पानी की धारा बहुत ज्यादा तेज थी और मुझे अचानक घबराहट होने लगी-शायद मुझे उन्हें चेतावनी के तौर पर लेना चाहिए था। लेकिन उत्साह ने जीत हासिल की, और जब हम अगले दिन तट से दूर एक छोटी खाड़ी में गए, तो मैं फिर से पानी में उतरने के लिए उत्सुक था। जैसे-जैसे दिन की रोशनी कम होने लगी, मुझे लगा कि घर लौटने से पहले मुझे एक आखिरी बार डुबकी लगानी चाहिए। शाम होने लगी थी तथा लहरें और भी तेज हो गई थीं, लेकिन किनारे से देखने पर वे अब भी हानिरहित लग रही थीं। मैंने छलांग लगाई और आगे बढ़ गया। पहले तो मैं आश्वस्त था, लेकिन जब मैं अपनी गहराई से बाहर निकला, तब मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ। समुद्र की लहरें मेरे पैरों को नीचे की तरफ खींच रही थीं, और सतह के नीचे छिपी चट्टानें मेरे घुटनों और कोहनी को छू रही थीं, क्योंकि मैं तट पर वापस जाने के लिए संघर्ष कर रहा था। एक बड़ी लहर ने मुझे अपनी ओर खींचा और फिर मुझे समुद्र तल पर उछाल दिया। सांस लेने के लिए बेचैन मैं इधर-उधर हाथ-पैर मारता रहा। फिर धारा ने अपनी पकड़ ढीली कर दी और मैं ऊपर चला गया। लेकिन ठीक उसी समय अगली बड़ी लहर मेरे सिर के ऊपर से गुजरी और मुझे वापस नीचे धकेलने लगी थी। हर बार जब भी मैं पानी के ऊपर आने की कोशिश करता, लहरें मुझे नीचे की तरफ घसीट लेती थीं। तब तक मैं पूरी तरह से पस्त होकर थक चुका था, लेकिन अब भी मैं गहराई से बाहर नहीं निकल पाया था। इस बीच मैंने काफी पानी निगल लिया था, समुद्र तट पर पार्टी कर रहे लोगों की तरफ मैंने पागलों की तरह हाथ हिलाया। वे बैग पैक कर रहे थे और बातें कर रहे थे, मेरी ओर कम ध्यान दे रहे थे। एक या दो बार, किसी ने वापस हाथ हिलाया। उन्हें शायद ऐसा लग रहा था कि मैं लहरों में गोते लगा रहा हूं; लहरा रहा हूं, लेकिन डूब नहीं रहा हूं।
मुझे लगा कि मैं वास्तव में डूबने वाला था और किसी को पता नहीं था। मुझे अकेलेपन और अलगाव की तीव्र भावना का अनुभव हुआ, क्योंकि एक और लहर ने मुझे नीचे धकेल दिया। मैंने उन सभी मूर्खतापूर्ण जोखिमों के बारे में सोचा, जो मैंने बिना किसी परिणाम पर विचार किए उठाए थे। अपने काम में, मैंने बहुत से लोगों का साक्षात्कार लिया था, जो मौत के करीब की स्थितियों में फंसे थे; कुछ ने डर और घबराहट का उल्लेख किया था, तो कुछ ने हार मानने की भावना का। मैं असहाय महसूस कर रहा था। डर के बजाय, मैंने दुख का अनुभव किया : जो काम आपको पसंद है, उसे करते हुए मरना ठीक है, लेकिन यह मेरे जीवन की सबसे कम आनंददायक तैराकी थी। जैसे-जैसे मैं लहरों से जूझ रहा था, मेरे सीने के ऊपरी हिस्से में तेज दर्द उठा, जो नीचे और अंदर की तरफ फैल रहा था। मुझे लगा कि शायद मेरे फेफड़े और मेरा दिल काम करना बंद कर रहे हैं। वापस सतह पर आकर मैंने फिर से हाथ हिलाने की कोशिश की, लेकिन मैं अपना हाथ नहीं उठा सका तथा दर्द और असहनीय हो गया। लेकिन मैंने पाया कि मैं सांस