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अर्थव्यवस्था में तेजी से बदल रही तस्वीर: रोजगार, संपत्ति, एआई और बढ़ती असमानता तय करेंगे भारत का अगला दशक

शंकर अय्यर
Updated Wed, 05 Aug 2026 06:13 AM IST

सार

भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां कमाने के तरीके, रोजगार का स्वरूप और राजनीतिक प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। संपत्ति रखने वालों के लिए नए अवसर खुल रहे हैं, तो बड़ी आबादी असमानता व अनिश्चितता का सामना कर रही है। यही बदलाव देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे रहे हैं।
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भारतीय अर्थव्यवस्था। - फोटो : amarujala


भारत में एकसाथ पांच बड़े बदलाव हो रहे हैं। पहला, पारिवारिक कारोबारों में नियंत्रण व संपत्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित हो रही है। दूसरा, बिजनेस मॉडल वितरण से हटकर प्लेटफॉर्म आधारित होते जा रहे हैं। इससे यह तय हो रहा है कि काम का फायदा किसे मिलेगा। तीसरा, बिजनेस का एक ‘टोल-बूथ मॉडल’ उभर रहा है, जैसे वेल्थ मैनेजमेंट, वेलनेस कोचिंग और पर्यटन, जो लोगों की बचत के दम पर फल-फूल रहा है। चौथा, बढ़ती कीमतों के कारण खपत ‘के-शेप’ में बंट रही है, इसलिए सरकारों को कल्याणकारी योजनाओं का दायरा बढ़ाना पड़ रहा है। पांचवां, एआई उस क्षेत्र से इन्सानी दखल कम कर रहा है, जिसने दो दशकों में बड़ी संख्या में स्नातकों को रोजगार दिया था। इनमें से कुछ भी अचानक या विरोधाभासी नहीं है।


जीडीपी के नजरिये से देखें, तो भारत मजबूत स्थिति में है और तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। पर, रोजगार, मालिकाना हक या खपत की दृष्टि से देखने पर ‘के-शेप्ड’ अर्थव्यवस्था दिखाई देती है, जिसमें फायदों का वितरण असमान है। अर्न्स्ट एंड यंग (ईवाई) व जूलियस बेयर का मानना है कि भारत एक अभूतपूर्व पीढ़ी-दर-पीढ़ी संपत्ति हस्तांतरण के दौर से गुजर रहा है। अगले दशक में करीब 15 लाख करोड़ डॉलर की संपत्ति का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरण होने का अनुमान है।


अर्थशास्त्री जोसेफ शुमपीटर ने बड़े बदलाव या मौजूदा मॉडल को पूरी तरह बदलने की प्रक्रिया को ‘क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन’ (रचनात्मक विनाश) कहा था। अब कंपनियां कारखाने, गोदाम और नई शाखाएं खोलने के बजाय अपने नेटवर्क का विस्तार करके तेजी से बढ़ रही हैं। उनकी सफलता बाजार में उनके मूल्यांकन में दिखाई देती है। इसका गणित समझिए। खाद्य सेवा प्रदाता प्लेटफॉर्म ‘एटरनल’ का मूल्य देश की प्रमुख पैकेज्ड फूड कंपनी नेस्ले के बराबर है। लगातार घाटे में चल रही स्विगी का मार्केट कैप करीब 78,600 करोड़ रुपये है और शेयर बाजार में कई ब्रोकर इसे ‘खरीदने लायक शेयर’ मानते हैं। इसी तरह, एचडीएफसी बैंक के 4,175 शहरों में 9,689 शाखाएं और 2.11 लाख कर्मचारी हैं। इसके बावजूद, निवेशक बैंक की कमाई का करीब 14 गुना मूल्य देने को तैयार हैं। वहीं, इसकी सहयोगी एचडीएफसी एएमसी, जिसमें केवल 1,738 कर्मचारी हैं, उसके लिए निवेशक कमाई का 38 गुना मूल्य चुकाने को तैयार हैं। यह दिखाता है कि आज निवेशक कम कर्मचारियों और कम संपत्ति के साथ ज्यादा मुनाफा कमाने वाले कारोबारों को तवज्जो दे रहे हैं। भारतीय रिटेल निवेशकों के बढ़ते भरोसे के पीछे भी यही बड़ी वजह है।


