फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

विकास में बाधक है क्षेत्रीयता की भावना

रिखिल आर. भवनानी और बेथानी लासिना Published by: Raman Singh Updated Mon, 04 Mar 2019 06:57 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
प्रवासन

पश्चिम में, ब्रेग्जिट और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप व हंगरी में विक्टर ओरबान जैसे दक्षिणपंथी लोकप्रिय नेताओं के उदय के लिए भूमंडलीकरण को दोषी ठहराया गया है। खासकर अनेक लोगों ने यह तर्क दिया है कि अनियंत्रित अंतरराष्ट्रीय प्रवास (जो भूमंडलीकरण का एक प्रमुख रूप है) ने स्वदेशी भावना से संबंधित विरोध को जन्म दिया है। विकासशील दुनिया लंबे समय से ऐसे विरोध की आदी रही है। हालांकि विकासशील देशों में क्षेत्रीय भावना से जुड़े इस विरोध का केंद्र अंतरराष्ट्रीय प्रवास के बजाय अक्सर दूसरे राज्यों से आए लोगों पर रहता है। भारत में इस तरह के संघर्ष के प्रमुख उदाहरणों में स्वदेशी या 'माटी के लाल' को लेकर मुंबई और असम की राजनीति है।



अपनी नई पुस्तक नेटिविज्म ऐंड इकोनोमिक इंटिग्रेशन एक्रॉस द डेवलपिंग वर्ल्ड में हमने विकासशील दुनिया में घरेलू पलायन के खिलाफ उपजे विरोध को रेखांकित किया है। विकासशील दुनिया में हर जगह आर्थिक विकास और एकीकरण आंतरिक या घरेलू पलायन के साथ हुआ है। यह पलायन उन जगहों पर मानव संसाधन लाता है, जहां उन्हें सबसे अधिक मूल्यवान माना जाता है। इसी के साथ पलायन और स्वाभाविक जनसंख्या वृद्धि आर्थिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाती है और संसाधनों का खिंचाव उन जगहों पर होता है, जहां प्रवासी टिकते हैं। मुंबई में 'मूल' निवासियों ने इस तरह के विकास का अक्सर विरोध किया है। पलायन के कारण उन जगहों पर मूल निवासी की राजनीति होने की आशंका ज्यादा रहती है, जहां स्थानीय स्तर पर चुनाव रहते हैं। यह राजनेताओं को बाहरी लोगों के खिलाफ स्थानीय लोगों को परिभाषित करने और उन्हें विशेषाधिकार देने का कारण बनता है। विश्व बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों द्वारा आगे बढ़ाए गए राजनीतिक विकेंद्रीकरण ने उप-शासन के नए स्तरों का निर्माण किया है, जिस पर मूल निवासियों द्वारा आसानी से कब्जा जमाया जा सकता है।


कुछ समय पहले तक विद्वानों के पास घरेलू पलायन से संबंधित व्यवस्थित आंकड़े का अभाव था। अपने श्रमसाध्य कार्य के माध्यम से ऑस्ट्रेलिया के कुछ विद्वानों की टीम ने 21 विकासशील देशों के लिए 'प्रवास का ढांचा' तैयार किया। हमने विभिन्न रूपों के स्वदेशीवाद और घरेलू प्रवास के बीच संबंध की जांच करने के लिए इन आंकड़ों का उपयोग किया। जैसा कि हमने अपनी पुस्तक में दिखाया है, घरेलू प्रवास लैटिन अमेरिका में 'स्वदेशी दलों' के उदय से जुड़ा है, जिसने विशेष रूप से भूमि पर स्वदेशी समुदायों की मांगों को जन्म दिया। आंकड़े बताते हैं कि 21 देशों के 526 क्षेत्रों में आंतरिक पलायन और घरेलू दंगे के बीच मजबूत सकारात्मक संबंध है। अगर हम अलग-अलग देशों के आंकड़ों को देखें, तो 21 देशों में से 18 देशों में आंतरिक प्रवास और दंगे सकारात्मक रूप से संबद्ध हैं। शेष दो देशों में दंगे नहीं हुए।


