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और भी गम हैं, जमाने में औरत होने के सिवा

Sat, 06 Apr 2013 11:32 PM IST
अर्पणा कौर
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कला की दुनिया अद्भुत है। थोड़ा बोलना है, थोड़ा चुप भी रहना है। थोड़ी सी रोशनी चाहिए तो थोड़ा सा अंधकार भी। आप स्पेस का सृजन करते हैं, जहां रंगों का ड्रामा होता है। रहस्य और दर्शन तो जिंदगी के अनुभव के साथ खुद ही चले आते हैं। आप जो देखते हैं, महसूस करते हैं, जो आपके भीतर बहता है, वही रंगों में आकर आकार पाता है।
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कला की ऊंचाई अनुभव, स्मृति और संवेदना की गहराई पर निर्भर करती है। फिर चाहे रचने वाली स्त्री हो या पुरुष कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन हमारे यहां दुर्भाग्य यह है कि अधिकांश कला आलोचक और कला के प्रेक्षक महिला कलाकारों को सिर्फ महिला के मुद्दों से जोड़कर देखने के आदी हैं।

यह खांचे फिट कर देने जैसा है और आसान भी है। लेकिन जिस समाज में कोई महिला कलाकार जीती है, वहां और भी मुद्दे होते हैं जो उसे झकझोरते हैं। किसी का महिलावादी होना तो ठीक है, लेकिन साथ में मानवतावादी और सार्वभौमिकतावादी होना भी जरूरी है। महिलाएं आज बाहर निकल रही हैं, उनके दिमाग की खिड़कियां खुल चुकी हैं- ‘और भी गम हैं, जमाने में औरत होने के सिवा।’
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यह बात सच है कि 33 साल पहले जब 'माया त्यागी कांड' हुआ था तो उस घटना ने मुझे झकझोरा था और मैंने पेंटिंग बनाई थी। लेकिन 33 साल बाद भी माया त्यागी जैसे कांड लगातार हो रहे हैं। दिल्ली में बस के अंदर एक लड़की के साथ जो कुछ हुआ, वह भी किसी संवेदनशील मन को बेचैन कर देने के लिए काफी है। मैं भी विचलित हुई। इस गैंग रेप पर मैंने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर एक इंस्टालेशन बनाया -'देल्ही बस'। लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ महिला के मुद्दे और उनसे जुड़ी समस्याएं ही मुझे प्रभावित करते हैं।

शुरू से मेरा झुकाव देश में सामाजिक-आर्थिक असमानता की ओर रहा है। आखिर क्यों, देश की एक बड़ी आबादी आजादी के इतने दिनों के बाद भी दो वक्त के भोजन के लिए तरस रही है। उनके लिए धरती से ज्यादा बड़ी है पृथ्वी की गोलाई। भगत सिंह ने अपनी शहादत से पहले कहा था कि ‘हम अंग्रेजों से भले ही आजाद हो जाएं, लेकिन बाद में हमें अपने ही देश के लोगों की गुलामी करनी पड़ेगी। ऐसे लोगों की गुलामी, जो खुद को श्रेष्ठ समझते हैं।’पता नहीं वे कितना सही थे! लेकिन ऐसे भेदभाव अक्सर मेरी कला में जगह पाते रहे हैं।

1974-75 में अपनी पहली प्रदर्शनी ‘शेल्टर्ड वुमन’ में मैंने छाता पकड़े एक हृष्ट-पुष्ट गोरी महिला को बड़ी ललक के साथ कई अन्य पतली-दुबली श्याम वर्ण की महिलाओं को निहारते हुए दिखाया था। उनमें से एक चित्र अभी चंडीगढ़ म्यूजियम में है। मेरे चित्रों में हमेशा भारतीय मूर्तिकला की परंपरा, समृद्ध रंगों, खासतौर पर पंजाब हिल स्कूल के मिनिएचर पेंटिंग्स की झलक दिखाई देती है और यह अकारण नहीं है।

कला की हमारी परंपरा बेहद समृद्ध है, तभी तो यूरोप में पली-बढ़ी और पढ़ी अमृता शेरगिल जैसी महान कलाकार, जब अजन्ता और एलोरा की गुफाओं में पहुंची तो चित्रों को देखकर दंग रह गईं। उन्होंने अपनी मां को लिखा -‘यहां दीवारों पर खींची गई एक रेखा यूरोपियन पुर्नजागरण से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।’ इसके बाद तो उनके काम का अंदाज ही बदल गया। मैंने भी बहुत कुछ अपने देश की सदियों पुरानी कला से सीखा है, पाया है और उसे समकालीन मुद्दे से जोड़ने की कोशिश की है।

