दूसरा मामला, झारखंड से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने यह कहकर नया विवाद खड़ा कर दिया है कि झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार के कुछ हिस्सों को मिलाकर नया केंद्रशासित प्रदेश बना देना चाहिए। इस बयान को भी ममता बनर्जी ने आड़े हाथों लिया और कहा कि वह बंगाल का विभाजन नहीं होने देंगी। इससे झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी आग-बबूला हो सकते हैं। निशिकांत के बयान को इतनी गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। वह एक संसदीय क्षेत्र के जनप्रतिनिधि यानी सांसद के अलावा अन्य किसी जिम्मेदार पद पर नहीं हैं। लेकिन राजनीति में तिल का ताड़ बनते देर नहीं लगती। विपक्ष पहले से ही इस बात को लेकर हमलावर है कि भाजपा सरकार संविधान बदलना चाहती है। इस बयान को आधार बनाकर विपक्षी नेता आगामी कुछ महीनों में झारखंड, महाराष्ट्र, हरियाणा जैसे राज्यों में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों में भाजपा को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
राज्य सरकारों और राज्यपालों के बीच टकराव की खबरें भी राष्ट्रीय समाचारों की सुर्खियां बनती रही हैं। इनमें तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केरल की सरकारों के राज्यपालों से टकराव तो अदालतों तक पहुंच चुके हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद संसद में विपक्ष के मजबूत होने से संघवाद बनाम क्षेत्रवाद की लड़ाई कम होने के बजाय बढ़ती दिख रही है।
लोकसभा चुनाव में एक तरफ सत्ताधारी दल भाजपा प्रभावशाली थी, तो दूसरी तरफ उसके विरोध में कई प्रांतों में क्षेत्रीय दल उठ खड़े हुए। यानी प्रतिस्पर्धा द्विदलीय न होकर भाजपा बनाम क्षेत्रवाद बन गई। दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में द्रमुक ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी। चुनाव के पहले से ही मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और राज्यपाल आरएन रवि के बीच टकराव था। यहां तक कि राज्यपाल ने राज्य के संयुक्त विधानसभा सत्र की बैठक में अभिभाषण (जो राज्य सरकार द्वारा लिखित एवं अनुमोदित होता है) पढ़ने से इन्कार कर दिया था। ऐसा ही कुछ केरल में भी हुआ। यहां राज्यपाल आरिफ मुहम्मद खान एवं वामपंथी गठबंधन के मुख्यमंत्री पी विजयन के बीच सर्वाधिक मतभेद विश्वविद्यालयों में
कुलपति नियुक्ति को लेकर हुआ। कहने का मतलब कि हर मुद्दे पर जमकर राजनीतिक बहसबाजी हुई और राज्य सरकारों ने न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया। हालांकि कानूनी मसले थोड़े क्लिष्ट हैं, किंतु इससे स्पष्ट होता है कि वास्तव में यह लड़ाई राजनीतिक है। इस राजनीतिक दंगल का सबसे बड़ा प्रतिरूप पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल में भी देखा जा रहा है। यहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा से जमकर लोहा ले रही हैं। पिछले विधानसभा चुनाव (2021) में पश्चिम बंगाल में भाजपा ने बड़ी मुहिम चलाई थी। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने चुनाव अभियान की बागडोर अपने हाथों में रखी। लेकिन ममता बनर्जी बांग्ला अस्मिता के नाम पर क्षेत्रवाद का झंडा बुलंद कर फिर से सत्ता में लौट आई।
अब तक माना जाता रहा है कि राज्यों के चुनाव में ही स्थानीय मुद्दे हावी होते हैं, लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव में कुछ राज्यों में राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय क्षेत्रीयता हावी रही। इस राजनीतिक लड़ाई के बीच जनता ने स्पष्ट किया कि भारत राज्यों की संघीय व्यवस्था है। पहली बार पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस न्यायालय के सहयोग से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा उनके ऊपर की जाने वाली टिप्पणियों पर प्रतिबंध लगा पाए हैं।
वहीं ममता बनर्जी ने भी सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह गुहार लगाई है कि विधानसभा द्वारा पारित या राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित आठ विधेयकों को राज्यपाल ने लंबे समय से लटकाए रखा है। राज्य के विश्वविद्यालयों में कुलपति की नियुक्ति का मामला भी अधर में लटका हुआ है। न्यायालय ने राज्यपाल कार्यालय और केंद्र सरकार को इस मामले में नोटिस भी जारी कर दिया है। राज्यपाल इन आरोपों का खंडन करते हैं। कुल मिलाकर मामला भले ही न्यायालय में लड़ा जा रहा हो, पर यह वास्तव में केंद्र बनाम राज्य तथा संघवाद के ऊपर छिड़ी सघन राजनीतिक लड़ाई है।
संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्यों की शक्तियों (संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची) का बंटवारा किया गया है। फिर भी केंद्र और राज्यों के बीच हितों और शक्तियों के उपयोग को लेकर समय-समय पर टकराव देखे जाते रहे हैं। लेकिन राजनीतिक गुलेल चलाने से संघीय प्रणाली नहीं बदलने वाली है। नीति आयोग की बैठक में गैर-भाजपा मुख्यमंत्रियों का हिस्सा न लेना, ममता बनर्जी का बैठक छोड़कर बाहर आना, निशिकांत दुबे के बयान को तूल देना यह सब राजनीतिक तिकड़मबाजी है। संघवाद बेहतर चले इसके लिए केंद्र तथा राज्यों में सौहार्द्र बनाए रखने की आवश्यकता है, ताकि शासन-प्रशासन सुचारू ढंग से चले।