यह किताब एक ऐसे भारतीय समुदाय की गाथा है, जो है तो मुट्ठी भर, लेकिन उनकी उपलब्धियां अनंत हैं। जी हां, आपका अनुमान सही है। यहां जिक्र पारसियों और उनकी अभिन्न पहचान टाटा कंपनी का है।
टाटा केवल एक संज्ञा ही नहीं, विशेषता भी है। टाटा की साख भारतीय उद्योग जगत का उज्ज्वलतम उदाहरण है। हालांकि टाटा समूह ने अपार दौलत पैदा की, पर केवल अपने लिए नहीं बल्कि देश के सामने एक आदर्श व्यापारिक घराने की मिसाल रखी।
इसी परिवार से जुड़े रूसी.एम.लाल ने अपनी पुस्तक का शीर्षक 'द थ्रेड ऑफ गॉड इन माई लाइफ’ यानी ‘मेरे जीवन में दैवी तंतु' रखा है। इस कृति की भूमिका में सुविख्यात वकील फाली एस.नरीमान लिखते हैं- ‘यदि ईश्वर नहीं है तो हर निर्माण नश्वर है। यदि ईश्वर अनुपस्थित है तो बसेरे का रखवाला भी निरर्थक है।’
मेरा मानना है कि बहता जीवन आसान है पर उसके बारे में लिखना बहुत मुश्किल है। लेकिन, रूसी.एम.लाल ने ये दोनों कर दिखाए। इसी भूमिका में उन्होंने भारतीय मामलों के तत्कालीन ब्रिटिश मंत्री लॉर्ड पैथिक लॉरेंस को उद्धत किया है-एक पादरी एक बार एक किसान को सांत्वना दे रहा था।
क्या हुआ यदि दो साल पहले तुम्हारा सूअर मर गया। क्या हुआ अगर एक साल पहले तुम्हारा घर जल गया और कि तुम्हारी पत्नी भी चल बसी। इन सबसे मेरा भाग्य पर से विश्वास उठ गया, लेकिन किसी भी पादरी या चर्च के ऊपर एक सत्ता है, जो भाग्य का भी कान खींच सकती है।
इस पुस्तक को एक बैठक में पढ़ा जा सकता है और इसे पढ़ने के बाद सारे संशय समाप्त हो जाते हैं तथा उनका स्थान विश्वास ले लेते हैं। रूसी लाला का भगवान में अटूट विश्वास है। वे दो बार गंभीर रूप से बीमार पड़े, एक खंडित विवाह को पुनर्जीवित किया।
आर्थिक संकटों को आर्थिक सुरक्षा में परिवर्तित किया और दो महाद्वीपों में चार अलग-अलग कार्यक्षेत्रों में कीर्ति गाथा स्थापित की। यह प्रेरक आत्मकथा इस अनिवार्य दर्शन को महिमामंडित करती है कि जो बदला नहीं जा सकता उसे स्वीकार कर लो। जीवन को कुछ आदर्शों की सहायता से संचालित करो और इन सबके परे ईश्वर के सानि्नध्य में जीवन का आनंद लो।
इस रचना में प्रार्थना में समर्पित ऑक्सफोर्ड पुस्तक से एक खूबसूरत उिक्त ली गई है- 'हे प्रभु मैं मुस्तफा दर्जी हूं और मोहम्मद अली की दुकान पर काम करता हूं। सारा दिन बैठकर, कपड़ों में सुई-धागा पिरोता रहता हूं। हे, अन्नदाता तुम सुई हो और अपन धागा। मैं तुमसे जुड़ा हूं और तुम्हारा अनुसरण करता हूं। जब धागा सुई से फिसलने की कोशिश करता है, यह उलझ जाता है। तब इसे काट देना चाहिए ताकि इसे सही जगह पर फिट किया जा सके। हे, पालनहार, मुझे हमेशा साथ रखना। मैं एक दर्जी हूं और चौक पर मोहम्मद अली की दुकान पर काम करता हूं।'
लाला निहायत ही विनम्र व्यक्तित्व रखते थे। उन्होंने कभी अपने को महत्वपूर्ण नहीं माना। लेकिन, शायद उनका आठ दशकों का जीवन काफी मायने रखता है। उन्होंने एक अलग रास्ता चुना। उनका जीवन एक सीधी लाइन में नहीं चला। हर पड़ाव अपने आप में पूर्ण था।
उन्होंने अपनी जीवनगाथा के प्रारंभिक वर्षों में ईश्वर की खोज, मूल्यों को अपनाने, महत्वपूर्ण प्रसंगों, अनुमानों और अंत में चिंतन को अपना चश्मा बनाया। उन्हें कई लोगों ने यह सलाह दी कि उन्हें अपनी जीवनी लिखनी चाहिए। उनका हर बार एक ही उत्तर होता था, ‘क्यों, उससे क्या होगा?’ एक दिन उन्होंने मुस्तफा दर्जी की कथा पढ़ी। उसका धागा, लाला का धागा हो गया। लाला ने विश्वास और उद्देश्य को अपने चिंतन का आधार बनाया।
हर व्यक्ति को इन दोनों की आवश्यकता पड़ती है। पहले आप विश्वास का सहारा लेते हैं, फिर यह आपका सबल बनता है। लाला लिखते हैं कि जगत में प्रचलित सभी विश्वासों को मानने वाले किसी असीम अनंत सत्ता में भरोसा रखते हैं। यह उस सर्वव्यापी सर्वगुणसंपन्न और सर्वशक्तिमान का करिश्मा है कि कोई उनके कान में फुसफुसाकर चला जाता है कि यही सही रास्ता है। बढ़ लो।
'मेरे जीवन का रहस्य है- दिन में एक समय निश्चित कर लो। उठते ही या सोने से पहले। तब, जबकि मन का धुंधलका छूट गया हो। प्रेरक साहित्य ने मुझे हमेशा राह सुझाई है। मेरी एक पुस्तक में जीवाणुओं को उत्सव कहा गया है। मैंने इसे एक कैंसर से बच गए मरीज का खत कहा है। आदमी को अपनी खोज खुद करनी चाहिए। इसके लिए दिलो-दिमाग का मुक्त होना जरूरी है। आजकल लोग त्याग स्वाध्याय से कतराते हैं। जीवन की आपाधापी में कुछ वक्त अपने लिए निकालिए।’
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, मीडिया विश्लेषक और संस्कृतिकर्मी हैं।)