साफ है कि फारूख अब्दुल्ला ने फिर से वही पुराना राग छेड़ दिया है। एक दिन पहले वायुसेना की गाड़ियों के काफिले पर पुंछ में हुए आतंकी हमले में हमारा एक वायुसैनिक बलिदान हो गया और चार घायल हो गए। सेना आतंकियों को खोजने में लगी थी और फारूख अब्दुल्ला टिप्पणी कर रहे थे कि जब तक भारत और पाकिस्तान में वार्ता नहीं होगी, दहशतगर्दी नहीं रुकेगी। चीन से बात हो रही है, तो पाकिस्तान से क्यों नहीं?
दरअसल, फारूख का भय वही है, जो कभी शेख अब्दुल्ला का था। वह भय है पीओके की भारत में वापसी का। गौरतलब है कि 1947 में कबाइली आक्रमण के बाद भारतीय सेना ने कबायलियों को खदेड़ना प्रारंभ किया, तो बड़ी संख्या में कबायली मारे गए और बहुत से भाग गए। उनका पीछा कर रही हमारी सेना को अचानक उड़ी में रोक दिया गया। यह आदेश माउंटबेटन व नेहरू के अलावा कोई दे भी नहीं सकता था। उरी से आगे के इलाके में कश्मीरी नहीं बोली जाती। वह पहाड़ी, गोजरी, पंजाबी बोलने वाले गूजर बकरवालों, पंजाबियों, राजपूतों का इलाका है। वे शेख अब्दुल्ला के समर्थक नहीं थे। उनके भारत में रहने से शेख के राजनीतिक वर्चस्व को चुनौतियां मिलतीं। इसलिए पीओके को जान-बूझकर पाकिस्तान के कब्जे में जाने दिया गया।
आज यदि पीओके व गिलगित-बालटिस्तान भारत में वापस आ गया, तो घाटी में फारूख के खानदानी वर्चस्व की संभावनाएं धूमिल हो जाएंगी। इसलिए फारूख अब्दुल्ला चाहते हैं कि पाकिस्तान से बातचीत हो, ताकि कोई ऐसा समझौता हो जाए कि पीओके व गिलगित-बालटिस्तान भारत में न आ सके और नियंत्रण रेखा को ही अंतरराष्ट्रीय सीमा मान लिया जाए। इसलिए फारूख के ऐसे बयान आते रहे हैं और आते रहेंगे।
इन दिनों कश्मीर में भी वहां की पांच संसदीय सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। संभावना है कि पिछले वर्षों के 5-10 फीसदी की तुलना में इस बार बड़ी संख्या में मतदाताओं की भागीदारी होगी। बारामूला से उमर अब्दुल्ला, अनंतनाग-राजौरी से महबूबा मुफ्ती उम्मीदवार हैं। ये चुनावों में पाकिस्तान एवं अलगाववाद को मुद्दा बनाते रहे हैं। इसलिए मौका मिलते ही फारूख ने अपना खानदानी पाकिस्तान कार्ड चल दिया, जो उनके पिता भी अक्सर चला करते थे। बहरहाल, तब से अब तक झेलम में बहुत पानी बह गया है। अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने, कश्मीर व लद्दाख के अलग-अलग केंद्रशासित प्रदेश बन जाने के बाद अब यह चुनाव जम्मू व कश्मीर की जनभावनाओं का लिटमस टेस्ट जैसा है। पूर्ण राज्य से कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बना देने और फिर कश्मीर के औद्योगिकीकरण के साथ आर्थिक व बुनियादी संरचना विकास और रोजगार का अभियान चलाने से एक मिला-जुला परिदृश्य उभरा है। आम मतदाता समझते हैं कि रेल नेटवर्क, हाईवे यातायात का विकास व परिणामस्वरूप पर्यटन की पर्याप्त संभावनाएं कश्मीर का भाग्य बदल देंगी। लेकिन देखना होगा कि इन सब सकारात्मक परिवर्तनों का असर चुनावों में आम आदमी की सोच पर किस तरह से पड़ने वाला है।
पाकिस्तान से वार्ता शुरू से ही जम्मू कश्मीर के राजनीतिक दलों, चाहे वह नेशनल कॉन्फ्रेंस हो या महबूबा मुफ्ती की पीडीपी, का प्रिय एजेंडा रहा है। उन्होंने घाटी में आतंकियों व आईएसआई की दहशत के लंबे दौर देखे भी हैं। वे पाकिस्तान की भूमिका का समापन नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि दोनों मुल्कों की राजनीतिक शतरंज में कश्मीर की खुदमुख्तारी का मुद्दा बना रहे। तभी कश्मीर की राजनीति में उनकी भूमिका बरकरार रहेगी, अन्यथा वे अप्रासंगिक व असुरक्षित हो जाएंगे। इसलिए उन्हें पाकिस्तान फैक्टर की जरूरत महसूस हो रही है। मगर अब घाटी की हवा बदल रही है। अब कश्मीर के लोगों को मजहबी व क्षेत्रीय सीमाओं में बांधे रखना मुश्किल होता जाएगा। अलगाववाद, ब्लैकमनी व ब्लैकमेल के जरिये राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले धीरे-धीरे हाशिये पर चले जाएंगे।