राजनीति में अच्छे और ईमानदार लोगों को लाने का कानूनी प्रावधान आवश्यक है। यह एक मुश्किल काम है। लेकिन देश और देश की राजनीति आसानी से सुधर नहीं सकती, उसके लिए मुश्किल काम करने ही पड़ेंगे।
देश की राजनीति में दलबदल का पहला और चकित करने वाला घटनाक्रम हरियाणा में सामने आया था, जब अक्तूबर, 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने पंद्रह दिन में तीन बार पार्टी बदली थी। इस कारण उस घटना का नाम ही 'आया राम गया राम' हो गया। दलबदल तब से चालू है। पिछले पांच साल में जिन सांसदों और विधायकों ने पार्टी बदली और दोबारा चुनाव लड़ा, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने हाल ही में इनके बारे में शोध किया।
उसमें पता चला है कि इस दौरान 443 सदस्यों ने दलबदल कानून तोड़े। इनमें से 170 (42 फीसदी) विधायकों ने कांग्रेस छोड़कर दूसरी पार्टियों में जाना उचित समझा, तो भाजपा के मात्र 18 विधायकों ने दूसरी पार्टियों का दामन थामा। जबकि 182 (45 फीसदी) विधायक अपनी पार्टी छोड़ भाजपा में गए। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि पिछले दिनों मध्य प्रदेश, मणिपुर, गोवा, अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक में पुरानी सरकार का गिरना और नई सरकार का गठन होना दलबदल के कारण ही हुआ। सांसद और विधायक इतनी जल्दी दल क्यों बदलते हैं? वैसे तो इसके बहुत कारण हो सकते हैं, पर सामान्य रूप से मंत्री बनने या धनराशि मिलने का प्रलोभन प्रमुख है।
इससे कई सवाल उत्पन्न होते हैं। पहले तो नवनिर्वाचित विधायकों के आत्मसम्मान पर शंका होती है। अक्सर इन्हें वातानुकूलित बसों या हवाई जहाज में बिठाकर महंगे रिजॉर्ट या होटलों में ले जाया जाता है और लगभग नजरबंद करके रखा जाता है। अब अमूमन हर विधानसभा चुनाव के बाद ऐसे दृश्य आम हैं। खुद विधायकों को भी नहीं महसूस होता कि इस तरह बंदी बनना उनके विवेक और परिपक्वता पर प्रश्नचिह्न है। किसी भी व्यक्ति, खासतौर से चुने हुए नेता के आत्मसम्मान को इस तरह के व्यवहार से घोर आपत्ति होनी चाहिए। लेकिन उनकी तस्वीरों और वीडियो क्लिप से दिखता है कि वे इस हालत में बहुत खुश हैं।
इसका यही अर्थ है कि हमारे विधायकों-सांसदों में परिपक्वता की कमी है। यह कहा जा सकता है कि राजनीति में नैतिकता खत्म ही हो गई है। राजनीति में आने वालों का एकमात्र उद्देश्य रुपये कमाना और संपत्ति बढ़ाना है। लॉ कमीशन ऑफ इंडिया ने 1999 में जारी अपनी एक रिपोर्ट में यह लिखा था कि 'सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ रहा है। ऐसा लगता है कि लोगों का राजनीति में आने का और चुनाव लड़ने का केवल एक ही कारण है कि वे रातोंरात धनवान हो जाएं।' राजनीति का अपराधीकरण भी नैतिकता के अभाव का एक प्रमुख कारण है। जब लोकसभा के 43 फीसदी सदस्यों के विरुद्ध गंभीर आपराधिक मामले अदालतों में चल रहे हों, तब नैतिकता की आशा रखना अव्यावहारिक लगता है। हमारे राजनीतिक दलों के आंतरिक मामलों में लोकतांत्रिक सिद्धांतों का कोई स्थान नहीं है। हर राजनीतिक दल व्यक्ति विशेष, एक समूह या एक परिवार की मर्जी पर चलता है।
