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सबको चांद चाहिए : इसी साल एक रोबोटिक लैंडर चंद्र अभियान पर निकला था, लेकिन वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया

केनेथ चैंग Published by: Raman Singh Updated Mon, 15 Jul 2019 03:25 AM IST
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चांद की होड़ - फोटो : a

ऐसा लगता है कि आज हर कोई चांद पर पहुंचना चाहता है। विगत जनवरी में एक चीनी रोबोटिक अंतरिक्ष यान चेंज-4  ने एक छोटे रोवर के साथ चांद के सुदूर किनारे पर उतरकर इतिहास रचा। भारत ने आज से अपना महत्वाकांक्षी चंद्र अभियान चंद्रयान-2 की शुरुआत की है। इस्राइल से भी इसी साल एक छोटा रोबोटिक लैंडर चंद्र अभियान पर निकला था, लेकिन वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

आने वाले दशकों में इन और दूसरे देशों के भी पर्यटक चांद की सतह पर कदम रख सकते हैं। चीन हालांकि इस मामले में थोड़ा सुस्त रुख अपना रहा है, लेकिन अगले पच्चीस साल में अपने अंतरिक्ष यात्रियों को वहां उतार सकता है। यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने 2050 तक चांद पर 'मून विलेज' शुरू करने की योजना बनाई है। रूस ने भी 2030 तक चांद पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने का लक्ष्य रखा है, हालांकि बहुतों को संदेह है कि इसकी लागत को देखते हुए रूस अपने इस अभियान से हाथ भी खींच सकता है।



1968  से 1972  तक चांद की तरफ 24 अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने वाले अमेरिका की प्राथमिकता इस मामले में कांग्रेस और उसके राष्ट्रपतियों की मर्जी पर निर्भर करती है। लेकिन विगत फरवरी में उप-राष्ट्रपति माइक पेन्स की इस घोषणा से, कि अमेरिकी 2024 में, जो उसके प्रारंभिक लक्ष्य से चार साल पहले है, चांद पर होंगे, पता चलता है कि चांद किस तरह अब नासा की प्राथमिकता में है। ट्रंप द्वारा नासा के नए प्रशासक चुने गए जिम ब्रिडेनस्टाइन कहते हैं, 'चांद के मामले में हमारा अभियान अब बिल्कुल स्पष्ट है।'

चंद्रयान-2 का चांद की सतह पर पहुंचना भारत की तकनीकी प्रगति को रेखांकित करेगा। जबकि चीन इस मामले में वैश्विक ताकत बनना चाहता है। ऐसे ही अमेरिका और नासा के लिए अपने मंगल अभियान में चांद एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। चांद के प्रति यह आकर्षण सिर्फ राष्ट्रों तक सीमित नहीं है।

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चांद की होड़ - फोटो : a
ऐसा लगता है कि आज हर कोई चांद पर पहुंचना चाहता है। विगत जनवरी में एक चीनी रोबोटिक अंतरिक्ष यान चेंज-4  ने एक छोटे रोवर के साथ चांद के सुदूर किनारे पर उतरकर इतिहास रचा। भारत ने आज से अपना महत्वाकांक्षी चंद्र अभियान चंद्रयान-2 की शुरुआत की है। इस्राइल से भी इसी साल एक छोटा रोबोटिक लैंडर चंद्र अभियान पर निकला था, लेकिन वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

आने वाले दशकों में इन और दूसरे देशों के भी पर्यटक चांद की सतह पर कदम रख सकते हैं। चीन हालांकि इस मामले में थोड़ा सुस्त रुख अपना रहा है, लेकिन अगले पच्चीस साल में अपने अंतरिक्ष यात्रियों को वहां उतार सकता है। यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने 2050 तक चांद पर 'मून विलेज' शुरू करने की योजना बनाई है। रूस ने भी 2030 तक चांद पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने का लक्ष्य रखा है, हालांकि बहुतों को संदेह है कि इसकी लागत को देखते हुए रूस अपने इस अभियान से हाथ भी खींच सकता है।

1968  से 1972  तक चांद की तरफ 24 अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने वाले अमेरिका की प्राथमिकता इस मामले में कांग्रेस और उसके राष्ट्रपतियों की मर्जी पर निर्भर करती है। लेकिन विगत फरवरी में उप-राष्ट्रपति माइक पेन्स की इस घोषणा से, कि अमेरिकी 2024 में, जो उसके प्रारंभिक लक्ष्य से चार साल पहले है, चांद पर होंगे, पता चलता है कि चांद किस तरह अब नासा की प्राथमिकता में है। ट्रंप द्वारा नासा के नए प्रशासक चुने गए जिम ब्रिडेनस्टाइन कहते हैं, 'चांद के मामले में हमारा अभियान अब बिल्कुल स्पष्ट है।'

चंद्रयान-2 का चांद की सतह पर पहुंचना भारत की तकनीकी प्रगति को रेखांकित करेगा। जबकि चीन इस मामले में वैश्विक ताकत बनना चाहता है। ऐसे ही अमेरिका और नासा के लिए अपने मंगल अभियान में चांद एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। चांद के प्रति यह आकर्षण सिर्फ राष्ट्रों तक सीमित नहीं है।

