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कूड़े की सफाई पर पहला हक

Tue, 16 Jun 2015 07:57 PM IST
अशोक गौतम
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कुबेर को ज्यों ही मीडिया से पता चला कि भारत की आर्थिक विकास दर चीन को पीछे छोड़ देगी, तो पांच का पचास करने के लिए वह भी दिल्ली आ पहुंचे। यहां वह कूड़ा उठाने के लिए साफ-सुथरे लोगों में मारामारी होता देख दंग रह गए। कूड़ा उठाते हुए फोटो खिंचवाने के लिए आपस में लोगों को लड़ते देखकर उन्हें बड़ी हैरानी हुई। सो वह मुझसे पूछ बैठे, इस देश में कूड़ा डालने के लिए तो मैंने एक-दूसरे को आपस में लड़ते कई बार देखा है, मगर अब कूड़ा उठाने के लिए भी लड़ाई! यह देश इतना स्वच्छता प्रिय कब से हो गया? ये जीव किस तरह के हैं, जो कूड़ा उठाने के लिए भी इतने बेताब हैं। ये एमसीडी के तो नहीं लगते!
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मैंने जवाब दिया, सर, ये एमसीडी के कर्मचारी नहीं हैं। वे तो बेचारे यह भी नहीं जानते कि बरसों से वे किसका कूड़ा उठा रहे हैं- केंद्र सरकार का या राज्य सरकार का।

तो कौन हैं समाज के ये सेवक, जो अपने कपड़ों की परवाह किए बिना कूड़ा उठाते फोटो खिंचवाने के लिए झाड़ू लेकर एक-दूसरे को पीछे धकिया रहे हैं? कुबेर ने मासूमियत से पूछा।
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महाराज, ये देश के होनहार नेता हैं।

चौंकते हुए उन्होंने कहा, तो अब कूड़े के ढेर पर भी उनकी लड़ाई शुरू हो गई? क्या इनके लड़ने के लिए संसद, विधानसभाएं छोटी पड़ गई हैं?

हां हुजूर, असल में उनका कहना है कि जब उन्हें जनता ने सफाई करने का मौका दिया है, तो कूड़े के साथ फोटो खिंचवाने का पहला और आखिर कानूनी हक उनका है।

मगर शहर का कूड़ा उठाने में कोई इनकी मदद करना चाहता है, तो इसमें बुराई क्या है?

प्रभु, झाड़ू इनके नाम ही रजिस्टर्ड है। ऐसे में कोई दूसरा उसका उपयोग करे, यह किसे नहीं अखरेगा? अब आप ही बताइए कि आप धन के देवता हैं, और अगर दूसरा आप के लोगों का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए करे, तो आपको कैसा लगेगा?
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मेरा इतना पूछना था कि वह चुपचाप उठे और नाक पकड़ कूड़े के ढेर को प्रणाम करके आगे बढ़ गए।
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