भारतीय अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयासों में रोड़ा अटकाते हुए कई देशों ने डब्ल्यूटीओ में भारत की दाल आयात नीति के खिलाफ विरोध दर्ज कराया है। भारत फिलहाल दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक है। विगत 10 साल में देश बड़े दाल निर्यातक के रूप में भी उभरा है। बीती सदी के 80 के दशक तक हमारी उत्पादन क्षमता नकारात्मक थी। खेती का रकबा भी करीब 1.52 फीसदी से 1.61 फीसदी तक सीमित था।
वर्ष 2000 तक उत्पादन में 1.6 से 3.69 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई और बुआई का क्षेत्र भी 2.6 प्रतिशत तक था। दाल की प्रति व्यक्ति खपत भी 69 ग्राम से घटकर 32 ग्राम रह गई थी। ये आंकड़े 1961 से 2005 तक दाल के उपभोग पर आधारित हैं। वर्ष 2012 तक दाल की अनुमानित जरूरत 2.13 करोड़ टन आंकी गई थी, पर 2012-13 में दाल उत्पादन का आंकड़ा 1.7 करोड़ टन तक ही सीमित रहा।
मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ते अंतर के कारण भारत को कई देशों से दाल आयात के समझौते करने पड़े। ब्राजील ने भारत की जरूरत पूरी करने के लिए अपने यहां दाल का उत्पादन किया और उसे उचित मूल्य पर निर्यात किया। इससे हमारे किसान हतोत्साहित हुए, क्योंकि समझौते में कहा गया था कि इससे दाल उत्पादकों को फायदा होगा और भारत भी दाल निर्यात करेगा। पर इसका उल्टा हो रहा है।
कृषि मंत्रालय की जून, 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी व्यापार समझौते के तहत भारत, आसियान और साफ्टा देशों के बीच मूंग, उड़द, मसूर, अरहर व चने के आयात-निर्यात पर कोई शुल्क नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2017-18 में भारत ने 56.07 लाख टन दालों का आयात किया, जबकि इसी साल मात्र दो लाख टन दाल का निर्यात किया गया।
बीते तीन साल में देश में दालों का उत्पादन काफी बढ़ा है। इस कारण सरकार ने कुछ दालों के आयात पर मात्रात्मक प्रतिबंध लगा दिया है, तो कुछ में आयात शुल्क बढ़ा दिया है। आयात पर प्रतिबंध किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए है।
पर भारत के आत्मनिर्भर होने की ओर बढ़ते कदमों पर रोक लगाने हेतु डब्ल्यूटीओ की कृषि मामलों की समिति की बैठक में कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, रूस और अमेरिका निरंतर नित नए प्रतिबंधों की तलाश में लगे रहते हैं।
मौजूदा वित्त वर्ष के शुरुआती दो महीनों में दालों का निर्यात गिरकर 28,962 टन रह गया। किसान संगठन भी सरकार पर दबाव बनाए रखते हैं। इन संगठनों का आरोप है कि सरकार दाल आयात का दरवाजा खुला रखती है, ताकि इसकी मांग बढ़ने से बढ़ी कीमत का फायदा किसानों को न मिले। दालों का उत्पादन बढ़ने पर थोड़े समय के लिए सरकार आयात रोक देती है, पर कीमत बढ़ते ही प्रतिबंध हटा लेती है।
व्यापारी भी आयातित सस्ती दाल का इंतजार करते हैं। आयात कारोबारी सरकार पर दबाव बनाते हैं कि खरीफ में उत्पादित दाल अक्तूबर तक बाजार में उपलब्ध होगी, इसलिए आयात प्रक्रिया तेज हो, ताकि त्योहारी मांग की पूर्ति की जा सके। रबी फसल के बंपर उत्पादन से किसानों का उत्साह बढ़ा है। खरीफ फसल की बुआई का रकबा करीब 45 प्रतिशत बढ़ गया है। अच्छे मानसून से भी किसान खुश हैं।
दालों की खेती का रकबा बढ़कर 81.60 लाख हेक्टेयर हो चुका है, जो पिछले साल से 32 फीसदी अधिक है। पर सरकार की ओर से खरीफ फसलों के लिए जो समर्थन मूल्य की घोषणा की गई, वह निराशाजनक है, क्योंकि अरहर, मूंग और उड़द के दामों में मात्र 3.48 फीसदी वृद्धि की गई है।
कृषि वैज्ञानिक, उद्योग जगत, नीति आयोग और प्रधानमंत्री तक किसानों की प्रशंसा करते नहीं थकते कि ग्रामीण क्षेत्रों से आई मांग से ही अर्थव्यवस्था पटरी पर आ सकती है। पर विगत तीन साल से गन्ना किसानों को मात्र दो रुपये की वृद्धि नसीब हुई है, जबकि कृषि उपयोग की हर वस्तु के दाम डीजल की तर्ज पर तेजी दिखा रहे हैं।
विश्व व्यापार केंद्र की ताजा रिपोर्ट बताती है कि भारत कृषि उत्पादों के निर्यात में पांचवें स्थान तक पहुंच सकता है। कृषि के बढ़ते रकबे और नई तकनीक के इस्तेमाल से उत्पादन क्षमता में वृद्धि जारी रही, तो भारत अगले वर्ष तक थाईलैंड और इंडोनेशिया को पीछे छोड़ सकता है। ऐसे में, विश्व व्यापार संगठन की नित नई शर्तों से निकल कर अपने कृषि व्यापार क्षेत्र को सुरक्षित करने की जरूरत है।