फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कांग्रेस की उम्मीद का आखिरी चिराग

Sun, 20 Oct 2013 05:53 PM IST
तवलीन सिंह
विज्ञापन
विज्ञापन
जब से नरेंद्र मोदी का साया दिल्ली की गद्दी पर मंडराने लगा, तभी से राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस के 'ब्रह्मास्त्र' के चर्चे होने लग गए थे। कुछ महीने पहले जब मोदी के देश भर में दौरे शुरू नहीं हुए थे, मेरे एक कांग्रेसी दोस्त ने मुझे इन शब्दों में यह बात कही, 'आप लोग जानते नहीं हो कि हमारे पास एक ब्रह्मास्त्र है, जो नरेंद्र मोदी को पूरी तरह बेअसर कर सकता है। उस ब्रह्मास्त्र का नाम है, प्रियंका गांधी। ठीक समय पर हम इसका इस्तेमाल करेंगे, फिर देखना क्या होता है।'
विज्ञापन


इसलिए मुझे आश्चर्य नहीं हुआ पिछले हफ्ते जब इलाहाबाद में दिखे वे बड़े-बड़े होर्डिंग, जिन पर थी मुस्कराती प्रियंका गांधी की बड़ी-सी तस्वीर इन शब्दों के साथ, 'मइया अब रहती बीमार, भइया पर बढ़ गया है भार, प्रियंका फूलपुर से बनो उम्मीदवार, पार्टी का करो प्रचार, कांग्रेस की सरकार बनाओ तीसरी बार।'

माना कि कांग्रेस आलाकमान की तरफ से फौरन नाराजगी जताई गई और उन कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की गई, जिन्होंने इतने स्पष्ट शब्दों में सोनिया जी की बीमारी का जिक्र किया था, लेकिन जिन लोगों का आना-जाना रहता है 10 जनपथ से, वे चुपके से इस बात को जगह-जगह फैला रहे हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष बहुत थक जाती हैं आजकल, और तकरीबन तय हो गया है कि अगला चुनाव नहीं लड़ेंगी। इसलिए पहली खबर तो यह थी कि प्रियंका रायबरेली से खड़ी होंगी।
विज्ञापन


सवाल यह है कि अगर अफवाहें सच साबित होती हैं और प्रियंका राजनीति में आ जाती हैं, तो क्या वह ब्रह्मास्त्र बन सकती हैं कांग्रेस के लिए? अगर देश भर में प्रचार करने का फैसला वह करती हैं, तो क्या वास्तव में मोदी को कड़ा मुकाबला दे सकती हैं? यह सवाल अहम इसलिए है कि प्रियंका न सिर्फ इंदिरा गांधी की नवासी हैं, शक्ल सूरत से भी दादी की तरह दिखती हैं और इस देश के गरीब, बेहाल आम आदमी से घुल-मिल भी लेती हैं दादी की तरह।

ऊपर से इसमें भी कोई शक नहीं है कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इंदिरा जी को स्नेह से याद करते हैं। कई बार मुझे मिले हैं देहाती दौरों पर ऐसे लोग, जो कहते हैं, 'राज तो इंदिरा जी कर गई थीं, उनके बाद किसी ने नहीं किया।' तो क्या प्रियंका के आ जाने से ताजा हो जाएंगी उनकी दादी की पुरानी यादें?

ऐसा होगा या नहीं, वह तो चुनाव के बाद ही पता लगेगा, लेकिन अभी से अगर कोई चीज कह सकते हैं हम, तो वह यह कि कांग्रेस पार्टी के लिए प्रियंका उम्मीद का आखिरी चिराग बन गई हैं। इसलिए कि भैया ने बहुत निराश कर दिया है कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को। न तो उनकी सभाओं में वह जोशीली भीड़ दिखती है, जो मोदी की आम सभाओं में दिखती है और न ही राहुल गांधी की तकरीरों में कोई ऐसी बात है, जिसको सुनकर किसी को प्रेरणा मिले।

उनके समर्थक अगर रह गए हैं कहीं, तो दिल्ली के सत्ता गलियारों में, जिन्होंने खूब कोशिश की उनके 'बकवास' वाले बयान के बाद उन्हें एक इंकलाबी नौजवान राजनेता के रूप में पेश करने की। खूब हल्ला मचा अखबारों में, खूब तस्वीरें छपीं, लेकिन बात फिर भी नहीं बनी। इसलिए प्रियंका के साथ बंध गई हैं कांग्रेस की उम्मीदें।

समस्या लेकिन यह है कि अगर प्रियंका के राजनीति में आने की अफवाहें सच निकलती भी हैं, तो शायद कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, क्योंकि अब बहुत देर हो चुकी है। किस तरह जवाब देंगी वह उन सारे सवालों का, जो नरेंद्र मोदी अपनी हर आम सभा में उठाते हैं। परिवारवाद से जुड़े सवाल, भ्रष्टाचार से जुड़े सवाल, सुशासन से जुड़े सवाल। आज तक प्रियंका का राजनीतिक अनुभव सिर्फ इतना रहा है कि उन्होंने अपने भैया और अपनी मां के लिए रायबरेली और अमेठी में प्रचार किया है। क्या यह काफी है नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए?

प्रियंका की चर्चा शुरू कर कांग्रेस ने फिर साबित कर दिया है कि उसके पास गांधी परिवार के अलावा कुछ बचा ही नहीं है जनता के सामने रखने के लिए। देश की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का अगर यह हाल है, तो देश की राजनीतिक प्रणाली का क्या हाल होगा? गर्व से कहते फिरते हैं हमारे राजनेता कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, लेकिन कैसा लोकतंत्र है यह, जहां राजनीतिक सोच से ज्यादा अहमियत रखता है परिवारवाद।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें