दरअसल, मानसून की अस्थिरता और मौसम चक्र में बदलाव के चलते चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी ही है और पिछले एक वर्ष से तो ये घटनाएं ज्यादा स्पष्ट रूप से सामने आई हैं। धरती के तापमान बढ़ने की बात तो पिछले एक दशक से की जा रही है, लेकिन 2024 ने जिस तरह से गर्मी के पिछले रिकॉर्ड तोड़े, देश में असामान्य बारिश और अब दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की जहरीली हवा से खतरे के दरवाजे तक पहुंचने की आशंका ही पैदा होती है। हालांकि ताजा रिपोर्ट के अध्ययन में दो पैटर्न साफ दिखते हैं, जिसमें पहला तो यह है कि बाढ़ व सूखा जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रहे संकटों में सबसे गंभीर हैं, क्योंकि ये मनुष्य को पूरी तीव्रता के साथ सीधे प्रभावित करते हैं। जबकि दूसरा यह कि इन संकटों की भयावहता जिले की आबादी पर निर्भर है, यानी जिन जिलों की आबादी कम है, वहां जोखिम भी कम होगा।
संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट कहती है कि 2050 तक देश की आधी से ज्यादा आबादी शहरों में निवास कर रही होगी। ऐसे में चिंता की बात तो अलबत्ता यह है कि औद्योगीकरण, वनों की अंधाधुंध कटाई और बढ़ते शहरीकरण ने पर्यावरणीय संतुलन को जिस तरह से बिगाड़ा है, उसमें निकट भविष्य में भी सुधार के कोई संकेत नहीं दिखते। बाढ़ के दौरान शहरों में जल निकासी व्यवस्थाओं की दुर्दशा से विकास के दावों की जैसी पोल खुलती है, वह भी छिपी नहीं है। ऐसे में, जरूरी है कि जोखिम वाले जिलों को लक्षित कर उनके लिए दीर्घकालिक योजना तैयार की जाए, क्योंकि समय रहते अगर तत्काल और समग्र उपाय नहीं किए गए, तो इन जिलों का संकट पूरे देश के लिए गंभीर साबित हो सकता है।