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शोर और सुर की लड़ाई है!

Sat, 20 Jul 2013 08:41 PM IST
उस्ताद शाहिद परवेज खान/मशहूर सितारवादक
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यह आंखों से संगीत को सुनने का दौर है। हमारे आस-पास आवाजों का घेरा इतना आक्रामक और अभेद्य हो गया है कि हम कभी-कभी खुद अपनी ही आवाज नहीं सुन पाते। हर कोई शोर के फंदे में है। राजनीति का शोर, बाजार का शोर, आगे बढ़ने का शोर, पीछे रह जाने का शोर। ऐसे में सितार की आवाज पर कितने लोग भरोसा कर पाएंगे और कितने लोगों को अपने कानों पर भरोसा है। फिर भी एक सितारवादक होने के नाते मैं निराश नहीं हूं।
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भले ही, दुनिया आंखों से संगीत सुन रही हो, कभी न कभी कान भी तो जागेंगे। लोग कहते हैं, शास्त्रीय संगीत जमाने के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता है इसलिए लोगों का साथ छूट रहा है। मेरा मानना है कि शास्त्रीय संगीत हर पल जमाने के साथ है और जमाना बदलता है तो यह भी बदल जाता है। मैं संगीत के इटावा घराने से हूं। संगीत की सेवा में अपना जीवन अर्पित कर देने वाले परिवार की मैं सातवीं पीढ़ी हूं। मेरी जड़ें मुगल शासक अकबर के नवरत्न तानसेन तक जाती हैं। मेरे दादा उस्ताद वाहिद खान थे और मेरे अब्बा उस्ताद अजीज खान।

लेकिन क्या मेरे दादा जो बजाते थे, क्या वही मैं बजा रहा हूं! साज वही, सुर वही, फिर भी क्या मैं वही बजा रहा हूं। हर्गिज नहीं। संगीत से ज्यादा परिवर्तनकारी कोई कला नहीं और शायद यही इकलौती कला है, जो चलकर दूसरों के पास पहुंचती है। किताब अलमारी में रखी रह जाएगी। चित्रकला दीवार पर टंगी रह जाएगी। लेकिन अगर मैं एक कमरे में बैठकर सितार के तार छेड़ दूं तो सुर दूसरे कमरे में बैठे किसी शख्स के पास खुद-ब-खुद पहुंच जाएंगे। किताब लेने के लिए आपको उठना पड़ेगा। पेंटिंग देखने के लिए उसके पास जाना पड़ेगा। लेकिन आप बैठे रहिए, संगीत आपके पास आ जाएगा। तो संगीत जमाने के साथ है। यह अलग बात है कि आपके संगीत में शोर ज्यादा है या सुर। हां, शोर की भी एक ताकत होती है, लेकिन कुछ दिनों के लिए। सुर सदियों के लिए बने हैं।
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मैंने दुनिया के कई देशों में, कई बड़ी-बड़ी हस्तियों के सामने सितार बजाया है, लेकिन वाहवाही पाने के मकसद से नहीं। हर कलाकार हौसला अफजाई चाहता है लेकिन अज्ञानियों की भीड़ से अच्छा है कि शास्त्रीय संगीत की बारीकियों के जानकार कार्यक्रम में शरीक हों, भले ही उनकी संख्या कम हो। इस समय संगीत की दुनिया में शोर का बोलबाला है। भारतीय संगीत पूरी तरह से पश्चिमी देशों से प्रभावित नजर आता है। लेकिन यह कोहरा जल्द छंटेगा। हम अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे। और एक वजह यह है कि बहुत से शास्त्रीय संगीतकार खोज नहीं करते। वह नया करने का जोखिम शायद नहीं लेना चाहते। इसका असर परिवेश पर पड़ता है।

इटावा घराने की शैली को लेकर मैंने कई प्रयोग किए और मैं खुद को महान उस्ताद विलायत खान के करीब भी पाता हूं और पंडित रविशंकर जी के भी। पर यह सब एक दिन में नहीं हो जाता। बचपन में घर से मिली गुरु-शिष्य परंपरा की तालीम ने मेरे जीवन की दिशा तय कर दी थी। पिता ने बचपन से संगीत सिखाने के लिए कठोर साधना कराई और मैंने भी एक आज्ञाकारी शिष्य की भांति उसका पालन किया। तीन साल की उम्र में मुझे खिलौनों की जगह छोटा सितार पकड़ा दिया गया और यहीं से शुरू हो गया मेरे संगीत का सफर। शुरुआत में मजा आया, लेकिन बाद में साधना कठिन होती गई। मैं लगातार आठ से दस घंटे अभ्यास करता रहता, लेकिन मेरे अब्बा प्रदर्शन से कभी संतुष्ट न होते। जब मेरी पहली संगीत सभा का आयोजन हुआ तब मैं सिर्फ आठ बरस का था।

इस सभा में बड़े गुलाम अली खान जैसी शास्त्रीय संगीत की जानी मानी हस्ती भी मौजूद थी। मेरा सितारवादन उनके दिल को छू गया और उन्होंने हौसला बढ़ाते हुए मुझे इनाम में पांच रुपए दिए। हालांकि मेरे अब्बा ने इस तरह कभी सार्वजनिक ढंग से तारीफ नहीं की और न ही अपने किसी दोस्त को करने दी। वे मानते थे कि अगर वह अपने बेटे की तारीफ करेंगे तो वह इसका मोल नहीं समझ पाएगा। यह बात मुझे समझ में आ गई थी और मैंने श्रोताओं के लिए नहीं, बल्कि खुद के लिए संगीत साधना शुरू कर दी।

सितार के साथ-साथ मैंने गायन और तबले की भी तालीम ली है। इटावा घराने के ज्यादातर संगीतकारों की तरह सितार पर बंदिशों की धुन बजाने से पहले मैं उन्हें गाता भी हूं। मेरे संगीत के इस सफर में कई पड़ाव आए, पुरस्कार आए और आलोचनाएं भी। लेकिन एक शागिर्द की तरह आज भी सितार के साथ हूं। मैं नए संगीतकारों से सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि कला और कामयाबी, ये दोनों चीजें अलग हैं। असली चीज कला है और कामयाबी उसकी परछाईं। मैंने हमेशा असली चीज पकड़ी है और परछाईं तो अपने आप साथ चलती है।
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