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Europe: अपनी दशा के लिए यूरोप ही जिम्मेदार है, जिसकी लाठी उसकी भैंस वाले नए युग की शुरुआत हुई

महेंद्र वेद
Updated Tue, 03 Feb 2026 06:54 AM IST

सार

कभी अमीर और शक्तिशाली उपनिवेशवादी यूरोपीय देश अपनी बड़ी-बड़ी उपलब्धियों के बावजूद, ट्रंप के सामने झुके हुए हैं, और अगर उन्हें ठीक लगे, तो व्यावसायिक सौदा करने के लिए तैयार हैं। यूरोपीय देशों में मकसद और एकता की कमी है, जहां हर कोई 'छोटा ट्रंप' बनने की कोशिश कर रहा है।
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डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : पीटीआई


वजह चाहे जो भी हो, दुनिया रोजाना की कड़वी बातों और एक ऐसे इन्सान के मिजाज के भरोसे है, जो अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके कनाडा, फ्रांस और स्विट्जरलैंड जैसे अपने सहयोगियों को भी नीचा दिखा रहा है। उनकी मौजूदा नाराजगी यूरोप के खिलाफ है, जो ईरान या क्यूबा के खिलाफ भी हो सकता है। उन्होंने हाल ही में दावोस में हुई वैश्विक बैठक में इसके नेताओं (सभी नाटो सदस्य) के लिए खुलकर 'बेवकूफ' शब्द का इस्तेमाल किया। पश्चिमी दुनिया पहले कभी इतनी बंटी हुई नहीं थी।


यह चूहे-बिल्ली का खेल है, जिसमें कभी अमीर और शक्तिशाली उपनिवेशवादी यूरोपीय देश अपनी बड़ी-बड़ी उपलब्धियों के बावजूद, ट्रंप के सामने झुके हुए हैं, और अगर उन्हें ठीक लगे, तो व्यावसायिक सौदा करने के लिए तैयार हैं, पर इसकी कोई गारंटी नहीं है कि वह इससे पीछे हटेंगे या और ज्यादा चाहेंगे। यूरोपीय देशों में मकसद और एकता की कमी है, जहां हर कोई 'छोटा ट्रंप' बनने की कोशिश कर रहा है। तीन वर्षों तक, उन्होंने यूक्रेन में रूस को हराने के लिए अमेरिका का इस्तेमाल किया, और उम्मीद की कि ट्रंप (जिन्हें वे पुतिन समर्थक मानते थे) राष्ट्रपति चुनाव हार जाएंगे।


ट्रंप ने यूक्रेन को एक ऐसे युद्ध से बचाने के लिए यूरोप की चिंता के बजाय अमेरिकी हितों (आर्थिक और सैन्य, दोनों) को प्राथमिकता दी है, जिसे जीता नहीं जा सकता। वह चाहते हैं कि अमेरिका यूक्रेन से बाहर निकल जाए, लेकिन रूस और यूक्रेन, दोनों से व्यावसायिक सौदा किए बिना नहीं। पिछले साल यूक्रेन के जेलेंस्की ने ट्रंप का अपमान किया था, फिर भी वह अमेरिकी मदद पर पूरी तरह निर्भर थे, जो अन्य यूरोपीय देश नहीं दे सकते थे। यह सब पश्चिमी दुनिया के संकट को दिखाता है।


असली नाकामी वॉशिंगटन की नहीं, बल्कि यूरोपीय नेताओं की है, जो दबाव के आगे झुक जाते हैं। अमेरिका इसलिए दबाव डालता है, क्योंकि उसे व्यवस्थित शोषण को बर्दाश्त करने की उम्मीद होती है। व्यापार, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, राजनीति और कूटनीति के क्षेत्र में यूरोपीय संघ ने अपनी ताकत खो दी है। दुनिया के सबसे बड़े एकल बाजार और मुख्य वित्तीय केंद्र के तौर पर यूरोप अब भी काफी शक्तिशाली है। यूरोप में अमेरिकी सेना यूरोपीय इलाके, इंफ्रास्ट्रक्चर और सहमति पर निर्भर करती है। अमेरिकी कंपनियां राजस्व और पैमाने के लिए यूरोपीय बाजार तक पहुंच पर निर्भर हैं। इसलिए यूरोप ने अपना पतन खुद चुना है। इसके नेता अपनी ताकत का इस्तेमाल करने से मना करते हैं। ग्रीनलैंड के मामले में अगर ट्रंप पीछे हटे हैं, तो इसका कारण बाजार में उथल-पुथल, कड़े विरोध और शायद यह एहसास है कि दूसरे विकल्प मौजूद हैं।


