शाकाहारी हो गई हो, तो बात दूसरी है, वर्ना बिल्ली को ख्वाब में भी छीछड़े ही दिखाई देते हैं। जब से अपने प्रधानमंत्री ने अच्छे दिन लाने का वायदा किया है, लोगों को उठते-बैठते हर वक्त और हर बात में, अच्छे दिनों के आने की खबर ही सुनाई देती है। अब यह कहा जा रहा है कि अच्छे दिनों को लेट-लतीफी की सरकारी परियोजनाओं वाली आदत लग गई है, सो घड़ी-घड़ी यह पूछना बंद कीजिए कि कहां तक पहुंचे, कब तक आएंगे? अच्छे दिन अब न पांच साल में, न दस साल में, यहां तक कि बीस साल में भी नहीं, बल्कि तसल्ली से पच्चीस साल में आएंगे! अमित शाह जी ने नापकर बता दिया है कि इससे पहले अच्छे दिनों के आने का कोई चांस ही नहीं है।
पच्चीस साल का शिड्यूल आते ही ऐसा हड़कंप मच गया, जैसे अच्छे दिनों का प्लान कैंसिल होने का ही ऐलान हो गया हो। कुछ लोगों ने तो पब्लिक के साथ धोखाधड़ी से लेकर दगाबाजी तक के इल्जाम जड़ दिए। ऊपर से इस तरह की तकनीकी नुक्ताचीनियां भी, कि चुनाव तो पांच साल के लिए हुआ है, फिर पच्चीस साल की प्लानिंग कैसे? भाजपा कह रही है कि हंगामा है क्यों बरपा, चौथाई सदी ही तो मांगी है? देखा जाए, तो ईमानदारी की बात यह है कि पहले क्या कोई इससे कम टैम में अच्छे दिन ले आया है, जो जिंदा कौमों के इतने साल इंतजार न करने की बातें कही जा रही हैं!
खैर! अच्छे दिन अब चाहे जब भी आएं या न आएं, खाकी पार्टी ने साफ कर दिया है कि उसके पच्चीस साल मांगने की बात सरासर झूठी है। बेशक शाह जी ने पांच साल के प्लान का जिक्र किया था। जिक्र तो उन्होंने पच्चीस साल के प्लान का भी किया था। अलबत्ता अच्छे दिनों के आने का कोई जिक्र उन्होंने नहीं किया था। जब अच्छे दिनों के बारे में उन्होंने कोई बात ही नहीं की थी, तो फिर खामख्वाह उन्हें क्यों दोष देना? वैसे समझने वालों को समझ जाना चाहिए कि अब सिर्फ अच्छे वाले नहीं, प्राचीन गौरव वाले दिन आएंगे। इसके लिए पच्चीस साल बहुत ज्यादा तो नहीं हैं!