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कौन सुनेगा किसान के 'मन की बात'

Sat, 28 Mar 2015 09:16 PM IST
के सी त्यागी
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संसद में पिछले दिनों बेमौसम बरसात एवं ओलावृष्टि से रबी की फसल एवं बागवानी की बर्बादी के चर्चा के बाद कृषि मंत्री और गृह मंत्री सदन में आश्वासन के बाद आपदा के आकलन के लिए दौरे पर थे। उनके स्थान पर अरुण जेटली ने सदन को आश्वस्त किया। आकलन की प्रक्रिया कितनी विलंबित एवं जटिल होती है, यह हम कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह के नासिक के दौरे के समय दिए गए बयान से पता लगा सकते हैं, जिसके अनुसार पिछले साल हुई ओलावृष्टि से जो फसलें खराब हुई थीं, उसका मुआवजा सरकार इस साल जल्द ही देने वाली है। जहां बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि ने करोड़ों किसानों को बेहाल छोड़ दिया, वहीं मंत्री जी के इस बयान ने उनके माथे पर चिंता की लकीरें और बढ़ा दी। इस समय हुई बर्बादी के लिए न केवल उन्हें लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा, बल्कि मुआवजों के लिए एक लंबी अवधि तक इंतजार करना पड़ेगा। इस दौरान मुआवजों की फाइलों को तीन अलग-अलग मंत्रालयों के बाबुओं की टेबिलों से होकर गुजरना पड़ेगा-सबसे पहले कृषि मंत्रालय आकलन करेगा, उसके बाद वित्त मंत्रालय मुआवजे की राशि पास करेगा और अंत में गृह मंत्रालय मुआवजे की राशि का वितरण करेगा। वह राशि भी, अगर पिछले कुछ सरकारों के मुआवजों पर गौर करें, तो कई बार भद्दे  मजाक के रूप में सामने आती है। कई राज्यों में अभी तक दो-दो रुपयों के चेक एवं कइयों में बीस-बीस पैसों के मुआवजे दिए जाते हैं। सरकारें इस प्रक्रिया को बाकी उद्योग-धंधों को दिए जाने वाले पैकेजों के समान सरल एवं सुचारू क्यों नहीं बनाती?
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ताजा प्राप्त आकड़ों के अनुसार इस बेमौसम बरसात, ओलावृष्टि एवं अंधड़ ने लगभग एक लाख करोड़ रुपये की फसल चौपट की, जिसमें दलहन का नुकसान जोड़ना बाकी है। अभी तक हम किसानों की आत्महत्याओं के बारे में सुनते आए थे। आत्महत्याओं का मूल कारण यही था कि किसानों के सामाजिक जीवन के खर्च-जैसे शादी-ब्याह इत्यादि फसल की समृद्धि पर आश्रित रहते हैं। फसल की समृद्धि को ध्यान में रखकर किसान अपने रोजमर्रा के खर्चो के लिए एवं भावी जीवन में होने वाले कृषि में निवेश के लिए कर्ज लेते हैं। कर्ज में डूबे हुए किसान की फसल नष्ट हो जाने पर आत्महत्या ही किसान को आसान रास्ता दिखता है। इसीलिए वह सरकार से कोई अपेक्षा न रखते हुए अपनी जान देता आया है। परंतु इस बार की आपदा से किसानों ने न केवल आत्महत्या की, बल्कि अपने आगे बर्बाद होते हुए फसल को देखकर दिल के दौरे से उनकी मृत्यु तक हो गई।

