किसी भी समाचार का केंद्रीय विषय बलात्कार बन जाए, तो यह मनोचिकित्सकों और सभ्य नागरिकों के लिए चिंता का विषय है। छोटी-छोटी बच्चियों से बलात्कार और उनकी हत्या समाज के कुछ लोगों में बढ़ती हैवानियत का प्रमाण है। सरकारी आंकड़ों पर ही विश्वास करें, तो वर्ष 2014 में कुल 3,39,954, वर्ष 2015 में 3,29,243 और 2016 में 3,38,954 स्त्रियों के साथ अपराध के मामले पंजीकृत हुए हैं।
इनमें से बलात्कार के आंकड़े प्रति वर्ष 35 से 36 हजार के लगभग हैं और सर्वाधिक शिकार 18 से 30 वर्ष की महिलाएं हैं। आज शोहदों के डर से लड़कियां कॉलेज जाना छोड़ रही हैं। वे घर से अकेले निकलने में डरती हैं।
थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के अनुसार, औरतों के लिए भारत सबसे खतरनाक देश है। 2011 में भारत चौथा सबसे खतरनाक देश था। इस आकलन को सरकार ने गलत बताया है। संभव है, सरकार का कहना सही हो, परंतु इस नतीजे पर पहुंचने वाली संस्था ने पांच बिंदुओं पर गहन सर्वेक्षण करके यह निष्कर्ष निकाला है। सर्वेक्षण का पहला बिंदु यह है कि समाज में महिलाओं का स्वास्थ्य कैसा है? स्वास्थ्य का मानव जीवन स्तर से गहरा नाता होता है। ऐसे में अगर वहां स्त्रियां स्वस्थ हैं, तो निश्चय ही समाज का जीवन स्तर बेहतर है। बेहतर जीवन स्तर अपराध को कम करता है।
दूसरा, आर्थिक संसाधनों के मामलों में महिलाओं के साथ भेदभाव का स्तर क्या है? आर्थिक संसाधन स्त्री को स्वावलंबी बनाते हैं और वह अकारण अनुचित दबावों से मुक्त रह सकती है।
तीसरा मानक यह है कि समाज विशेष के रीति-रिवाजों में महिलाओं को कितनी समानता मिली हुई है? रीति-रिवाज, घर और समाज की संस्कृतियों को दर्शाते हैं। अगर वहां स्त्री को समान अधिकार प्राप्त है, उसके साथ भेदभाव नहीं किया जा रहा, तो इसका मतलब है कि समाज में स्त्री पुरुष के समान सहकर्मी है।
चौथा बिंदु यह कि उस समाज में यौन अपराध के आंकड़े क्या तस्वीर प्रस्तुत करते हैं? और अंतिम बिंदु यह कि स्त्रियों के प्रति अन्य अपराध के आंकड़े (घरेलू हिंसा, उनकी तस्करी और अपहरण) क्या तस्वीर प्रस्तुत करते हैं? उपरोक्त बिंदुओं के मूल्यांकन में कुल मिलाकर दुनिया में हमारी छवि प्रभावित हुई है, जो हमारे लोकतांत्रिक देश के लिए बदनुमा दाग से कम नहीं है।
बलात्कार की बढ़ती घटनाओं और यौन हिंसा को महज कानून बनाकर खत्म नहीं किया जा सकता। शहर से लेकर गांव-देहातों में जो अशिक्षित और गैरबराबरी का समाज निर्मित हो रहा है, वहां हैवानियत पर नियंत्रण के सामाजिक बंधन टूट रहे हैं। गांव-देहातों में थानों के सहारे कानून का पालन कम होता है और स्थानीय कारक ज्यादा प्रभावी होते हैं। ऐसे में समाज को सभ्य और सुसंस्कृत बनाने के लिए सामाजिक न्याय स्थापित करने की दिशा में तेजी से काम करना होगा।
सरकार ने बारह साल तक की बच्चियों से बलात्कार करने वाले को मृत्युदंड देने का विधेयक तैयार किया है, जो शायद इसी मानसून सत्र में पारित भी हो जाए, मगर हमें यह भी सोचना होगा कि समाज के अंदर पनपती इस विकृत सोच से निपटने के लिए हम क्या कर सकते हैं। देश के समाज सुधारकों, बुद्धिजीवियों, मनोचिकित्सकों और साहित्यकारों, सभी के साथ मिल-बैठकर इस सामाजिक विकार को शीघ्र दूर करने की पहल करनी चाहिए, अन्यथा दुनिया की नजरों में हम बहुत घिनौने बन जाएंगे।