घर में बंद होने के ख्याल से ही परेशान होना स्वाभाविक है। लेकिन लॉकडाउन एक जरूरी कदम है। यह जितना मानव सभ्यता के लिए जरूरी है, शायद उतना ही अपनी पृथ्वी के लिए भी। अपने कृत्यों से मानव ने प्राकृतिक पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचाया है। ज्यादातर लोगों को ये सब किताबी बातें लगती हैं। वे सोचते हैं कि एक दिन अपने आप सब ठीक हो जाएगा।
आशावाद जीवन में सकारात्मकता लाता है, लेकिन कोरा आशावाद कई बार पलायनवादी भी बना सकता है। प्रकृति की व्यवस्था में जो भी होता है, बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से होता है। सुख-दुख तो जिंदगी का हिस्सा है, यह तो हम सब जानते हैं, लेकिन अब इसको अपने व्यवहार से साबित करने का समय आ गया। जीने के लिए आशावादी होने के साथ-साथ व्यावहारिक एवं यथार्थवादी भी होना पड़ेगा। इस अवधि में कठिनाई, अवसाद आदि भाव हावी होने की कोशिश करेंगे।
सबको अपनी जिम्मेदारी दिखानी होगी। प्रकृति की समस्याओं से अनजान बने रहना ठीक नहीं है। हमारे और आपके आसपास जो परिस्थिति बनी है, उसको ठीक से जान लें। कुदरत के पास कोई भी किंतु-परंतु नहीं है। एक हाथ ले, दूसरे हाथ दे जैसा न्याय होता है। आप जब भी कोई निर्णय लें, परिस्थितियों को अवश्य जान लें। जैसे-जैसे पृथ्वी की आयु बढ़ रही है, उसकी आंतरिक फ्रीक्वेंसी भी बढ़ती जा रही है। मानवीय क्रियाकलापों से जो शोर पैदा हो रहा है, वह इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है।
समस्या यह है कि जिस अनुपात में पृथ्वी का आंतरिक कंपन बढ़ा है, उस अनुपात में मनुष्य और अन्य जीवधारियों का नहीं। यह वायरस और अन्य रोगाणुओं के लिए आदर्श स्थिति है। इसको इस तरह समझिए कि प्रकृति और मनुष्य के बीच का नाजुक संतुलन टूट चुका है। इसी का नतीजा है कि कोविड-19 जैसी नई बीमारियां पैदा हो रही हैं। ये रहस्यमयी भी हैं और मारक भी। यानी कुदरत के सुरक्षाचक्र से मानव को सहायता मिलनी बंद हो चुकी है। जिम्मेदार हम लोग ही हैं।
वन्य जीवन में अत्यधिक दखलंदाजी और हर जीव में भोजन तलाश करने की प्रकृति ने हमें अपने-अपने घरों में कैद रहने को मजबूर कर दिया है। कोरोना के इस घातक प्रसार के पीछे इंसानों द्वारा ईजाद की गई तकनीकों का भी अहम योगदान है। कई देशों में इस बात पर शोध किया जा रहा है कि 5जी टेक्नोलॉजी ने कोरोना के फैलाव में कितनी बड़ी भूमिका निभाई है। इस समय आध्यात्मिक पहलू पर जोर देना आवश्यक है। चिंतन व्यक्ति को उत्साही और आशावादी बनाता है।
घर में बंद हैं तो दिनचर्या में भी आवश्यक बदलाव कीजिए। रोज एक जैसी दिनचर्या आपको बोर कर सकती है। इसमें थोड़ी विविधता लाएं। कोविड-19 कितनी ही गंभीर बीमारी क्यों न हो, उससे जीतने की जंग हमें जारी रखनी है। आशावादी सोच इससे उबरने में हमारी मदद करेगी। समय बिताने के लिए वाईफाई और इंटरनेट की लत के आदी न बनें। देर तक अपनी वाईफाई डिवाइस के सीधे संपर्क में आने से बचें। इसका रेडिएशन स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता। वर्कआउट, हेल्दी डाइट और अच्छी नींद सेहत के लिए बहुत जरूरी है।
अपनी बालकनी में खड़े होकर आस-पड़ोस के लोगों से पॉजिटिव और उत्साहजनक बातें करिए। पॉजिटिव सोच रखने वाले और पॉजिटिव बातें करने वाले लोगों को हर इंसान पसंद करता है। संसार के सारे कार्य-व्यवहार आशाओं पर चलते है। इसी के अनुरूप हमें अपना व्यवहार रखना है। अगर हम अपने व्यवहार में संयम और स्थिरता दिखाएंगे, तभी इस महामारी से निजात मिल सकेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही कोरोना की वैक्सीन ईजाद कर ली जाएगी। तब तक अपने घरों के दरवाजे बंद रखने में ही भलाई है।