अमेरिका में चुनाव का मौसम है, गिरते बाजार और मंदी की खबरें सरकारों को नहीं सुहातीं। फेडरल रिजर्व अमेरिकी अर्थव्यवस्था का पुराना नायक भी है और खलनायक भी। पूंजीवाद की महापीठ अमेरिका में महंगी पूंजी यानी ऊंची ब्याज दर को बिसूरने वाले बहुतेरे हैं। कोविड के बाद महंगाई बढ़ी, तो फेडरल रिजर्व ने कर्ज महंगा किया। बाजार में कम पूंजी आई और यह दवा चाटकर महंगाई का बढ़ना रुक गया। अलबत्ता महंगाई गई नहीं।
फेडरल रिजर्व सख्त है। उसकी सख्ती कुछ इस कदर बढ़ी है कि अमेरिकियों को लग रहा है कि फेडरल रिजर्व मंदी बुलाकर ही मानेगा। अमेरिकी सियासत का अतीत फेडरल रिजर्व को लेकर बड़ा ही रोमांचक रहा है। अगर आपको लगता है कि अमेरिकी सियासत में सबसे ज्यादा विवादित नेता डोनाल्ड ट्रंप हैं, तो आइए बैठिए टाइम मशीन में, हम आपको मिलवाते हैं ऐसे राष्ट्रपतियों से, जिन्होंने केंद्रीय बैंक को मार दिया।
यह 1836 का अमेरिका है। हम सीधे वाशिंगटन पहुंचे हैं। खबर है कि सातवें राष्ट्रपति एंड्रयू जैक्सन ने बैंक ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स की कानूनी मान्यता बढ़ाने यानी रि-चार्टर के प्रस्ताव पर वीटो ठोक दिया...और अमेरिका का केंद्रीय बैंक यानी फेडरल रिजर्व का पूर्वज बंद (1836) कर दिया गया।
हम जिस दौर में हैं, अमेरिका के सातवें राष्ट्रपति एंड्रयू जैक्सन और तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन लोगों के नूरे-नजर हैं। ये दोनों राष्ट्रपति केंद्रीय बैंकों के जानी दुश्मन हैं। इन्होंने तय कर दिया कि आगे अमेरिका में कोई केंद्रीय बैंक नहीं होगा। अलबत्ता वक्त इनसे ज्यादा ताकतवर निकलेगा।
आइए, हम थोड़ा और पीछे चलते हैं। टाइम मशीन हमें उस काल खंड में ले आई है, जहां अमेरिकी आजादी की लड़ाई खत्म हो गई है। आजादी की लड़ाई ने अमेरिका को आर्थिक तौर पर तोड़ दिया है। अमेरिकी संविधान को मंजूरी (1789) मिल गई है। पहले वित्तमंत्री अलेक्जेंडर हैमिल्टन देश में कर्ज और पूंजी की समस्या दूर करने के लिए फेडरल बैंकिंग का प्रस्ताव लेकर आए हैं। अमेरिकी कारोबारियों के बीच बहस जारी है।
हैमिल्टन की तैयारी एक ऐसा बैंक बनाने की है, जो ब्रिटेन की उपनिवेशवादी मौद्रिक प्रणाली समाप्त कर नेशनल करेंसी लागू करेगा। अमेरिकी मुद्रा डॉलर होने वाली है। सियासत गर्म है। अमेरिका के पश्चिम हिस्से के कारोबारी इस बैंक का विरोध कर रहे हैं। राजनीतिज्ञ विभाजित हैं। अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित संस्थापक नेता, आजादी के प्रबल समर्थक और जॉर्ज वाशिंगटन की कैबिनेट में विदेश मंत्री थॉमस जेफरसन ने भी इस केंद्रीय बैंक का विरोध कर दिया है। वह कह रहे हैं कि अमेरिका का संविधान, फेडरल सरकार को बैंक बनाने और मुद्रा जारी करने का अधिकार नहीं देता है।
यह काम तो राज्यों को मिलेगा। वह कह रहे हैं, ‘केंद्रीय बैंक आम लोगों की आजादियों के लिए किसी हथियारबंद सेना से ज्यादा खतरनाक है।’ और यह लीजिए, अमेरिकी कांग्रेस में बखेड़ा हो गया। जेफरसन, जॉर्ज वाशिंगटन सरकार में विदेश मंत्री हैं और हैमिल्टन वित्तमंत्री। हैमल्टिन और जेफरसन के बीच तीखा विवाद हुआ है। अलबत्ता फेडरिलिस्ट पार्टी की मदद से 1791 में अमेरिका के केंद्रीय बैंक का प्रस्ताव मंजूर हो गया। बुरी तरह खफा थॉमस जेफरसन ने (1793) कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया है।