कई कंपनियां चांद पर उपकरण पहुंचाने और प्रयोगों को गति देने के उद्देश्य से नासा का ठेका हासिल करने की कतार में खड़ी हैं। अमेजन के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी जेफ बेजोस की रॉकेट कंपनी ब्लू ऑरिजिन एक विशाल लैंडर विकसित करने के काम में लगी है, जो अंतरिक्ष यात्रियों और कार्गो को चांद की सतह तक ले जा सके। कंपनी की योजना यह लैंडर नासा को बेचने की है।

अपोलो मिशन खत्म होने के तीन दशक बाद चांद के बारे में कम ही लोग सोच रहे थे। चंद्र अभियान की दौड़ में अमेरिका ने रूस को पछाड़ दिया था। वर्ष 1972 में अपोलो 17 के बाद, जो नासा का चांद पर आखिरी अभियान था, तत्कालीन सोवियत संघ ने कुछ और रोबोटिक अंतरिक्ष यान चांद पर भेजे, लेकिन जल्दी ही उसकी भी उसमें दिलचस्पी खत्म हो गई।

ब्रिडेनस्टाइन कहते हैं कि चांद पर नासा की दोबारा दिलचस्पी राजनेताओं के रुख को देखते हुए है। वे चंद्र अभियान के प्रति अपनी बेरुखी दिखाएं, इससे पहले नासा अपने इस अभियान में तेजी लाना चाहता है। अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर उतारने का लक्ष्य नासा ने 2024 रखा है-अगर ट्रंप दोबारा चुनाव जीतते हैं, तो वह उनके राष्ट्रपति काल का आखिरी वर्ष होगा। नासा ने अपने नए चंद्र अभियान का नाम आर्टेमिस रखा है, जो यूनानी मिथक कथा में अपोलो की बहन है।

इस अभियान के तहत सबसे पहले 2020 में एक मानवरहित यान भेजने का लक्ष्य है, हालांकि इसमें एक साल की देर भी हो सकती है। जबकि अंतरिक्ष यात्रियों समेत नासा का दूसरा अभियान 2022 में तय है, हालांकि वह यान चांद की सतह पर नहीं उतरेगा। जबकि 2024 में नासा का तीसरा चंद्र अभियान होगा, जिसमें पहली अमेरिकी महिला अंतरिक्ष यात्री शामिल होगी।

चांद के प्रति दुनिया के बढ़ते आकर्षण का प्रमुख कारण पानी है। दरअसल वैज्ञानिक खोजों में ध्रुवीय गड्ढों में बहुत नीचे बर्फ होने की संभावना जताई गई है। यह भविष्य में चांद पर पहुंचने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के लिए पेयजल का बेशकीमती स्रोत तो हो ही सकता है, कृत्रिम प्रकाश संश्लेषण के जरिये पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विखंडित भी किया जा सकता है। वह ऑक्सीजन सांस लेने के लिए हवा मुहैया करा सकती है, तो हाइड्रोजन का इस्तेमाल रॉकेट प्रणोदक के रूप में किया जा सकता है।

इस तरह चांद पर या चांद के पास एक रिफ्यूलिंग स्टेशन भविष्य में अंतरिक्ष यानों के लिए पड़ाव का काम कर सकता है, जहां रुककर अपने टैंक भरकर वे सौरमंडल के अपने अभियानों में आगे निकल सकते हैं। वर्ष 1998 में लूनर प्रोस्पेक्टर ने चांद के प्रति फिर से दिलचस्पी जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। चांद पर पानी या इसके एक घटक हाइड्रोजन की खोज करने वाला यही था। लेकिन तब चंद्र अभियान का आकर्षण पैदा नहीं हुआ।

बराक ओबामा के दौर में आर्थिक मंदी ने चंद्र अभियान की संभावना वैसे भी खत्म कर दी थी। वर्ष 2007 में एक्स प्राइज फाउंडेशन ने घोषणा की कि वह चांद पर उतरने वाली पहली निजी टीम को दो करोड़ डॉलर का इनाम देगा। लेकिन इनाम देने की समयसीमा कई बार बढ़ाए जाने के बावजूद किसी ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके बावजूद चांद के प्रति दिलचस्पी कम नहीं हुई थी।

2024 में चांद पर उतरने का नासा का अभियान अमेरिकी कांग्रेस की फंडिंग पर भी कमोबेश निर्भर करेगा। नासा ने इसके लिए वित्तीय वर्ष 2020 में अतिरिक्त 1.6 अरब डॉलर मांगा है। ब्रिडेनस्टाइन का कहना है कि लक्ष्य को चार साल पहले खींच लाने से लागत बढ़कर बीस से तीस अरब डॉलर हो जाएगी। पर यह बहुत चुनौतीपूर्ण नहीं है, क्योंकि कई व्यावसायिक साझेदारों ने इस अभियान में अपनी पूंजी लगाने का भरोसा दिया है।

लेकिन ब्रिडेनस्टाइन यह जरूर कहते हैं कि रिपब्लिकन्स और डेमोक्रेट्स के समर्थन के बगैर नासा का चंद्र अभियान परवान नहीं चढ़ पाएगा। गौरतलब है कि कुछ डेमोक्रेट्स चंद्र अभियान के प्रति उत्साही नहीं है, और विगत जून में राष्ट्रपति ट्रंप ने भी चांद के बजाय मंगल को तरजीह देने के बात कही। पर नासा इससे विचलित नहीं है। उसका मानना है कि चंद्र अभियान के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए इसे राजनीति से परे रखकर देखना होगा।

© The New York Times 2019
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