स्वदेशीवाद पर पलायन के प्रभाव की जांच में आम तौर पर दो तरह की समस्याएं सामने आती हैं। पहला, सामाजिक-आर्थिक अवसर जैसे आकलन कर पाने में कठिन कई तथ्यों को स्वदेशीवाद और प्रवास गंतव्य, दोनों से विश्लेषित किया जा सकता है। दूसरा, कार्य-कारण की दिशा उलट हो सकती है : अगर पलायन लोगों में अपने देश की भावना पैदा कर सकता है, तो स्वदेश की इस सोच से भी पलायन के पैटर्न को प्रभावित करने की संभावना है। इन समस्याओं से निपटने के लिए हम भारत में प्राकृतिक आपदा से प्रेरित पलायन पर ध्यान केंद्रित करते हैं। बाढ़ और सूखे से पलायन को आश्चर्यजनक रूप से गति मिलती है। आंतरिक पलायन अक्सर प्रवासी-विरोधी राजनीति के उदय से जुड़ा होता है, क्योंकि पार्टियां मूल निवासी की भावनाओं को संतुष्ट करती हैं या नई पार्टियां ऐसी ही भावनाओं को संतुष्ट करने के लिए उभरती हैं। महाराष्ट्र में घरेलू पलायन ने शिवसेना के उदय को बढ़ावा दिया, जो 1970 के दशक तक दक्षिण भारतीय प्रवासियों के खिलाफ संघर्ष कर रही थी, फिर 1980 और 1990 के दशक में उसने अपना ध्यान मुस्लिम प्रवासियों पर केंद्रित किया और उसके बाद उसने उत्तर भारतीयों, खासकर बिहारियों को अपना निशाना बनाया। हमने पाया कि जब प्राकृतिक आपदाओं के कारण महाराष्ट्र के कुछ जिलों में प्रवासी पहुंचे, तो उन जिलों में बाद के चुनावों में शिवसेना के समर्थन की संभावना बढ़ गई।


भारत में स्थानीय सरकारें भी कथित मूल निवासियों का पक्ष लेती हैं और घरेलू प्रवासियों के साथ भेदभाव करती हैं। राज्य सरकारें राज्य से बाहर के कुछ ही प्रवासियों को नियुक्त करती हैं। भारत सरकार ने 1990 के दशक के प्रारंभ में बड़े पैमाने पर विकेंद्रीकरण सुधारों को लागू किया और 2,00,000 गांवों, तालुका और जिला स्तर पर स्थानीय सरकारों का गठन किया। तब से हर स्तर पर प्रतिस्पर्धी चुनाव होते हैं, राजनेताओं को अपने मतदाताओं को परिभाषित करने और उनकी मांगों को पूरा करने के लिए भारी चुनावी प्रलोभन देना पड़ता है। राज्य सरकारों ने विकेंद्रीकरण सुधारों के बाद कम घरेलू प्रवासियों को काम पर रखा।


आंतरिक प्रवास आर्थिक विकास के लिए सबसे सुरक्षित रास्तों में से एक है। जैसे-जैसे लोग उप-राष्ट्रीय सीमाओं को पार करते हैं, वे कहीं भी जाने की स्वतंत्रता के अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं और स्वयं में काफी सुधार करते हैं। ऐसे में, पलायन में बाधा डालने वाली क्षेत्रीयता की भावना घरेलू पलायन की संभावनाओं को ही कम कर देती है। सवाल यह है कि ऐसे में हम घरेलू पलायन की संभावनाओं को साकार करते हुए इसके खिलाफ उभरे विरोध को कैसे कम कर सकते हैं। केंद्र सरकार न केवल उन क्षेत्रों में, जहां लोग पहुंच रहे हैं, बल्कि उन क्षेत्रों में भी, जहां से लोग बाहर निकल रहे हैं, संसाधनों का पुनर्वितरण कर सकती हैं। इससे जहां बढ़ते पलायन से स्थानीय लोगों में आक्रोश नहीं होगा, वहीं पलायन पर भी अंकुश लगेगा। अन्य विद्वानों की तरह हमने भी यह पाया है कि भारत सरकार उन राज्यों को आवंटन देने के मामले में ज्यादा उदार है, जहां प्रधानमंत्री की सहयोगी पार्टियों की सरकारें हैं। अगर भारत सरकार राज्यों के बड़े गठबंधन से शक्ति हासिल करती है, तो आतंरिक पलायन की चुनौती का प्रबंधन करने की ज्यादा संभावना है।


 रिखिल आर. भवनानी यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन में और बेथानी लासिना यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next