ब्राह्मण ने कहा, ‘जो मनुष्य कृच्छ्र-चांद्रायण व्रत करता है, जो मान और अपमान में, सुवर्ण और मिट्टी के ढेले में तथा शत्रु और मित्र में समान भाव रखता है, जो देवता, अतिथि, गुरु तथा पितरों की पूजा करता है, वह प्रेतयोनि में नहीं पड़ता। जिसने क्रोध और ईर्ष्या को जीत लिया, जो क्षमावान और दानशील है, वह प्रेतयोनि में नहीं जाता।’
प्रेत बोले, ‘अब हमें यह बताइए कि कौन-से कर्म से मनुष्य को प्रेतयोनि में जाना पड़ता है?’ ब्राह्मण ने उत्तर दिया, ‘यदि कोई द्विज और विशेषतः ब्राह्मण, शूद्र का अन्न खाकर उसे पेट में लिए ही मर जाए, तो वह प्रेत होता है। जो आश्रम-धर्म का त्याग करके मदिरा पीता है, परस्त्री गमन करता है तथा प्रतिदिन मांस खाता है, उस मनुष्य को प्रेतयोनि प्राप्त होती है। जो ब्राह्मण यज्ञ के अनधिकारी पुरुषों से यज्ञ करवाता है, अधिकारी पुरुषों का त्याग करता और शूद्र की सेवा में रत रहता है, वह प्रेतयोनि में जाता है। जो मित्र की धरोहर हड़प लेता है, विश्वासघात करता है और कूटनीति का आश्रय लेता है, वह निश्चय ही प्रेत होता है। इसके अलावा ब्रह्महत्यारा, गोधाती, चोर, शराबी, गुरुपत्नी के साथ संभोग करने वाला तथा भूमि और कन्या का अपहरण करने वाला, तो निश्चय ही प्रेत बनता है। जो पुरोहित नास्तिकता में प्रवृत्त होकर ऋत्विजों के लिए मिली हुई दक्षिणा अकेले ही हड़प लेता है, उसे भी प्रेत बनना पड़ता है।’
विप्रवर पृथु जब प्रेतों को इस प्रकार उपदेश दे रहे थे, उसी समय आकाश से सहसा देवताओं ने पुष्पवर्षा आरंभ कर दी। प्रेतों के लिए चारों ओर से विमान आ गए। उसी समय यह आकाशवाणी हुई, ‘इन ब्राह्मण देवता के साथ वार्तालाप और सत्संग करने से तुम सब प्रेतों को मुक्ति मिल गई है और दिव्य गति प्राप्त हुई है।’ इस प्रकार पृथु नामक ब्राह्मण के साथ हुए सत्संग के प्रभाव से उन पांचों प्रेतों का उद्धार हो गया। अत: किसी मनुष्य को अपना कल्याण करने की आवश्यकता हो, तो आलस्य छोड़कर पूर्ण प्रयत्न के साथ सत्पुरुषों के साथ वार्तालाप-सत्संग करना चाहिए। पद्म पुराण मंे वर्णित पांच प्रेतों की इस कथा का जो मनुष्य नियमित पाठ करता है, उसके वंश में कोई प्रेत नहीं होता और जो श्रद्धा सहित इसे सुनता है, वह प्रेतयोनि में नहीं पड़ता।