अमेरिका के टैरिफ और कब्जे के दावों पर कनाडा की प्रतिक्रिया ने चीन के साथ जुड़कर व्यापार में विविधता लाने की इच्छा दिखाई, जिससे पता चलता है कि जबर्दस्ती करने से जवाबी कार्रवाई होती है। यूरोप भी बड़े पैमाने पर ऐसा कर सकता है। वह चाणक्य नीति का इस्तेमाल कर सकता है-दुश्मन के दुश्मन से दोस्ती करो। पहली जरूरत वॉशिंगटन पर लागत थोपना है। यूरोप का रक्षा खर्च अमेरिका को छोड़कर किसी भी देश से ज्यादा है, फिर भी खरीद प्रक्रिया पुनः यूरोप के हथियारबंद होने पर अमेरिकी दबदबे को और मजबूत कर रही है। जब व्हाइट हाउस धमकी देता है, तो निर्भरता सामने आ जाती है, जिससे नाटो की मिलकर काम करने की क्षमता राजनीतिक कमजोरी बन जाती है। इसे हल करने के लिए, यूरोपीय सरकारों को यह अनिवार्य करना चाहिए कि दो साल के अंदर 90 प्रतिशत रक्षा खरीद घरेलू स्तर पर की जाए। अमेरिकी समीकरण को पलटने के लिए, यूरोप को यह साबित करना होगा कि विकल्प मौजूद हैं। इसके लिए चीन के साथ  बातचीत जरूरी है। इसका मतलब न तो चीन से वैचारिक सहमति है और न ही उसके गवर्नेंस मॉडल को मंजूरी देना, बल्कि जबर्दस्ती को रोकने के लिए शक्ति संतुलन के तर्क का इस्तेमाल करना है। हालांकि कनाडा ने ऐसा किया है, लेकिन यूरोप ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि रूस से सहयोग करने की खातिर वह चीन को सबसे बुरा मानता है। दावोस के बाद, ट्रंप ने अपनी बयानबाजी थोड़ी कम कर दी है। लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है कि वह यूरोप और यहां तक कि भारत के साथ भी आक्रामक रवैये नहीं अपनाएंगे।


दावोस ने नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के धीरे-धीरे टूटने की गहरी संस्थागत बीमारी को उजागर किया। इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन ने पश्चिमी गोलार्ध पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया है। यह सहयोगियों को 'सीमित' समर्थन देगा, और घरेलू सुरक्षा को अपनी 'सबसे बड़ी प्राथमिकता' बनाएगा। नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी में उसकी सुरक्षा प्राथमिकताओं में एक बड़ा बदलाव आया है, जिसमें कहा गया है कि चीन अब उसकी मुख्य चिंता नहीं है। चीन के साथ संबंधों को अब 'टकराव नहीं, बल्कि ताकत' के रूप में देखा जाएगा।
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ट्रंप का हालिया गुस्सा इस बात से जुड़ा है कि उनके हिसाब से अमेरिका की तुलना में नाटो के अभियानों में दूसरे सदस्य देशों की भागीदारी कम है। ट्रंप की इस इच्छा के बावजूद कि रूस यूक्रेन का इलाका अपने पास रखे, यूक्रेन के इलाके को बनाए रखने और अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए यूरोप के सामने एक मुश्किल रास्ता है। नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी डॉक्यूमेंट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन का तरीका पिछले शीत युद्ध के बाद के प्रशासनों की बड़ी-बड़ी रणनीतियों से बिल्कुल अलग होगा। इसमें यह भी कहा गया है कि काल्पनिक आदर्शवाद छोड़ो और कठोर यथार्थवाद अपनाओ।


हालात को गहराई से समझते हुए कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा कि पुरानी दुनिया की व्यवस्था वापस नहीं आएगी। यह तब हुआ, जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी बिना नियमों वाली दुनिया की ओर बदलाव की चेतावनी दी।         

 
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