आगे बढ़ते हैं। यह 19वीं सदी की शुरुआत है। थॉमस जेफरसन व्हाइट हाउस में विराज रहे हैं। केंद्रीय बैंक को वह चलने नहीं देंगे। हैमिल्टन का केंद्रीय बैंक बीस साल तक चला। इसके बाद अमेरिकी संसद ने इसे मंजूरी नहीं दी। अब अमेरिका का केंद्रीय कर्ज और मौद्रिक ढांचा खत्म हो गया। विभिन्न राज्य उपनिवेश युग की तरह मुद्राएं जारी करने लगे हैं।
अब हम 19वीं सदी के पहले दशक में हैं। थॉमस जेफरसन का कार्यकाल 1809 में खत्म हो रहा है। केंद्रीय बैंक का विरोध ठंडा पड़ रहा है। अमेरिकी कांग्रेस ने आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए नए बैंक का प्रस्ताव मंजूर (1816) किया। यह अमेरिका का दूसरा केंद्रीय बैंक है। उम्रदराज होगा कि नहीं, इसकी गारंटी नहीं है। यह 1836 का दौर है और एंड्रयू जैक्सन राष्ट्रपति बने हैं। अमेरिकी राजनीति में बैंक वार शुरू हो गया है।
अखबार चीख रहे हैं कि राष्ट्रपति जैक्सन और बैंक ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स के अध्यक्ष निकोलस बिडेल के बीच सीधी लड़ाई हो रही है। राष्ट्रपति जैक्सन केंद्रीय बैंक को भ्रष्टाचार का गढ़ मानते हैं। उन्होंने अपने वीटो का इस्तेमाल कर केंद्रीय बैंक को खत्म कर दिया। अमेरिकी सरकार का पैसा अब केंद्रीय बैंक में नहीं जमा होगा। यह अमेरिका में फ्री बैंकिंग का दौर है। राज्यों में करीब 8,000 बैंक हैं, जो अगले 25 साल तक अपनी करेंसी चलाएंगे। इस बीच अमेरिका में सिविल वार शुरू हो गया है। लड़ते-जूझते अमेरिकियों को लग रहा है कि मुद्राओं की अराजकता अब बंद होनी चाहिए।
अब हम 19वीं सदी के मध्य में हैं। अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान (1863) नेशनल बैंकिंग ऐक्ट फिर आया है। इसके जरिये एकल मुद्रा प्रणाली स्थापित हो रही है। अलबत्ता कोई सेंट्रल या फेडरल बैंक नहीं बनाया गया है। नए कानून में अनुमति प्राप्त बैंकों को ही करेंसी जारी करने की छूट दी गई है। मुद्राओं की अराजकता बैंकिंग संकट लेकर आई है। यह बीसवीं सदी की शुरुआत है और विकेंद्रित सरकारी बैंक पूंजी की कमी से डूबने लगे हैं।
इन्हें पहचानते हैं आप...यह हैं जॉन पियरपांट मॉर्गन यानी जेपी मॉर्गन। तब के अमेरिका के धनाढ्य बैंकर और फाइनेंसर। अमेरिकी सरकार इनकी शरण में है। इनकी पूंजी से बैंक उबारे जा रहे हैं। मॉर्गन 19वीं सदी के अंत में सोना देकर सरकार को संकट उबार चुके थे। 21वीं सदी में लौट कर आप जेपी मॉर्गन चेज समूह से मिलेंगे, जो पुराने मॉर्गन का उत्तराधिकारी है।
अब हम वापसी की उड़ान पर हैं। अमेरिका में 1907 के बैंकिंग संकट से सबक सीखे जा रहे हैं। सियासत में लंबी चर्चा चली है। 1913 में फेडरल रिजर्व की स्थापना हुई। इसके बाद 1935 में अमेरिकी कांग्रेस बैंकिंग कानून के तहत फेडरल ओपन मार्केट कमेटी बनाएगी, जो 21वीं सदी में पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाली बैंकिंग नीतियां तय करेगी। टाइम मशीन का सफर न्यूयॉर्क में खत्म होगा, जहां शेयर बाजार फेडरल रिजर्व को उसी तरह कोस रहे हैं, जैसे जेफरसन-जैक्सन कोसते थे।
हम फिर मिलेंगे अगले सफर पर...