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कार्बी आंग्लांग में धधकती आग

Thu, 22 Aug 2013 08:25 PM IST
कृपाशंकर चौबे
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असम के कार्बी आंग्लांग तथा पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में इन दिनों अद्भुत समानता दिख रही है। ये दोनों जिले तेलंगाना राज्य की घोषणा से बेतरह भड़के हुए हैं। कार्बी आंग्लांग अदरक की खेती के लिए मशहूर है, जबकि दार्जिलिंग चाय के बगानों के लिए। लेकिन इन दिनों ये जिले हिंसा और आगजनी के कारण सुर्खियों में हैं। तेलंगाना की घोषणा का कुछ न कुछ प्रभाव वैसे तो पूरे देश में दिख रहा है, किंतु सबसे अधिक प्रभाव हिंसक प्रदर्शन के रूप में पूर्वी भारत तथा पूर्वोत्तर में ही दिख रहा है।
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असम में अलग बोडोलैंड, कामतापुर व कार्बी आंग्लांग व डिमा हासाओ जिलों को मिलाकर अलग राज्य बनाने की मांग करने वाले संगठनों के लगातार बंद के दौरान जिस तरह हिंसा व आगजनी की जा रही है, वैसा ही दृश्य दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में दिख रहा है। कार्बी आंग्लांग व डिमा हासाओ जिलों में आंदोलनकारियों ने कई कार्यालय फूंक डाले और डिफू और दलदली के बीच रेल पटरियां भी उखाड़ दीं, जिससे ऊपरी असम के साथ पूरे देश का रेल संपर्क कट गया।

हिल्स स्टेट डेमोक्रेटिक पार्टी लंबे समय से असम के दो जिलों कार्बी आंग्लांग और दीमा हसाओ को मिलाकर पृथक कार्बी आंग्लांग राज्य बनाने की मांग कर रही है। उसकी मांग का समर्थन कार्बी स्टूडेंट्स एसोसिएशन, कार्बी रिसो अदोरबा और एनएसयूआई जैसे संगठन भी कर रहे हैं। उधर, बोडोलैंड स्वायत्त परिषद वाले भी लंबे अंतराल के बाद अपने स्वायत्तशासी क्षेत्र को अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर आंदोलन छेड़े हुए हैं। यही नहीं, असम के ही बक्सा और धेमाजी जिलों में कामतापुर राज्य की मांग को लेकर आंदोलन छिड़ा हुआ है।
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असम में तीन-तीन अलग राज्यों के आंदोलनों के दौरान पखवाड़े भर से जारी हिंसा पर काबू पाने के लिए सेना की मदद ली जा रही है। यही हाल दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र का है, जहां गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ताओं की हिंसा और आगजनी से निपटने के लिए अर्धसैनिक बलों की मदद ली जा रही है। असम सरकार ने राज्य के बंटवारे से स्पष्टतः इनकार करते हुए कहा है कि शासन आंदोलनकारियों से बातचीत करने को तैयार है, किंतु हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आखिर कोई सरकार किसी को हिंसा करने या कानून हाथ में लेने का अधिकार कैसे दे सकती है? कानून और व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है और इस जिम्मेदारी से कोई राज्य सरकार कैसे बच सकती है?

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के प्रमुख विमल गुरुंग ने ममता बनर्जी की सरकार पर दबाव बनाने के लिए ही गोरखालैंड स्वायत्तशासी प्रशासन के मुखिया पद से इस्तीफा दिया, तो उसे स्वीकार करने में ममता ने भी तनिक देर नहीं की। ममता ने 2011 में गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) समझौता किया था। उस समझौते के आलोक में बीते वर्ष 29 जुलाई को 45 सीटों वाले जीटीए का चुनाव हुआ। उसमें गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को एकतरफा जीत मिली। जब जीटीए करार में पहाड़वासियों की लगभग सारी शिकायतें दूर कर ली गईं, तो फिर अलग राज्य के लिए आंदोलन का तुक कहां रह जाता है? मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार नहीं, कई बार, बल्कि बार-बार स्पष्ट किया है कि पहाड़ के विकास के लिए वह हरसंभव मदद कर रही हैं और हमेशा करेंगी, किंतु अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को वह कतई स्वीकार नहीं करेंगी।

ममता ही क्यों, कोई भी राज्य सरकार अपने प्रदेश का बंटवारा क्यों चाहेगी? ध्यान रखना होगा कि कोई भी आंदोलन लोकतांत्रिक तरीके से ही निर्णायक परिणति तक पहुंच सकता है। कार्बी आंग्लांग के आंदोलनकारियों की तरह गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने हिंसा फैलाकर अलोकतांत्रिक रास्ता चुना है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को इसका भी जवाब देना होगा कि उसने हथियार के बल पर जिस तरह सुभाष घीसिंग को पहाड़ से बाहर कर रखा है, क्या वह लोकतांत्रिक है? जिस तरह अखिल भारतीय गोरखा लीग के नेता मदन तमांग की दार्जिलिंग में 21 मई 2010 को हत्या कर दी गई, क्या उससे लोकतंत्र पर धब्बा नहीं लगा था? उत्तर बंगाल तथा असम के आंदोलनकारियों को यह भी समझना होगा कि तेलंगाना से न तो दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र की तुलना की जा सकती है, न कार्बी आंग्लांग की।
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