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ऊर्जा में बदल सकती है यह आग

Tue, 09 Apr 2013 11:12 PM IST
अनिल प्रकाश जोशी
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जंगल की आग का इतिहास जंगल की तरह ही पुराना है। जब से वन पनपे, आकस्मिक आग के कई पारस्थितिकीय कारणों ने भी जन्म लिया।
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प्रमाण में आग का सबसे पुराना किस्सा 4,000 साल पहले का है, जब आग ने बहुत बड़े वन क्षेत्र को लील लिया था। भारत में ही पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार, 2000 साल पहले मध्य भारत में आग ने लाखों हेक्टेयर भूमि को राख कर दिया था।

वैसे आग पारिस्थितिकीय कारणों से लगती है, पर पूर्वोत्तर भारत में वनों की आग को खेती से जोड़कर देखा जाता है, जो झूम खेती के नाम से प्रसिद्ध है।

दुर्भाग्य यह है कि गत दशकों से औसतन हर वर्ष देश के वनों का एक बड़ा हिस्सा इस दानव द्वारा लील लिया जाता है।

एक तरफ वन संकट में हैं, दूसरी तरफ वनाग्नि ने वनों के पनपने पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रखा है। वन विभाग को हर साल लगने वाले इस राहू का कोई सीधा इलाज वर्तमान में दिखाई नहीं देता, पर सवाल है कि वन विभाग की भारी-भरकम फौज व तैयारियां इस दानव के आगे क्यों बौनी हो जाती हैं।
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आग न लगने व बुझाने की विभाग की तमाम कोशिशें हमेशा से जारी रही हैं, और इस बात में भी कोई दम नहीं कि विभाग आग बुझाने में ईमानदारी नहीं बरतता।

इस छींटाकशी में हम मूल बिंदु से भटक कर कहीं और पहुंच जाते हैं। हमें समझना होगा कि यह सामूहिक दायित्व भी है और नुकसान भी। हमें दो बातों पर केंद्रित होना होगा। पहला किसी भी तरह आग न लगे और लगे, तो बुझाने की तैयारी सशक्त हो।

अब वैसे जंगल में आग के बढ़ते नुकसान को देखते हुए राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र व वन सर्वेक्षण संस्थान ने आपस में तालमेल बनाया है। यानी कि सैटेलाइट के माध्यम से यह जाना जा सकता है कि आग के लिए कौन-कौन से संवेदनशील क्षेत्र हैं या फिर कहां आग लग चुकी है।

यह सूचना संबधित राज्य के वन विभाग के मुख्यालय को भेजी जाती है, जहां जिले व रेंज के वन अधिकारी उचित कदम उठाते हैं। वैसे इस उत्साही कदम के प्रभावी परिणाम अभी आने बाकी हैं, पर यह सूचना निश्चित रूप से दावानल से निपटने में सहायक होगी। जिस तरह से आग लगती है या फिर नुकसान होता है, वहां ऐसे प्रयत्न अच्छे जरूर हैं, पर नाकाफी हैं।

जब वन सुरक्षा अधिनियम लागू किया गया था, तब यह इसलिए जरूरी था, क्योंकि तब वनों के अंधाधुंध कटाव को रोकना था। पर आज वनों के दूसरे बढ़ते खतरों को देखते हुए गांवों को नजदीक लाने की कवायद करनी ही होगी। यह समझ लेना आवश्यक है कि वन यदि सुरक्षित हो सकते हैं, तो केवल स्थानीय सहायता से।

एक बड़ा कारण जिसने गांव व वनों की आपसी रिश्तेदारी में महत्वपूर्ण भागीदारी की थी, वह थी पारस्परिक निर्भरता। हमें कोशिश करनी होगी कि हम उस रिश्ते को मजबूत करें। वनाग्नि रोकने को ही रिश्ते की शुरुआत का पहला चरण मानना चाहिए।

जंगल की आग का मुख्य कारण बढ़ती गर्मी के कारण पतझड़ में गिरी पत्तियां, सूखती झाड़ियां या खरपतवार होते हैं, जो दावानल के मुख्य सहायक होते हैं। स्थानीय रोजगार के रूप में इनका उपयोग कुछ हद तक वनाग्नि पर अकुंश लगा सकता है। ऐसे में परंपराओं को भी नहीं नकारा जाना चाहिए।

हर घर-गांव में सूखी पत्तियों को जानवरों के लिए बिछावन के रूप में उपयोग किया जाता रहा है। जानवरों का गोबर-मूत्र इसे एक अच्छी खाद के रूप में परिवर्तित कर देता है।

इस परपंरागत प्रयोग को नया व्यावसायिक रूप दिया जा सकता है और अगर गांव में जैविक खाद के रूप में ये पत्तियां उपयोगी होंगी, तो जैविक खेती को असली जामा भी पहनाया जा सकता है।

गांवों की बढ़ती जलावन लकड़ी की समस्या का समाधान इसी मुसीबत से ढूंढ़ा जा सकता है। मसलन चाहे वे चीड़ की पत्तियां हों या अन्य खरपतवार, इन्हें गांवों के चूल्हे का रास्ता दिखाने के प्रयत्न करने होंगे।
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इसके लिए वनों से चूल्हों तक की ऐसी योजना को जन्म देना होगा, जिससे ये खरपतवार वनों की आग का कारण न बनकर चूल्हों की भेंट चढ़ें। ऊर्जा का निदान तो होगा ही, महिलाओं के कष्ट से मुक्ति का रास्ता भी खुलेगा।

इस तरह की योजना मात्र व्यावसायिक न होकर घरेलू भी होगी, तो हम दावानल को हराने में ज्यादा सक्षम भी होंगे।
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