फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

यूरो से ब्रिटेन की दूरी

विज्ञापन
विज्ञापन
बीते दिनों ब्रिटेन ने यूरो जोन के साथ न जुड़ने और यूरो को स्थानीय मुद्रा के रूप में न अपनाने का फैसला लिया है। ब्रिटेन की स्थानीय मुद्रा पाउंड स्टर्लिंग है। सरकार ही नहीं, वहां की जनता भी यूरो को स्थानीय मुद्रा के रूप में स्वीकार करने के खिलाफ है।
विज्ञापन


बीबीसी रेडियो के एक जनमत सर्वेक्षण के अनुसार, 71 फीसदी ब्रिटिशों ने यूरो को स्थानीय मुद्रा के रूप में अपनाने के खिलाफ विचार व्यक्त किए। यूरो को स्थानीय मुद्रा के रूप में स्वीकार करने के लिए ब्रिटिश सरकार को तीन स्तरीय प्रक्रिया से गुजरना होगा। पहले कैबिनेट, फिर संसद और उसके बाद जनमत संग्रह के रूप में जनता की मंजूरी।

विश्व की 7.3 फीसदी जनसंख्या और तकरीबन 20 फीसदी वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद की हिस्सेदारी रखने वाले यूरोपीय संघ में कुल 27 देश हैं। यूरोपीय संघ के नीति निर्माता संस्थाओं में यूरोपीय आयोग, यूरोपीय संघ की परिषद और यूरोपीय संसद है। केवल 17 देश यूरो को स्थानीय मुद्रा के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
विज्ञापन


इनको यूरो जोन देशों के रूप में जाना जाता है। ये हैं- ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, साइप्रस, एस्टोनिया, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, आयरलैंड, इटली, लग्जमबर्ग, माल्टा, नीदरलैंड, पुर्तगाल, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया और स्पेन। इन देशों की मौद्रिक नीतियां यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) द्वारा तैयार की जाती हैं। ईसीबी का नियंत्रण एक अध्यक्ष और सदस्य देशों के केंद्रीय बैंक के प्रमुखों के एक बोर्ड के जरिये होता है।

यूरो को स्थानीय मुद्रा के रूप में स्वीकार करने के सकारात्मक पक्ष के तौर पर कहा जा रहा है कि व्यापार और निवेश के लिए विनिमय मुद्रा की कीमत में कमी लाकर, एक मुद्रा के रूप में यूरो आंतरिक बाजार को मजबूत करेगा। एक अनुमान के मुताबिक, स्थानीय मुद्रा के रूप में यूरो को अपनाने से 30 वर्षों के दौरान ब्रिटेन और यूरो जोन के अन्य देशों के बीच व्यापार में 50 फीसदी तक का इजाफा हो सकता है।

इसके अलावा यूरो को स्वीकारने की स्थिति में सरकारों को कड़े आर्थिक अनुशासन का पालन भी करना पड़ेगा, जो अर्थव्यवस्था के स्थायित्व के लिए मददगार है। लेकिन इन सबके बावजूद इसके खिलाफ कई ऐसे तर्क भी हैं, जिनके दम पर ब्रिटेन अपने कदम पीछे खींच रहा है।

गॉर्डन ब्राउन ने 1997 में पांच आर्थिक प्रस्ताव रखे थे, जिनके माध्यम से यूरो को अपनाने के मामले में ब्रिटेन की वास्तविक स्थिति का परीक्षण करना था। इनमें यूरो जोन के साथ सम्मिलन, यूरो को स्वीकार करने के लिए पर्याप्त लचीलापन, नौकरियों, वित्तीय सेवाओं और विदेशी निवेश पर प्रभाव शामिल थे।

इन मानदंडों से पता चला कि ब्रिटेन और यूरो जोन के अन्य देश, आर्थिक चक्र में अलग-अलग अवस्थाओं पर हैं। ब्रिटेन विकास कर रहा है, जबकि अन्य देश मंदी का सामना कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि यूरो जोन के अन्य देशों की तुलना में ब्रिटेन की बनावट अलग तरह की है।

उदाहरण के लिए, ब्रिटेन में कम ब्याज दरों के साथ ज्यादा लचीला श्रम बाजार है, जिसका सीधा मतलब ज्यादा नौकरियां होना है। जबकि यूरो जोन के अन्य देशों में ऐसी स्थिति नहीं है। इससे ब्रिटेन की तरफ अन्य देशों से आने वाले श्रम के प्रवाह को बढ़ावा मिल सकता है। राजनीतिक कारणों से भी देखें, तो ब्रिटेन के लोग हमेशा अपनी एक अलग और विशेष पहचान के पक्षधर रहे हैं।

चूंकि यूरो जोन की मौद्रिक नीति का संचालन यूरोपीय केंद्रीय बैंक करती है, ऐसे में यूरो को स्थानीय मुद्रा के रूप में अपनाने के बाद ब्रिटेन अपनी मौद्रिक स्वतंत्रता खो देगा। अगर आर्थिक मंदी की स्थिति आई, तो सरकार ब्याज दरों में कटौती नहीं कर पाएगी। लिहाजा मांग को बढ़ाना और मंदी से बाहर निकलना कठिन हो जाएगा।

यूरो को अपनाने का मतलब है कि ब्रिटेन की मौद्रिक स्वायत्तता, यूरोपीय केंद्रीय बैंक को स्थानांतरित हो जाएगी। ऐसे में मंदी के दौर में पाउंड स्टर्लिंग की कीमत में अवमूल्यन करके निर्यात में इजाफा करने की नीति नहीं अपनाई जा सकेगी। इसके अलावा मास्ट्रिच संधि, जिसे यूरो जोन की संधि भी कहा जाता है, सरकारी ऋण के स्तर को सीमित कर देगा, लिहाजा इससे लोक खर्च के लिए सरकार के हाथ बंध जाएंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें