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कुपोषण से मुक्ति के लिए व्यापक कदम उठाने की जरूरत

पत्रलेखा चटर्जी, वरिष्ठ पत्रकार Published by: पत्रलेखा चटर्जी Updated Mon, 23 Sep 2019 07:32 AM IST
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पत्रलेखा चटर्जी, वरिष्ठ पत्रकार - फोटो : a

देश का मध्यवर्ग कुपोषण पर तभी बात करता है, जब इससे मौतें होती हैं। वर्ष 2017 में झारखंड में ग्यारह साल की एक लड़की संतोषी भात के लिए रो-रोकर मर गई। उसके परिवार के पास थोड़ा-सा भी चावल नहीं था। भोजन के अधिकार से जुड़े स्थानीय कार्यकर्ताओं के मुताबिक, संतोषी के परिवार का राशन कार्ड रद्द कर दिया गया था, क्योंकि वह उनके आधार नंबर से जुड़ा हुआ नहीं था। चूंकि दुर्गा पूजा के समय स्कूल में छुट्टी थी,  इसलिए मिड डे मील मिलने का सवाल ही नहीं था। कहते हैं कि एक सप्ताह तक संतोषी को खाने के लिए घर में लगभग कुछ नहीं मिला। हालांकि स्थानीय अधिकारियों का कहना था कि संतोषी की मौत भूख से नहीं, मलेरिया से हुई। लेकिन विवाद बढ़ने पर झारखंड के मुख्यमंत्री ने मामले की जांच की घोषणा की। संतोषी की मृत्यु कुपोषण से मौत का पहला मामला नहीं थी। अगर उसे मलेरिया हुआ था, तब भी उसके जिंदा रहने की संभावना तभी होती, जब उसे न्यूनतम पोषण मिलता, जिससे कि बीमारी से जल्दी उबर पाने की उसमें क्षमता होती। बीमारी कुपोषित व्यक्ति को सबसे पहले शिकार बनाती है।



हम कुपोषण पर बात नहीं करते, क्योंकि यह महाशक्ति देश की बनी छवि की असलियत उजागर कर देता है, लेकिन वास्तविक आंकड़े अलग ही कहानी कहते हैं। यहां तक कि 2019 में भी कुपोषण हम भारतीयों के लिए इतना बड़ा जोखिम है कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों की जितनी मौत होती है, उसके 68 प्रतिशत के लिए कुपोषण जिम्मेदार है। हालांकि 1990 से 2017 के बीच बच्चों में कुपोषण के कारण होने वाली मृत्यु दर में दो तिहाई कमी आई है। कुपोषण से होने वाली मौतों के मामले में उत्तर भारत के राज्य आगे हैं। द लैंसेट ऐंड एडोलोसेंट हेल्थ द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक,  राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और असम में कुपोषण के कारण सबसे अधिक मौतें होती हैं। इनके बाद मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, नगालैंड और त्रिपुरा का नंबर आता है।


इस अध्ययन में इंडिया स्टेट लेवल डिजीज बर्डन इनीशिएटिव द्वारा भारत के हर राज्य में 1990 से 2017 तक बाल और मातृ कुपोषण के कारण कुपोषण के बढ़ते बोझ का विस्तृत अध्ययन किया गया है। यह अध्ययन रिपोर्ट सौ से अधिक भारतीय संस्थाओं के विशेषज्ञों ने तैयार की है, जिनमें भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया तथा वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के एक स्वतंत्र वैश्विक स्वास्थ्य शोध केंद्र इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स ऐंड इवोल्यूशन शामिल हैं। वर्ष 2017 में देश में बच्चों में बौनापन (उम्र के अनुरूप लंबाई न होना) 39  प्रतिशत था। गोआ में 21 प्रतिशत, तो उत्तर प्रदेश में 49 प्रतिशत बच्चे उम्र के हिसाब से छोटे कद के पाए गए थे। रिपोर्ट बताती है कि 1990 से 2017 के बीच बौनेपन में 2.6 फीसदी की सालाना कमी देखी गई। केरल में यह कमी चार प्रतिशत रही, तो मेघालय में 1.2 प्रतिशत। 1990 से 2017 के बीच देश के 33 फीसदी बच्चे कम वजन के पाए गए। मणिपुर में 16 फीसदी बच्चे कम वजन के थे, तो झारखंड में कम वजन के बच्चों का आंकड़ा सर्वाधिक 42 प्रतिशत था।


इस अवधि में कम वजन की समस्या में 3.2 फीसदी की सालाना कमी देखी गई। मेघालय में इस दौरान यह कमी सर्वाधिक 5.4 फीसदी रही, तो दिल्ली में 1.8 प्रतिशत। 1990 से 2017 के बीच देश के 60 फीसदी बच्चे एनीमिया (खून की कमी) से ग्रस्त पाए। मेघालय में 21 प्रतिशत बच्चों में खून की कमी पाई गई, तो हरियाणा में एनीमिया से ग्रस्त बच्चों का आंकड़ा सर्वाधिक 74 प्रतिशत था। हालांकि इस अवधि में बच्चों में एनीमिया में सालाना 1.8 प्रतिशत की कमी देखी गई; मिजोरम में इस दौरान बाल एनीमिया में 8.3 प्रतिशत की कमी आई।


कुपोषण का सबसे बड़ा संकेतक है जन्म के समय बच्चों का कम वजन। 2,500 ग्राम यानी ढाई किलो से कम वजन के नवजात को कम वजन का माना जाता है। वर्ष 1990 से 2017 के बीच पांच साल तक के 21 फीसदी बच्चे कम वजन के थे। अध्ययन के मुताबिक, इस दौरान मिजोरम में महज नौ फीसदी बच्चे कम वजन के पाए गए, तो उत्तर प्रदेश में कम वजन के बच्चों का आंकड़ा 24 प्रतिशत था। इंडिया स्टेट लेवल डिजीज बर्डन इनीशिएटिव के निदेशक ललित डंडोना कहते हैं, 'वैसे तो कुपोषण के सभी संकेतकों को गंभीरता से लेने की जरूरत है, लेकिन इनमें भी जन्म के समय कम वजन के निदान के लिए खास नीति बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि बाल मृत्यु का सबसे बड़ा कारण यही है। यही नहीं, बाल कुपोषण के जितने भी संकेतक हैं, उनमें से नवजात बच्चों के कम वजन में कमी आने की दर सबसे कम है। नवजातों का कम वजन एक जटिल मुद्दा है और इसकी कई वजहें हैं, जो बच्चों की मां से जुड़ी हैं। गर्भधारण से पहले मांओं को पर्याप्त पोषण न मिलना, बचपन में कम पोषण और संक्रमण के कारण उनका कद छोटा होना तथा गर्भधारण के दौरान समुचित पोषण का अभाव-इन तमाम वजहों से नवजात कम वजन के होते हैं।'


जाहिर है, अगर हमें बाल कुपोषण खत्म करना है, तो गर्भधारण से पहले माताओं पर ध्यान केंद्रित करना होगा। 1990 से 2017 के बीच 54 प्रतिशत औरतें एनीमिया से ग्रस्त पाई गईं। औरतों में कुपोषण का कारण सिर्फ गरीबी और पैसे की कमी नहीं है। इसकी सामाजिक-सांस्कृतिक वजह भी है। पोषक खाद्य पदार्थों के मामले में हमारे यहां एक किस्म का अज्ञान तो है ही, लैंगिक भेदभाव भी औरतों में कुपोषण की वजह है। हमारे यहां लड़कियां और औरतें अंत में बचा-खुचा खाती हैं।


देश में अब एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति और एक राष्ट्रीय पोषाहार मिशन है। सितंबर महीने को पोषण महीने के रूप में मनाया जाता है। लेकिन अलग-अलग राज्यों पर केंद्रित कुपोषण से संबंधित जो अध्ययन हाल ही में जारी हुआ है, वह बताता है कि इससे मुक्ति के लिए व्यापक कदम उठाने की जरूरत है। विभिन्न मोर्चों पर देश की निचली वैश्विक रैंकिंग हमें चुभती है। लेकिन भूख से या चिकित्सा सुविधा के बगैर बच्चों की मौतें हमें शर्मिंदा नहीं करतीं। 'नए भारत' में हमें इस मानसिकता से मुक्ति पानी होगी।

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