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प्रकृति को लीलती भोजन की जूठन: भारत अब भी भोजन बर्बादी मामले में दूसरे नंबर पर, दंडनीय अपराध घोषित करे सरकार

विवेक एस अग्रवाल
Updated Mon, 28 Sep 2026 09:02 AM IST

सार

हर वर्ष 29 सितंबर को खाद्य बर्बादी के प्रति जागरूकता का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है, पर भारत अब भी भोजन बर्बादी के मामले में दूसरे नंबर पर है।
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खाने की बर्बादी चिंताजनक (प्रतीकात्मक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-एजेंसी


आम तौर पर भोजन की बर्बादी को भुखमरी के कारक के रूप में दोषी ठहराया जाता है। लेकिन, यदि थाली में छोड़े निवालों का संसाधनों की दृष्टि से विश्लेषण किया जाए, तो शायद वह अभावों में जीवनयापन करने वाली बड़ी आबादी की आवश्यकता पूरी करने लायक होगी। मानवीय श्रम एवं प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी का दुष्चक्र ‘खेत से प्लेट’ तक इन्सानी बेरुखी और असंवेदनशीलता के चलते थमने का नाम ही नहीं ले रहा। भोजन की बर्बादी से जुड़ा तथ्य यह भी है कि इसकी भव्यता को ही सार्थकता मानते हुए हर स्तर पर बर्बादी के आकलन की अनदेखी की जाती है। संसाधनों की उपलब्धता हमें उनकी बर्बादी करने की छूट नहीं देती। अभावग्रस्त क्षेत्रों में जीवनयापन करने वाले ही इनकी असली कीमत बता सकते हैं। कुल उपजाऊ भूमि की 30 प्रतिशत से ज्यादा पैदावार बर्बाद हो जाती है।


एक अनुमान के अनुसार, यदि फल एवं सब्जी की बर्बादी को नियंत्रित कर लिया जाए, तो 10 प्रतिशत तक लागत कम हो जाएगी। खाद्यान्न हानि और भोजन की बर्बादी में उपभोक्ता स्तर एवं उसके बाद होने वाले नुकसान का हिस्सा काफी ज्यादा होता है। इस स्तर पर बचाव में संसाधनों से अधिक इच्छाशक्ति, व्यवहार और प्रवृत्ति में बदलाव जरूरी है। गौर करने लायक यह भी है कि खाद्यान्न के परिवहन के बाद उसे खाने योग्य बनाने में भोजन की कुल लागत का 70 से 75 प्रतिशत व्यय होता है। कृषि उपज और उसके परिवहन की लागत तो मात्र 25 से 30 प्रतिशत ही होती है।


भारतीय सभ्यता और संस्कृति में संसाधन कोई भी हो, उसे दिव्य व दैवीय रूप में पूज्य अवयव माना गया है। पर, कालांतर में थाली में जूठन को न सिर्फ अशिष्ट, अपितु ईश्वर का अपमान भी माना जाता था। उस परंपरा में भोजन परोसने, खाने और उसके पश्चात शेष भोजन के तार्किक उपयोग का स्थान तय था। मानवीय उपयोग के बाद उसे पशु आहार में परिवर्तित कर अंतिम उपयोग तक अंजाम दिया जाता था। किंतु, आधुनिकता का जामा पहनते हुए इस तार्किक परिणति को बर्बादी में तब्दील कर दिया गया। नतीजतन, वर्तमान में भारत भोजन बर्बाद करने वालों की सूची में दुनिया का दूसरे नंबर का देश है, हालांकि प्रति व्यक्ति बर्बादी की दृष्टि से अमेरिका सर्वोच्च स्थान पर है। खाने की बर्बादी रोकने में सर्वाधिक सजगता जापान में देखी जाती है, जहां जूठन छोड़ना अभिशाप के समान माना जाता है।


समय है कि खाद्यान्न की बर्बादी रोकने की दिशा में नीतिगत कदम उठाए जाएं। सभी राष्ट्रों को कमोबेश यह समझ आने लगा है कि नई फसल या कृषि संवर्धन से अधिक आवश्यक खाद्यान्न बर्बादी को रोकना है। विश्व में पहली बार फ्रांस ने खाद्य बर्बादी के खिलाफ कानून बनाकर मिसाल कायम की, तो अमेरिका ने पाथ कानून के तहत अधिशेष भोजन को दान में देने वाले वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों को कर में छूट लागू की। इसी प्रकार इटली में भी भोजन बर्बादी को रोकने हेतु प्रतिवर्ष लगभग एक करोड़ डॉलर का अनुदान गैर लाभ वाली संस्थाओं को बचे हुए भोजन को दान करने के बदले प्रदान किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर भी सतत विकास लक्ष्य 12.3 भोजन बर्बादी को लक्षित कर प्रतिपादित किया गया है।


कृषि उपज के सही संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर कोल्ड स्टोरेज का नेटवर्क स्थापित करने से अधिक आवश्यक है कि तैयार किए जाने के बाद भोजन की बर्बादी को रोका जाए। खाने की बर्बादी रोकने बाबत बाल्यकाल से ही संस्कार देनेे हेतु अभिभावकों को उचित उदाहरण पेश करने चाहिए, ताकि  बच्चे उनका अनुसरण कर सकें। यदि भोजन बर्बादी की दर इसी गति से बढ़ती रही, तो स्वस्थ भोजन की लागत बढ़ती जाएगी। जब हर वर्ष 29 सितंबर को खाद्य बर्बादी के प्रति जागरूकता का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है, तब सरकार द्वारा कड़े नियमों के माध्यम से भोजन बर्बादी को दंडनीय अपराध घोषित करते हुए अधिशेष भोजन के समुचित उपयोग को बढ़ावा देने संबंधी प्रोत्साहन योजना को तुरंत लागू करना चाहिए। इससे भोजन के साथ सृष्टि भी बचेगी।

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