बेस्टसेलर बनने के लिए आज लोग अपनी किताब में न जाने कितने खुलासे किए जा रहे हैं। अगर पारदर्शिता का लेवल इतना बड़ा हो जाएगा कि कौन-सी सब्जी में वर्मा जी कौन-सा मसाला डालते हैं, यह उसका पड़ोसी फेसबुक पर पोस्ट करने लगेगा, तो बताइए, जीना कितना मुश्किल हो जाएगा? खुलासा करने का यह रोग किसलिए? अपनी कुंठा, अपनी भड़ास, अपनी खुन्नस निकालने के लिए। जो जिस ऊंचाई पर पहुंच गया है, वह उससे संतुष्ट नहीं है। आईएएस बन गए, पैसा कमा लिया। चुनाव लड़ लिया, मंत्री बन गए। सारे सुख-साधन कदमों में पड़े हैं, पर दिल है कि मानता नहीं। अचानक फितूर सवार होता है।
किताब बेचने के लिए कुछ मसाला चाहिए। सो जो साहस वे अपने कार्यकाल में नहीं जुटा पाते, वह रिटायर होने के बाद जुटाते हैं। जो काम वे पावर में होते हुए नहीं कर पाते, वे अंतरात्मा की आवाज पर किताब लिखकर पूरा करते हैं। किताब में कही बातें कितनी सही हैं, कितनी गलत, कितनी सच्चाई बताने के लिए हैं और कितनी सेल बढ़ाने के लिए, कितनी राज उजागर करने के लिए हैं और कितनी अपनी वैल्यू बढ़ाने के लिए, यह तो जो लिख रहा है, वही जाने। पर आज फेसबुक और इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी लिखकर पोस्ट कर देने के जमाने में अगर लॉयल्टी का लेवल इतना गिर गया, तो लोग भरोसा किस पर करेंगे?
अगर किसी के दिल में आग है व्यवस्था से लड़ने की, किसी के दिल में चाहत है समाज को बदलने की, यदि सही मायने में कोई कुछ करना ही चाहता है, तो हुजूर, उस समय सामने आइए न, जब आप उस व्यवस्था से सारे लाभ ले रहे हैं! उस समय आवाज उठाइए न, जब आप फैसला लेने की स्थिति में हैं! किताब लिखनी ही है, तो जेनुइन राइटर बनकर सड़क की धूल फांकिए। और हां, अपनी किताब और अपने लेखन को ऑथेंटिक बनाने के लिए अपने करीबी लोगों पर कम से कम कीचड़ तो मत उछालिए, क्योंकि इसके कुछ छींटे निश्चय ही आप पर भी पड़ेंगे।