भाजपा ने अपने चुनाव घोषणापत्र में किसानों को लागत मूल्य का डेढ़ गुना मूल्य देने का वायदा किया था, परंतु उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका में सरकार के अटॉर्नी जनरल ने लिखकर दे दिया कि यह संभव नहीं है। लेकिन अभी हाल ही में किसानों के बढ़ते आक्रोश के कारण केंद्रीय मंत्रिमंडल ने किसानों को पुनः लागत मूल्य का डेढ़ गुना मूल्य देने और 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का वायदा किया है। क्या वायदा पूरा होगा, यह समय ही बताएगा।
132 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में नीति नियंता और वैज्ञानिक परेशान हैं कि बढ़ती आबादी, शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण के गिरते स्तर के कारण फसल उत्पादन में गिरावट को कैसे रोका जाए? कृषि उपज में ठहराव आ गया है। सकल घरेलू उत्पाद में खेती की भागीदारी घटकर 14 प्रतिशत रह गई है। एक ओर कृषक फसलों की उत्पादन वृद्धि को लेकर चिंतित हैं वहीं दूसरी ओर उत्पादन लागत बढ़ने से खेती मंहगी होती जा रही है और खेती घाटे का सौदा बन गई है।
जहां औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्र में वार्षिक वृद्धि दर सात प्रतिशत से अधिक है, वहीं पिछले दो वर्षों में खेती में वृद्धि दर 2.3 प्रतिशत रह गई है। मजदूरी की लागत बढ़ने के साथ खेत मजदूर की उपलब्धता में भी जबरदस्त कमी देखने को मिल रही है। खेतों में आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या, नील गाय, सुअर और बंदरों आदि का प्रकोप बढ़ रहा है।
इनके अतिरिक्त बाढ़, पाले, ओले, कीट व बीमारियों से कभी-कभी पूरी फसलें बर्बाद हो जाती हैं और उन्हें बीज के दाम भी नहीं मिलते। फसल पैदा होने के बाद उसे बाजार में बेचने की सुविधाएं भी सीमित हैं। यह सुविधा केवल गेहूं, चावल, गन्ना व कपास में ही उपलब्ध है। केन्द्र सरकार द्वारा भी समान रूप से सभी प्रांतों में क्रय केंद्र स्थापित नहीं किए गए। जैसे उत्तर प्रदेश में धान खरीद के लिए केंद्रीय खरीद एजेंसी न होने से न्यनूतम समर्थन मूल्य पर खरीद नहीं होती और उसे हरियाणा में बेचना पड़ता है।
भंडारण की सीमित सुविधाओं के कारण करोड़ों रुपये के कृषि उत्पाद नष्ट हो जाते हैं। कृषि उत्पादों के वितरण की दोषपूर्ण स्थिति है। समुचित वितरण व्यवस्था के न होने से बिचौलिये, स्टॉकिस्ट व सटोरिये भारी लाभ कमाते हैं और किसानों को बाजार मूल्य से सौ से तीन सौ प्रतिशत कम मूल्य प्राप्त होता है।
हकीकत में किसान चार रुपये में आलू बेचता है और उपभोक्ता उसे खरीदता है बीस रुपये प्रति किलोग्राम। किसानों और उपभोक्ताओं के बीच का अंतर कम किया जाना चाहिए। सारी परिस्थितियों को देखते हुए किसान को जो केंद्र सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जाता है, उसे किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता। घोषित मूल्य प्रायः फसलों के उत्पादन लागत मूल्य से भी कम होता है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ भी बड़े किसानों को ही मिलता है। 60 प्रतिशत से अधिक लघु और सीमांत किसान जिसके पास घरेलू आवश्यकता से अधिक उत्पादन नहीं होता है, इस लाभ से वंचित रह जाते हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण आयोग की 2004-05 की रिपोर्ट के अनुसार 45 प्रतिशत किसान खेती छोड़ना चाहते हैं।
वह केवल परंपरा का निर्वाह करते हुए ही खेती कर रहे हैं। फसलों के उत्पादन लागत मूल्य के आकलन की विधि में आमूलचूल परिवर्तन करना चाहिए और खेती में काम आने वाली वस्तुओं के जो वास्तविक मूल्य वर्तमान में हैं, उन्हीं को आधार मानकर उत्पादन मूल्य का आकलन करना चाहिए।