लेने में सक्षम हूं, लेकिन इससे दर्द और भी बढ़ गया। हालांकि, अगली लहर ने मुझे कुछ राहत प्रदान की और मुझे किनारे की ओर ले गई। मेरे पैरों को आखिरकार सहारा मिला और मैं आगे की ओर लड़खड़ाते हुए बढ़ा, मेरा दाहिना हाथ बगल में लटक रहा था। मेरे जीजा को एहसास हुआ कि कुछ गड़बड़ है, इसलिए वह मुझे समुद्र तट पर ले जाने के लिए उथले पानी की तरफ दौड़े। उन्होंने कहा, ‘तुम्हारा कंधा उखड़ गया है।’ मैं तौलिया लपेटे समुद्र तट पर बैठा कांप रहा था। किसी ने मुझे कॉफी लाकर दी, लेकिन मैं ठंड से ज्यादा सदमे से पीड़ित था। मैं समुद्र से बचकर निकल आया था, लेकिन मुझे लग रहा था कि मैं सूखी जमीन पर डूब रहा हूं। मैं एंबुलेंस में किसी तरह गैस और हवा लेने में कामयाब रहा। अस्पताल में एक घबराए हुए ऑर्थोपेडिक डॉक्टर ने मेरे कंधे को वापस अपनी जगह पर लाकर दर्द को कुछ हद तक कम कर दिया। महीनों की फिजियोथेरेपी ने क्षतिग्रस्त मांसपेशियों को तो ठीक कर दिया, लेकिन अब छोटी-छोटी लहरें भी मुझे डर और आशंका से भर देती हैं।
थलासोफोबिया और जॉर्ज ऑरवेल
जॉर्ज ऑरवेल का समुद्र के साथ बहुत दर्दनाक रिश्ता था। अगस्त 1947 में, जब वह उन्नीस सौ चौरासी (प्रकाशन वर्ष 1949) उपन्यास लिख रहे थे, तो वह अपने छोटे बेटे, भतीजे और भतीजी के साथ मछली पकड़ने के लिए स्कॉटिश हेब्रीडीस के जुरा द्वीप पर गए थे। ज्वार-भाटे के आने की सही जानकारी न होने के कारण वापसी के दौरान ऑरवेल ने गलती से नाव को तेज लहरों के बीच डाल दिया। भंवर में फंसकर नाव पलट गई और ऑरवेल एवं उनके परिजन पानी में गिर गए। हालांकि, वे लोग उस दुर्घटना में बाल-बाल बच गए। इस घटना को ऑरवेल ने उसी शाम अपनी डायरी में बेहद उदासीनता से दर्ज किया। 1984 को आम तौर पर पानी में डूबने के डर से नहीं जोड़ा जाता। फिर भी यह डूबते जहाजों, डूबते लोगों और समुद्र में डूबने के डर से भरा हुआ है।
उपन्यास के नायक, विंस्टन स्मिथ को एक दुःस्वप्न बार-बार दिखता है, जिसमें वह अपनी खोई हुई मां और बहन को डूबते हुए जहाज के सैलून में फंसा हुआ देखता है। उन्हें ‘हर मिनट गहरे डूबते हुए’ देखना विंस्टन को बचपन के उस पल की याद दिलाता है, जब उसने मां के हाथ से चॉकलेट चुराई थी। ये पानी भरी कब्रें बताती हैं कि विंस्टन अपराधबोध में डूब रहा है।
जल के संदर्भों से भरे इस उपन्यास के अधिकांश चौंकाने वाले प्रसंगों में हताश लोगों के डूबने या डूबते समुद्री जहाजों पर आसन्न मृत्यु का सामना करने की कल्पना की गई है। हालांकि, इस बात का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है कि जॉर्ज ऑरवेल को थलासोफोबिया (गहरे पानी का डर) था, लेकिन उनके लेखन, विशेष रूप से 1984 में पानी से संबंधित कल्पनाओं के प्रति उनका आकर्षण और प्रयोग दिखता है, जो अक्सर एक भयावह और घुटन भरे तरीके से होता है, जिसे गहरे पानी से संबंधित उनकी अपनी चिंताओं की खोज के रूप में व्याख्यायित किया जा सकता है।