चुनावों में उम्मीदवारों का चयन भी इनकी मर्जी से होता है। उसमें कोई लोकतांत्रिक प्रावधान नहीं है। दलबदल को रोकने के लिए वर्ष 1985 में संविधान में 52वां संशोधन कर दल-बदल विरोधी कानून बनाया गया था। उसमें यह प्रावधान था कि अगर कोई सांसद या विधायक संसद या विधानसभा के सत्र में अपनी पार्टी की व्हिप के विपरीत मत दे, तो उसकी सदस्यता खत्म की जा सकती है। किसी दूसरे दल में शामिल होने पर भी उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है। लेकिन इसमें एक ढील भी दी गई कि दो तिहाई या उससे ज्यादा सांसद या विधायक दलबदल करें, तो सदस्यता खत्म नहीं होगी। दलबदल कानून किस सांसद या विधायक पर लागू होगा या नहीं होगा, यह फैसला केवल संसद या विधानसभा के अध्यक्ष ही कर सकते हैं। दलबदल कानून बन गया और कुछ साल तक इसका थोड़ा-बहुत असर भी दिखाई पड़ा। लेकिन दो तिहाई वाले प्रावधान का नतीजा यह हुआ कि लोगों ने कहना शुरू किया कि विधायकों और सांसदों की थोक में तो खरीद-फरोख्त हो सकती है, फुटकर नहीं।
इस कानून से बचने की एक और अनूठी तरकीब निकाली गई। इसके तहत विधानसभा के अध्यक्ष इस बात का फैसला ही नहीं करते थे कि अमुक सदस्य ने इस कानून का उल्लंघन किया है या नहीं। बदलते समय के साथ यह कानून लगभग निरर्थक हो गया। वर्ष 2003 में 91वें संविधान संशोधन में कहा गया कि दलबदल के बाद सांसद या विधायक कोई लाभकारी पद धारण नहीं कर सकते। संशोधन में यह भी कहा गया कि प्रदेश सरकार में मंत्रियों की संख्या सदस्यों की कुल संख्या से 15 फीसदी से अधिक नहीं हो सकती। इन संशोधनों की वजह से भी स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं हुआ। इस स्थिति से निपटने के लिए कुछ मूलभूत सुधारों की आवश्यकता है। पहली बात तो यह है कि सदस्यों के दल बदलने का फैसला संसद या विधानसभा अध्यक्ष के बजाय संसद के लिए राष्ट्रपति और विधानसभा के लिए राज्यपाल करें।
फैसला करने से पहले उन्हें चुनाव आयोग की सलाह लेनी चाहिए। एक कानून यह भी होना होना चाहिए कि राजनीतिक दलों का आंतरिक कामकाज कैसा होगा। यदि राजनीतिक दल आंतरिक रूप से लोकतांत्रिक नहीं होंगे, तो वे भला देश में लोकतांत्रिक प्रणाली कैसे चला सकेंगे? इस बारे में लॉ कमीशन ऑफ इंडिया की 1999 में जारी रिपोर्ट में विस्तारपूर्वक चर्चा है। सर्वोच्च न्यायालय ने 13 फरवरी, 2020 के अपने एक फैसले में कहा कि अगर राजनीतिक दल ऐसे व्यक्तियों को टिकट देते हैं, जिनके विरुद्ध गंभीर आपराधिक मामले अदालतों में चल रहे हैं, तो दलों को इसके विस्तृत कारण बताने होंगे। शीर्ष अदालत ने तो यहां तक कहा है कि जिताऊ उम्मीदवार होना आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति को टिकट देने का कारण नहीं हो सकता।
राजनीति में अच्छे और ईमानदार लोगों को लाने का कानूनी प्रावधान आवश्यक है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक दलों या राजनेताओं से यह उम्मीद नहीं की जा सकती। इसके लिए जनता, न्यायपालिका और मीडिया समूहों को एकजुट होकर राजनीतिक दलों को अपने ढांचे में सुधार लाने के लिए विवश करना होगा। यह एक मुश्किल काम है। लेकिन देश और देश की राजनीति आसानी से सुधर नहीं सकती, उसके लिए मुश्किल काम करने ही पड़ेंगे।
-लेखक आईआईएम, अहमदाबाद के सेवानिवृत्त डीन और एडीआर के संस्थापक सदस्य हैं।