पूर्व क्रिकेटर सुरेश रैना दुबई में होने जा रहे आईपीएल को छोड़ बीच में ही भारत लौट आए। उनकी टीम चेन्नई सुपर किंग्स की ओर से आधिकारिक रूप से कहा गया कि रैना निजी कारणों से भारत लौटे हैं और वह इस साल नहीं खेलेंगे। खुद रैना ने ट्वीट कर बताया कि जब वह दुबई में थे, तभी पंजाब में उनकी बुआ के घर पर बदमाशों ने हमला किया, जिसमें उनके फूफा की मौत हो गई थी, जबकि बुआ और भाइयों को गंभीर चोटें आईं। बाद में उनके फुफेरे भाई की भी मौत हो गई। इस पर रैना ने पंजाब पुलिस पर भी सवाल उठाए और कहा कि अपराधियों का पता लगाकर उन्हें दंडित किया जाए। भारतीय परिवेश में एकल परिवारिक संरचना में सिमटते समाज की नजर से यह एक बड़ी घटना मानी जा सकती है, जिसमें कोई व्यक्ति अपनी बुआ-फूफा के परिवार की सलामती के लिए फिक्रमंद नजर आए।
भारत की मौजूदा पारिवारिक संरचना को देखा जाए, तो अब ज्यादा परिवार एकल नजर आते हैं। पति-पत्नी और उनके अपने बच्चों से बाहर के इस परिवार में ज्यादा से ज्यादा पति के माता-पिता होते हैं। ऐसे में कोई शख्स अपनी बुआ और फूफा के साथ हुए हादसे के सिलसिले में अपने करियर और बेशुमार कमाई की चिंता छोड़ दे, ऐसी मिसालें अब कम दिखती हैं। हालांकि कुछ लोगों को लगता है कि रैना इसलिए वापस लौटे हैं कि टूर्नामेंट में हिस्सा लेने पहुंचे 13 खिलाड़ियों के कोरोना संक्रमित पाए जाने के बाद अन्य खिलाड़ियों के भी इसकी चपेट में आने का खतरा था। यदि यह मान लें, तो इसमें भी परिवार के प्रति उनकी परवाह दिखती है।
हमारे देश में अब पारिवारिक संरचना के ध्वस्त होने के ही समाचार ज्यादा मिलते रहे हैं। इस संदर्भ में 2017 की एक घटना की याद स्वाभाविक है, जब अमेरिका से मुंबई लौटकर एक युवा ने अपने फ्लैट का दरवाजा खुलवाया, तो वहां उसे अपनी मां का कंकाल मिला। पता चला कि वह करीब एक साल से अपनी मां के संपर्क में नहीं था। एकल परिवार के नाम पर जिस नए किस्म की पारिवारिक संरचना अब हमारे देश में बहुतायत से दिखने लगी है, पश्चिमी देशों में वह काफी पहले विकसित हो गई थी। हालांकि एक दौर था, जब हमारे देश की पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था की सुदृढ़ता का सम्मान पूरी दुनिया में किया जाता था।
सह-अस्तित्व और आपसी सम्मान की सोच के साथ पीढ़ियों का साथ रहना हमारे यहां सामान्य बात रही है। लेकिन इसी समाज में एक बुजुर्ग की महीनों पहले मौत हो जाए और आस-पड़ोस ही नहीं, खुद बेटे को भी महीनों तक इसका पता न चले, तो कई सवाल खड़े होते हैं। मानवीय संबंधों में शून्य रचने वाला यह कैसा डिजिटल समाज है, जिसमें अपने करीबियों की सुध लेने और उनकी पीड़ा को अपना दर्द समझने का चलन खत्म हो गया है। भारत जैसे देश में खासकर परिवार के बुजुर्गों की ऐसी उपेक्षा चिंता की बात है, क्योंकि न तो उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सरकारी योजनाएं, न ही ऐसी सामाजिक संस्थाएं पर्याप्त संख्या में हैं, जहां वे अपना अकेलापन, दुख-दर्द और अवसाद बांट सकें। ऐसे में, उम्मीद यही है कि या तो संतानें अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करें या कोई करीबी रिश्तेदार आपात स्थिति में रुपये-पैसे की चिंता छोड़ उनके साथ सांत्वना देने आ खड़े हो, जैसा रैना ने किया है।
हमारे समाज में बुजुर्ग सबसे ज्यादा खतरे में हैं। हालांकि कुछ दशक पहले तक देश में जब संयुक्त परिवारों का ज्यादा चलन था, तब ऐसी दिक्कतें नहीं थीं। पर शहरों में बने रोजी-रोटी के मौकों ने संयुक्त परिवार की अवधारणा खंडित कर दी है। यही नहीं, संपन्नता के साथ एकल परिवारों में इस भावना ने जोर पकड़ा कि बुजुर्ग नई पीढ़ी पर बोझ हैं। हमारा सामाजिक परिवेश इस तेजी से बदला कि बुजुर्ग अपमान और अकेलेपन के साथ अवसाद झेलने को भी मजबूर हो गए। देश, समाज और परिवार को बनाने में अपनी पूरी जिंदगी लगा देने वाले बुजुर्ग सदस्यों की सुरक्षा और सामाजिक समस्याओं की सबसे अच्छी दवा यही है कि उन्हें परिवार का कोई करीबी सदस्य जरूरत के समय सहारा दे। मुश्किल दौर में वही परिवार बचते हैं, जो उपेक्षित और कमजोर सदस्यों को बचाने की कोशिश करते हैं। सुरेश रैना का उदाहरण यही साबित करता है, अच्छा है कि इससे सबक लिया जाए।