फसलों की बर्बादी पर मुआवजों के आकलन की जो नीति है, वह भी इतनी दोषपूर्ण है कि जहां हरियाणा और पंजाब में अगर एक एकड़ में सौ रुपये की लागत होती है, वहीं कर्नाटक एवं आंध्र में चालीस-पचास रुपयों की लागत होती है। कृषि बीमा को लेकर जो हो-हल्ला मच रहा है, उसका मूल कारण यह है कि कंपनियां भी नुकसान की दरें बहुत कम करके दिखाती हैं। उदाहरण के लिए, राजस्थान में पिछले साल लगभग 22,000 करोड़ से ज्यादा की फसल बर्बाद हुई, परंतु ये बीमा कंपनियां 1,000 करोड़ से ज्यादा का मुआवजा देने को उत्सुक नहीं हैं। राजस्थान में पिछले छह वर्षों में 18,000 करोड़ रुपये ये कंपनियां कमा चुकी हैं। यानी हर साल ये कंपनियां करीब 300 करोड़ रुपये कमा रही हैं। लेकिन किसानों को सालाना 50 करोड़ रुपये ही किसानों को दिए जा रहे हैं। इसका मतलब इन योजनाओं को इस तरह से बनाया गया है कि किसान की जेब कटे और बीमा कंपनियां ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाएं।
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केंद्र सरकार, सहकारी बैंक और उनकी शाखाएं किसानों पर ये भी दबाव डालती हैं कि जब तक वे बीमा नहीं कराएंगे, तब तक उन्हें कर्ज नहीं मिलेगा। यह चिंता तब और बढ़ जाती है, जब सरकार बीमा क्षेत्र में विदेशी कंपनियों के लिए आनन-फानन में अध्यादेश लाकर तमाम विरोधों के बावजूद भी पास करवा चुकी है। चिंता यह भी है कि ये विदेशी कंपनियां किसानों का हित कहां तक ध्यान में रखेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान वायदे किए थे कि वे किसानों को साहूकारों के चंगुल से मुक्ति दिलाएंगे। लेकिन उनके द्वारा प्रारंभ की गई जन धन योजना में खाते खोलने से अभी तक किसानों को कोई राहत नहीं मिली है। किसान लंबे समय तक मुआवजों के लिए सरकार की तरफ टकटकी लगाकर देख नहीं सकते। रोजमर्रा की जरूरतों के लिए साहूकारों से महंगी दरों पर कर्ज लेने को वे मजबूर हैं।

पिछले दिनों अखबार में एक तस्वीर देखकर लोग हतप्रभ हुए, जिसमें किसान एक मंत्री के आगे घुटने के बल, हाथ जोड़कर बैठा हुआ था और अपनी जीवन की भीख-सी मांग रहा था। साल भर पहले इसका उल्टा ही नजारा था, जब नेता किसानों के द्वार पर वोट की गुहार कर रहे थे। अपने मन की बात के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को सही ठहराकर अपनी मन की बात तो की, परंतु रेडियो से कान लगाकर बैठे, तत्कालीन आपदा से दुखी किसानों से प्रधानमंत्री कोसों दूर रहे, जिससे करोड़ों किसानों को घोर निराशा हुई।

अब समय है कि हम सब अपने राजनीतिक मतभेद भुलाकर यह चिंता करें कि किस तरह किसानों को शीघ्र व उचित मुआवजा मिले। कैसे मंत्रालयों की लालफीताशाही खत्म हो, जिससे सहायता उन तक तुरंत पहुंचाई जा सके। आपदा का दायरा भी बढ़ाने की आवश्यकता है, जिसमें बिजली गिरना, बेमौसम बरसात, ओलावृष्टि, जंगली जानवरों द्वारा हानि, आंधी, तूफान इत्यादि शामिल करने की आवश्यकता है। सरकार को चाहिए कि इन बीमा कंपनियों पर नकेल कसे, ताकि वे इस तरह की योजनाएं बनाएं, जिससे किसानों को अधिकाधिक लाभ हो, समुचित मुआवजा मिले और उनके साथ बैंकों और कंपनियों द्वारा की जा रही धोखाधड़ी खत्म हो। तभी महात्मा गांधी एवं चौधरी चरण सिंह का सपना पूरा होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंदुस्तान की खुशहाली और तरक्की का रास्ता किसानों के खेतों से होकर गुजरता है।
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-लेखक जदयू के राज्यसभा सांसद हैं
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