हाय-हाय करने वाले अब इस पर छाती पीट रहे हैं कि संविधान की प्रस्तावना में से धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को क्यों हटा दिया। इतनी हाय-हाय तो तब हो रही है, जब सिर्फ एक सरकारी विज्ञापन में से हटाया है। संविधान में से हटाएंगे, तब तो भाई लोग आसमान ही सिर पर उठा लेंगे। शुक्र है कि धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद का मामला कभी संविधान से आगे नहीं बढ़ पाया।
वैसे, शिव सेना मानती है कि संविधान से कुछ भी हटाना इस सरकार के बस की बात नहीं है। उन्हें यकीन है कि जो हटा है, वह गलती से हटा है। लेकिन समझदारी यह है कि सरकार अब उसे सुधारने की कोशिश न करे। वह संविधान में हिंदू राष्ट्र नहीं लिख सकती, तो न सही, पर कम से कम धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र तो न लिखे। पर सरकार का नजरिया जरा दार्शनिक है। संविधान में धर्मनिरपेक्ष रहे, न रहे, क्या फर्क पड़ता है? जब धर्मनिरपेक्ष नहीं लिखा था, तब क्या कोई कम धर्मनिरपेक्ष थे? जब धर्मनिरपेक्ष लिख दिया, तो क्या उसके बाद ज्यादा धर्मनिरपेक्ष हो गए? और जब लिखने से कुछ फर्क ही नहीं पड़ता है, तब लिखना ही क्यों? बेकार, कागज, स्याही, कलम और शब्दों की बर्बादी! और कुछ नहीं तो कम से कम पर्यावरण को ही बचाएं।
पर हाय-हाय करने वालों के सामने यह सब कहना तो भैंस के आगे बीन बजाना है। वे तो उल्टे शोर मचा रहे हैं कि आठ महीने में ही संविधान की प्रस्तावना में से दो शब्द उड़ा दिए। ऐसे ही चलता रहा, तो पांच साल में पूरा का पूरा संविधान ही उड़ा देंगे। संविधान के बिना कैसा गणतंत्र! वैसे भी ओबामा जी को मेहमान बनाने के बाद अब और गणतंत्र दिवस क्या मनाएंगे!
शुक्र है कि यह सरकार हाय-हाय करने वालों से डरने वाली नहीं है। बेकार के कानूनों की सफाई का झाडू एक न एक दिन संविधान तक जरूर पहुंचेगा। न रहेगा संविधान और न रहेगा धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद वगैरह को हटाने का शोर। वैसे भी पेपरलेस होने के जमाने में संविधान-लेस होना वक्त की मांग है। शोर मचाने वाले तो यों ही मचाते रहेंगे।