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रंग अब भी हैं संग

Sat, 15 Jun 2013 09:28 PM IST
भानु अथैय्या
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फिल्म इंडस्ट्री में आधी सदी गुजार चुकी हूं। एक कॉस्ट्यूम डिजाइनर के तौर पर लोगों ने मुझे जाना। रिचर्ड एटेनबरो की फिल्म `गांधी’ के लिए जब मुझे ऑस्कर मिला तो पूरी दुनिया में चर्चा हुई, लेकिन कम लोगों को यह मालूम है कि मैंने पेंटिंग से शुरुआत की थी।
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यह फिल्म `गांधी’ से बहुत पहले की बात है। सांस्कृतिक विरासत और सिनेमा दोनों के गढ़ कोल्हापुर में मेरा बचपन बीता। आठ बरस की उम्र में ही मैंने पेंटिंग सीखना शुरू कर दिया था।

मेरे पिता ब्रिट्रिश एकेडमी स्टाइल की पेंटिंग करते थे। उनके रंगों की दुनिया में मुझे बड़ा मजा आता था। चोरी छिपे उनके स्टूडियो में जाकर मैं रंगों से खेला करती थी। अक्सर पिता का काम पूरा होने के बाद उनके ब्रश और पैलेट धोकर रखती। उस वक्त पिताजी लियोनार्डो द विंची, रेम्ब्रेंट और टर्नर जैसे बड़े कलाकारों को पढ़ा करते थे।
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उन्हीं से मैंने उन बड़े कलाकारों के बारे में जाना। उन दिनों स्थानीय कलाकार एमवी धुरंधर की पेंटिंग मुझे काफी अच्छी लगती थी। लेकिन तभी पिता नहीं रहे। वह एक कठिन दौर था। उनकी मौत के बाद आर्ट टीचर शशिकिशोर चव्हाण ने मेरी मां को इस बात के लिए राजी किया था कि मैं पेंटिंग को सिर्फ शौकिया नहीं, बल्कि करियर के तौर पर लूं। बाद में 'सर जेजे स्कूल ऑफ ऑर्ट' में मैंने दाखिला ले लिया।

वहां मैंने प्रोफेसर अहिवासी से मिनिएचर पेंटिंग बनाने की तालीम हासिल की। कला की यह शिक्षा काफी हद तक पश्चिमी कला से प्रभावित थी। इसी दौरान मैं हुसैन रजा, सूजा और गैटोंडे के संपर्क में आई। उस समय पीएजी (प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप) बनाया गया और मैं उसकी एकमात्र महिला सदस्य थी। पीएजी जगह-जगह प्रदर्शनी आयोजित कराता था। उस दौरान मैंने दर्जनों पेंटिंग्स बनाई।

ऐसी ही एक प्रदर्शनी के लिए मैंने गंगौर घाट से प्रेरित होकर ‘स्नान घाट’ बनाया था। जिसकी काफी चर्चा हुई। लेकिन तभी मेरे करियर की दिशा बदल गई।

मैंने फैशन एंड ब्यूटी मैगजीन में बतौर फैशन इलस्ट्रेटर काम शुरू कर दिया। बाद में वीकली मैगजीन 'ईव' के लिए भी काम किया। चित्रकार आरा इस बात पर बहुत नाराज हुए थे। उन्होंने कहा था कि 'तुम इलस्ट्रेटर क्यों बनना चाहती हो। यह कोई कला नहीं है। इस काम से सिर्फ तुम्हारी ही नहीं, बल्कि दूसरे कलाकारों की भी बेइज्जती होगी।' लेकिन मैंने वही किया, जो मुझे सही लगा। मैं फैशन डिजाइनिंग के क्षेत्र में आ गई।

मैं अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी और इस लिहाज से फैशन डिजाइनिंग ज्यादा व्यावहारिक था। अपने फैसले को लेकर मुझे कभी पछतावा नहीं हुआ। कपड़ों के लिए भी मेरा वैसा ही समर्पण है, जैसा कला के लिए रहा था। कैनवास से कपड़े तक के इस सफर में कई मोड़ आए, कभी लगा कि मैं हार जाऊंगी, लेकिन मुझे लगता है कि मैंने अपना काम ईमानदारी से किया। माध्यम कोई भी हो, कला तो आखिर कला ही है। रंग तो आज भी मेरे साथ हैं। 
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