मध्यम वर्ग पर शिक्षा, स्वास्थ्य और बढ़ती जरूरतों का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में, अपनी बचत और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा बनाए रखने के लिए उसके पास शेयर बाजार और इक्विटी निवेश का सहारा लेने के अलावा बहुत कम विकल्प बचे हैं। यही कारण है कि साल के पहले छह महीनों में विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बावजूद घरेलू निवेशकों ने फंड्स के जरिये 4.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया। इसी कारण एसेट मैनेजर और वेल्थ मैनेजमेंट कंपनियां चर्चा में हैं। एनएसई जैसी मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियां भी अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ लाने की तैयारी कर रही हैं।


आईटी कंपनियां न सिर्फ देश की सर्वाधिक रोजगार देने वाली कंपनियां हैं, बल्कि सबसे बड़े निर्यातकों में भी शामिल हैं और करीब 22,500 करोड़ डॉलर की कमाई करती हैं। इनका व इनके कर्मचारियों का खर्च कई क्षेत्रों में अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा करता है। दशकों तक ये कंपनियां ग्राहकों से काम के घंटों के आधार पर भुगतान लेती रहीं। पर, अब एआई इस मॉडल को बदल रहा है। भविष्य में अनुबंधों की कीमत काम के घंटों से नहीं, नतीजों से तय होगी। हालांकि, इस क्षेत्र के सामने चुनौतियां भी हैं, क्योंकि एआई उन प्रक्रियाओं, कामों व ढांचों को बदल रहा है, जिनसे अब तक नौकरियां बनती थीं। ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) लोगों को तो नौकरी दे रहे हैं, पर यह सिर्फ शुरुआत है। मुनाफा अब पारंपरिक दुकानदारों के बजाय प्लेटफॉर्म कंपनियों के पास ज्यादा जा रहा है। कारोबार के औपचारिक होने से उत्पादन और जीएसटी संग्रह बढ़ता है, पर असंगठित क्षेत्र के कई बिचौलिये बाजार से बाहर हो जाते हैं। इसका व्यापक असर अर्थव्यवस्था पर दिखता है। जीडीपी तो बढ़ती है, पर रोजगार उसी रफ्तार से नहीं बढ़ता और श्रम की हिस्सेदारी लगातार घटती है। वहीं, खपत का डाटा ‘के-शेप्ड’ असमानता को साफ दिखाता है। ‘टोल-बूथ इकनॉमी’ बढ़ रही है। उपभोक्ताओं के बदलते व्यवहार का असर कमाई और रोजगार, दोनों पर पड़ रहा है।


इन सभी बदलावों का नतीजा एक ही है। आर्थिक विकास का बड़ा हिस्सा पूंजी के मालिकों तक पहुंच रहा है, जबकि मजदूरों के हिस्से में अपेक्षाकृत कम लाभ आ रहा है। खपत के औपचारिक होने से टैक्स का दायरा तो बढ़ा है, पर वेतन आधारित आय के सिकुड़ने का असर देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। सरकारी नौकरियों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा इसका बड़ा उदाहरण है। राजस्थान में चपरासी की 53,000 नौकरियों के लिए 25 लाख से अधिक लोगों ने आवेदन किया। इनमें करीब 90 फीसदी उम्मीदवार स्नातक थे, जबकि कई आवेदकों के पास एमएससी, बीटेक और यहां तक कि पीएचडी जैसी डिग्रियां भी थीं।
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पूंजीवाद का मतलब है ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ (जो सबसे काबिल है, वही टिकेगा)। वहीं, लोकतंत्र का दायित्व भी सबसे कमजोर वर्ग के साथ खड़ा होना है। जैसे-जैसे आर्थिक विकास का लाभ सीमित लोगों तक सिमटता है, नेताओं को वोट पाने के लिए ज्यादा लोगों के दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं। यही वजह है कि सरकारों ने समाज के अलग-अलग वर्गों के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जिन्हें ‘रेवड़ी’ (फ्रीबीज) कहा जाता है। पिछले सप्ताह भारत सरकार ने भी बताया कि 145 करोड़ की आबादी में 101 करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी योजना का लाभ ले रहे हैं। भारत के आर्थिक मॉडल के साथ-साथ उसकी सामाजिक और राजनीतिक अवधारणाएं भी नए सिरे से लिखी जा रही हैं।

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