1984 के नरसंहार के दौरान मैं अपनी मां के साथ राहत कैंपों में काम कर रही थी। उस दौर में महसूस की गई पीड़ा को भी मैंने अपने कैनवास पर जगह दी है। ‘वर्ल्ड गोज ऑन’ सीरीज में उसी दर्द को उकेरा गया था, जिसे 1985 में इब्राहिम एलकाजी ने अपनी गैलेरी में प्रदर्शित किया। फिर मुंबई और कोलकाता में भी इसे प्रदर्शित किया गया। इतने बडे़ पैमाने पर हुई मौतों को चित्रों में दिखाने के लिए पहली बार मैंने डूबती हुई आकृतियों के प्रतीकों को माध्यम बनाया था। जबकि दूसरी ओर अन्य लोग सहज रूप से अपने कामों में व्यस्त दिखाई देते हैं। इस तरह एक मानवीय त्रासदी को साधारण जीवन के बैकड्रॉप पर उकेरा गया था।

वृंदावन में कंकाल बन चुकी हजारों विधवाओं को देखने के बाद 1988 में ‘विडोज ऑफ वृंदावन’ सीरीज सामने आई। प्रेम की नगरी एक मिथ सी लगी। मन में सवाल उठा, आखिर कहां थी गोपियां? इन पेंटिंग्स को मास्को में राएसा गोर्बोचेव ने देखकर मुझसे पूछा-‘इन विधवाओं ने अपना सिर क्यों मुंडवा रखा है?’ मैंने उन्हें बताया कि ‘सदियों पुराने अंधविश्वासों के कारण ऐसा होता है।’

इसी तरह रात और दिन, जीवन और मृत्यु से जुड़े मैंने कई चित्र बनाए। लेकिन इन चित्रों में रात और दिन के मेल खाते हुए तथ्य कहीं नहीं दिखते। इन चित्रों में प्रतीक के तौर पर पीले रंगों में एक महिला को कसीदाकारी करते हुए दिखाया गया है, जिसे काली रात आकर काट रही है। यह मेरा पसंदीदा विषय है, क्योंकि यह काफी ऐब्सट्रैक्ट है। एक तरह से कला वक्त को बयां करने वाली होनी चाहिए। अमूर्त चित्रों में आध्यात्मिकता को भी मैंने खोजने की कोशिश की है।

कबीर, नानक, बुद्ध, योगी और योगिनियों के सैकड़ों चित्र इसकी बानगी कहे जा सकते हैं। प्रेम और करुणा के बिना भी जिंदगी अधूरी है? एक बार मैं सोहनी के जन्मस्थान अखनूर में थी। यहीं पर सोहनी का जन्म 500 साल पहले हुआ था। सोहनी की जिंदगी से जुड़ी उसी चेनाब नदी में खड़ी थी मैं। सोहनी की अपनी एक प्रेम कहानी है, लेकिन मेरे लिए प्रत्येक महिला और पुरुष सोहनी है। जो पानी में कूदने की हिम्मत रखते हैं, जो जोखिम ले सकते हैं, वह सोहनी है। जो आसमान को छूना चाहता है, वह सोहनी है।

जो संघर्ष करना चाहता है, वह सोहनी है। 1997 में जब भारत आजादी की 50वीं वर्षगांठ मना रहा था, तो मैंने सोहनी पर चित्रों की एक सीरीज बनाई थी। इसमें प्रवेश द्वार के फर्श पर बनायी गई आभासी नदी के बीच असली घड़े रख दिए थे। इनके बीच से होकर दर्शकों को जाना था, ताकि वे खुद सोहनी को महसूस कर सकें। यहां घड़ा हर व्यक्ति या दुनिया का प्रतीक था। घड़ा मिट्टी है और अंत में हमें भी मिट्टी में मिल जाना है।

एक पंक्ति मुझे बार-बार याद आती है-"विषम विषम रहे विषमाद/ जिन देख्या, तिन आया स्वाद" हिरोशिमा पर बमबारी के 50 वर्ष पूरे होने पर म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट, हिरोशिमा ने मुझे इस भीषण कांड पर एक बड़ा म्यूरल बनाने को कहा।  एक अलग किस्म के दर्द को दीवारों पर उकेरते हुए मैं रो पड़ी थी। पिछले 13 सालों के दौरान दिल्ली, बंगलूरु, जर्मनी और काठमांडू में पर्यावरण पर आधारित 8 नॉन कमर्शियल म्यूरल्स मैंने किए हैं।

पर्यावरण से जुडे़ चित्र तो मैं 1988 से बनाती रही हूं, जब मैंने यह महसूस किया कि मेरे बचपन की दिल्ली तेजी से खत्म हो रही है। आज हमें हरियाली को बचाने की जरूरत है। यह भी एक दर्द है जो तेजी से भाग रही दिल्ली में सौगात की तरह मिलता है। पता नहीं यह अंतहीन सफर कल कहां ले जाएगा? लेकिन दर्द किसी भी समाज, धर्म और समूह से जुड़ा हो, मुझे उस पीड़ा को व्यक्त करने के लिए हमेशा रंग अपनी ओर खींचता है। शायद यही मेरी जिंदगी है।
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