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किसान तो प्रेम-रोगी हैं

Tue, 28 Jul 2015 08:23 PM IST
सुरेश कांत
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किसानों की आत्महत्या के बारे में कई थ्योरीज सामने आ चुकी हैं। अभी कुछ समय पहले तक यह थ्योरी लोकप्रिय थी कि वे कायर हैं, इसलिए आत्महत्या करते हैं। अगर वे कायर न होते, तो चाहे भूखे मर जाते, पर आत्महत्या कभी न करते। यह थ्योरी हरियाणा के एक काबिल मंत्री ने पेश की थी, जिसका निष्कर्ष यह था कि आत्महत्या करने वाले लोग कायर होते हैं, और करवाने वाले बहादुर!
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इससे कुछ समय पहले यह थ्योरी प्रचलित थी कि किसान शौकिया तौर पर आत्महत्या करते हैं। किसानों को बहुत-से शौक होते हैं, जैसे कि खेती करना, कर्ज लेना और लेना ही नहीं, बल्कि उसमें रात-दिन डूबे भी रहना आदि-आदि। ऐसा ही उनका एक शौक आत्महत्या करना भी है! जब वे खेती-बाड़ी से फुर्सत पा लेते हैं, लहलहाती फसलों से उनके घर भर जाते हैं, कोई चिंता बाकी नहीं रहती, तो फिर खाली समय में उन्हें आत्महत्या का शौक चर्राने लगता है! और जैसा कि एक विज्ञापन में बताया गया है, शौक बड़ी चीज है।

मगर किसानों की आत्महत्या के बारे में नई थ्योरी यह है कि वे प्रेम के रोगी हो गए हैं और इसी रोग के चलते वे आत्महत्या कर रहे हैं। यह थ्योरी हमारे कृषि मंत्री ने पेश की है, इसलिए इसके गलत होने का भी कोई सवाल नहीं उठता। मेरा मतलब है, उठता तो है, पर 'नहीं उठता' कहने में ही भलाई है। और तो और, गूगल भी उनकी थ्योरी को सपोर्ट करता है। कहते हैं कि हाल ही में गूगल पर एक लड़के ने यह सर्च किया कि लड़की को 'इंप्रेस' करने के क्या तरीके हैं? जवाब में गूगल ने उसे सलाह दी, रहण दे छोरे, इन बातों में कुछ ना धरा, चुपचाप खेती में जी लगा, वरना बर्बाद हो जागा। लगता है, मंत्री महोदय ने भी गूगल का यह संवाद देख लिया होगा।
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कुछ विघ्नसंतोषी लोग कह सकते हैं कि आजकल के प्रेमी खुद नहीं मरते, उलटे कभी तेजाब फेंककर, तो कभी चाकू घोंपकर प्रेमिका को ही मारते देखे जाते हैं। मगर इसे अपवाद कहेंगे, और अपवाद से थ्योरी पुष्ट ही होती है, खारिज नहीं।
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