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त्योहार: इस दिवाली निभाएं कुछ जिम्मेदारियां, बचाएं घर और बाहर का पर्यावरण

विवेक एस अग्रवाल
Updated Fri, 17 Oct 2025 07:10 AM IST

सार

घरों की सफाई वातावरण को स्वच्छ करती है, तो गैर-जरूरी खरीदारी से क्षति पहुंचती है। संतुलन व नियंत्रण से त्योहार की रौनक बनी रहेगी, तो पर्यावरण भी संरक्षित रहेगा।
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देव दीपावली - फोटो : अमर उजाला


भारत में त्योहारों के अवसरों पर खरीदारी में विस्फोटक रूप से बढ़ोतरी होती है, वहीं पश्चिमी देशों में भौतिकता एवं दिखावे का प्रभाव ज्यादा होने से इनकी खरीद एवं चलन सामान्य दिनों में भी बढ़ोतरी की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। इसी को दृष्टिगत रखते हुए यूरोपीय संघ ने हाल ही में विशेष कानून पारित करते हुए खाद्य एवं वस्त्र से उपजे अपशिष्ट पर 2030 तक कमी लाने के उद्देश्य से लक्ष्य तय किए हैं। हालांकि, भारत में 2014 के बाद कचरा प्रबंधन को लेकर काफी जागृति आई है, किंतु आज भी प्रचलित कानून में कचरा उत्पादनकर्ता की अपेक्षा सरकारी स्थानीय निकाय संस्थाओं को ही जिम्मेदार ठहराया गया है। लोग खाद्यान्न भी बर्बाद कर रहे हैं।  हालांकि, भारत में खाद्यान्न अपशिष्ट यूरोप की अपेक्षा काफी कम मात्र 55 किलो प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष है, लेकिन यदि इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो इसे यूरोप के समकक्ष आने में देर नहीं लगेगी। इस संदर्भ में यूरोपीय कानून से सबक लेते हुए वर्तमान में जब कचरा प्रबंधन का उचित माहौल बना हुआ है, उपभोक्ता एवं उत्पादनकर्ता को उत्तरदायी बनाया जाना आवश्यक एवं उचित होगा।


भारत में दिवाली सभी वर्गों का त्योहार माना जाता है, लेकिन इस अवसर पर संतुलन और नियंत्रण, दोनों ही गड़बड़ा जाते हैं। विगत कुछ दशकों में मिठाई, मेवे, चॉकलेट समेत खाद्य एवं पेय सामग्री के आदान-प्रदान संबंधी व्यवस्था का प्रचलन भी बेतहाशा बढ़ गया है। खास तौर पर तथाकथित प्रभावशाली एवं पदस्थ व्यक्तियों के यहां विभिन्न माध्यमों से हजारों किलो तक मिठाई इत्यादि पहुंच जाती है, जिसका उन्हें भी अंदाजा नहीं रहता और परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में वह बर्बाद हो जाती है। कुछ वर्ष पूर्व अन्नक्षेत्र नामक संस्था ने प्रभावशाली पदस्थ व्यक्तियों से शपथपत्र के माध्यम से अधिशेष मिठाई, नमकीन आदि एकत्रित करने का प्रकल्प प्रारंभ किया था, जिसके जरिये जयपुर शहर में एक बार में ही कई टन मिठाई को बर्बाद होने से न केवल बचाया गया, बल्कि वह अनेक लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने का माध्यम भी बन गया।


बर्बादी को रोकने के लिए कानून सिर्फ जरिया बन सकता है, किंतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण है व्यवहार में परिवर्तन लाना। आवश्यकताओं का सही आंकलन करते हुए सीमित रखने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में पैकेजिंग व्यवस्था को भी पुनः परिभाषित करने की जरूरत है। चलन में आम तौर पर 250 ग्राम से लेकर एक किलोग्राम तक के मिठाई पैकेट रहते हैं। त्योहारी बिक्री में एक किलोग्राम का पैक सबसे ज्यादा बिकता है। यदि सत्कार रूप में मिठाई इत्यादि की भेंट को दिखावे से हटकर छोटे पैकेट में तब्दील कर दिया जाए, तो वह अधिक उपयोगी होने के साथ बर्बादी भी रुकेगी। इस दिवाली उत्तरदायी होने के लिए यदि हम भेंट की जाने वाली वस्तुओं की मात्रा की अपेक्षा गुणवत्ता पर ध्यान दें, तो प्रदूषण एवं विषमता, दोनों पर नियंत्रण पा सकते हैं।

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