठित कर दी, जिसकी रिपोर्ट के आधार पर आईपीएल की दो टीम निलंबित की गईं तथा एन. श्रीनिवासन को बीसीसीआई अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा। फिरबोर्ड की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए अदालत ने जस्टिस आर.एन. लोढ़ा की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय पैनल गठित किया, जिसकी रिपोर्ट इस वर्ष के शुरू में आई। लोढ़ा समिति की क्रांतिकारी सिफारिशों से हड़कंप मच गया। उसके खिलाफ तुरंत सुप्रीम कोर्ट में अपील करके कहा गया कि लोढ़ा पैनल की बात मानने से क्रिकेट का खेल चौपट हो जाएगा। उसी मामले में अदालत का यह फैसला आया है, जिस पर अमल के लिए बीसीसीआई को छह माह की मोहलत दी गई है। निगरानी का जिम्मा जस्टिस लोढ़ा को सौंपा है। अब बोर्ड के पास सीमित विकल्प हैं। या तो वह अदालती आदेश मान ले या सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करे। वैसे राहत मिलने की संभावना बहुत क्षीण है।
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