कॉमन सेंस मीडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दस साल की उम्र में आज 42 प्रतिशत बच्चों के पास स्मार्टफोन हैं। बारह साल की उम्र तक यह आंकड़ा 71 प्रतिशत तक पहुंच जाता है और चौदह की उम्र तक 91 प्रतिशत बच्चों के हाथ में मोबाइल फोन होता है। इस डिजिटल दुनिया ने हमारे युवाओं में चिंता, अवसाद और आत्महत्या जैसी विकृतियों को भर दिया है। 2000 से 2010 तक के दशक की शुरुआत तक, हाई स्पीड इंटरनेट और सोशल मीडिया एप से युक्त स्मार्टफोन हर तरफ फैल गए। भारत भी इसमें अपवाद नहीं है। दुनिया में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा मोबाइलधारकों वाले देश में बच्चे मोबाइल के साथ क्या कर रहे हैं, इसकी चिंता किसी को नहीं है।
बच्चों का ध्यान भटकाने के लिए सिर्फ फोन ही नहीं, बल्कि असली (रीयल) खेल आधारित बचपन का खत्म हो जाना भी एक बड़ा कारण है। भारत में यह बदलाव 2000 के दशक से शुरू हुआ, जब अभिभावकों ने अपने बच्चों की किडनैपिंग और अनजान खतरों से बचाने के लिए भय आधारित पैरेंटिंग करना शुरू कर दिया, जिसका परिणाम हुआ कि बच्चों के अपने खेलने का समय घटता चला गया और उनकी गतिविधियों पर माता-पिता का नियंत्रण बढ़ गया। इसका दूसरा बड़ा कारण शहरों में खेल के मैदानों का खत्म हो जाना भी है। अनियोजित शहरीकरण ने बच्चों के खेलने की जगह खत्म कर दी। इसका असर बच्चों के मोबाइल स्क्रीन में खो जाने में हुआ।
आज के बच्चे और उनके माता-पिता एक तरह की सुरक्षा की मुद्रा में फंसे हुए हैं। असल में माता-पिता को अपने बच्चों को वैसी ही परिस्थितियां देनी चाहिए, जैसे एक माली अपने पौधों को स्वाभाविक रूप से बढ़ने और विकसित होने के लिए देता है। लेकिन हम अभिभावक अपने बच्चों को एक बढ़ई की तरह बड़ा कर रहे हैं, जो अपने सांचों को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में आकार देता है। स्मार्टफोन और अत्यधिक सुरक्षात्मक पालन-पोषण के इस मिश्रण ने बचपन की संरचना को बदल दिया है और नई मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दिया है। जिनमें जीवन के प्रति असुरक्षा, कम नींद आना और नशे की लत शामिल हैं।
संयुक्त राष्ट्र की शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति एजेंसी यूनेस्को ने कहा कि इस बात के प्रमाण मिले हैं कि मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग शैक्षणिक प्रदर्शन में कमी से जुड़ा है तथा स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने से बच्चों की भावनात्मक स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यूनेस्को ने अपनी 2023 ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटर रिपोर्ट में कहा कि डिजिटल तकनीक ने शिक्षा में स्वाभाविक रूप से मूल्य जोड़ा है, यह प्रदर्शित करने के लिए बहुत कम मजबूत शोध हुए हैं। अधिकांश साक्ष्य निजी शिक्षा कंपनियों द्वारा वित्त पोषित थे, जो डिजिटल शिक्षण उत्पाद बेचने की कोशिश कर रही थीं। इसने कहा कि दुनिया भर में शिक्षा नीति पर उनका बढ़ता प्रभाव ‘चिंता का कारण’ है। चीन ने डिजिटल उपकरणों के उपयोग को कुल शिक्षण समय के 30 प्रतिशत तक सीमित कर दिया है।
कई अध्ययनों के अनुसार, स्कूल में फोन का उपयोग एकाग्रता कम करता है। फोन फ्री स्कूल आंदोलन की संस्थापक साबिने पोलाक ने सेकेंड ‘हैंड स्मोक’ टर्म ईजाद की है। जैसे किसी व्यक्ति के द्वारा छोड़ा गया सिगरेट का धुआं पास खड़े व्यक्ति को नुकसान पहुंचाता है, वैसे ही कक्षा में एक विद्यार्थी द्वारा किया गया फोन का उपयोग दूसरे को प्रभावित करता है। ये उपकरण शिक्षकों के लिए भी तनावपूर्ण हैं। भारत में इस दिशा में अभी तक कोई ठोस पहल न होना चिंता का विषय है।
इसके कई कारण भी हैं, जिसमें तकनीक का अचानक हमारे जीवन में आना और छा जाना भी शामिल है। जहां माता-पिता और उनके बेटे-बेटियां एक साथ मोबाइल फोन चलाना सीख रहे हैं। अपने बच्चों पर नजर रखने के लिए माता-पिता फ्लिप फोन, स्मार्ट वॉच, ट्रैकिंग डिवाइस जैसे उपकरणों की मदद ले सकते हैं। नैतिक शिक्षा जैसे विषयों में फोन और सोशल मीडिया का इस्तेमाल, अपनी निजता कैसे बचाएं, साइबर बुलिंग जैसे विषयों को जोड़ा जाना आवश्यक है। अब बच्चों को जीवन जीने के तौर-तरीके सिखाने के साथ मोबाइल मैनर भी सिखाए जाएं।