वैसे तो कहा यह जाता है कि हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती। पर चमक तो किसी भी चीज की फीकी पड़ सकती है। साबुन बेचने वालों का यकीन करें, तो अगर उनके साबुन का इस्तेमाल नहीं किया जाए, तो कपड़ों तक की चमक फीकी पड़ जाती है। क्रीम बेचने वालों का यकीन करें, तो उनकी क्रीम का इस्तेमाल नहीं करने पर चेहरे की चमक खो जाती है। तो जी, चमक अब सोने तक ही सीमित नहीं रह गई है।
फिर बात यह भी है कि हर चमकने वाली चीज सोना होती भी नहीं। अभी तक यही लग रहा था कि सोने की चमक फीकी पड़ रही है। हालांकि जब वह पैंतीस हजार रुपये तोले था, तो ऐसा नहीं था कि उसकी चमक बढ़ गई थी। पर जी, जैसे कहावत है कि यह तो सोने पर सुहागा हो गया, वैसे ही हो सकता है कभी उसकी चमक भी बढ़ जाती हो। पर इधर जब वह लगातार गिरता चला गया, तो लोगों ने कहा कि सोने की चमक फीकी पड़ गई है। इससे पता चलता है कि भाव की, बाजार की भी अपनी चमक होती है।
अब सोने को लेकर तो किसी ने वैसा दावा किया नहीं है कि मैं नसीब वाला हूं, इसलिए सोने के भाव घट गए। जैसे प्रधानमंत्री ने तेल के दाम घटने पर कर दिया था कि मैं नसीब वाला हूं, इसलिए दुनिया में तेल के भाव गिर गए। इस पर तो सोने के तस्कर बदनसीबी का ही रोना रो सकते हैं। पर खैर, बात अभी तक सोने की चमक फीकी पड़ने की ही हो रही थी, कि अचानक उद्योगपति राहुल बजाज ने सरकार की ओर इशारा कर दिया कि देखो, सरकार की चमक भी फीकी पड़ रही है। वह कोई विपक्ष में नहीं हैं कि सरकार पर आरोप लगा रहे हों। वह तो भाजपा के समर्थक रहे हैं। बल्कि वह तो अब भी उनके समर्थक हैं, पर वह देख रहे हैं कि सरकार की चमक फीकी पड़ती जा रही है। अब सरकार कपड़ा तो है नहीं कि साबुन से धोने पर चमक लौट आएगी। सरकार तो सोना है। जब तक भाव है, उसकी चमक है। पर जैसे सोने की चमक बढ़ाने के लिए उसे किसी ठग के हवाले नहीं किया जा सकता, वैसे ही सरकार की चमक बढ़ाने का भी उपाय नजर नहीं आता।