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दशहरा: विजयदशमी हमें कौन-सा संदेश देती है... व्यक्तिगत स्वार्थ से परे मानव कल्याण हो ध्येय, परहित का भी बोध हो

विश्वनाथ त्रिपाठी
Updated Sat, 12 Oct 2024 04:41 AM IST

सार

विजयदशमी अनैतिकता पर नैतिकता और मानवता की विजय का पर्व है। यह हमें प्रेरणा देता है कि हम सिर्फ अपनी चिंता न करें, बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थ और फायदों से उठकर मानव कल्याण के लिए कार्य करें तथा दूसरों के हित का भी ध्यान रखें, तभी सही मायनों में यह मानवता की विजय का पर्व होगा।
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भगवान राम प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला


अब यह जो राम का व्यक्तित्व है, वह अपने आप में अनूठा है। शायद इसलिए राम विश्व के अवतारों में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध और लोकप्रिय हैं, क्योंकि अगर राम का जीवन देखें, तो शायद ही हमारे पुराणों में कोई दूसरा ऐसा व्यक्तित्व हो, जो आजीवन इतना ज्यादा दुखी रहा हो। एक ओर तो राम लोकनायक हैं, रामराज्य के स्थापक हैं और दूसरी ओर वह आजीवन दुखी हैं। वाल्मीकि रामायण में प्रभु राम कहते हैं वाल्मीकि से, मेरी तरह इतना दुखी व्यक्ति वसुंधरा पर कोई नहीं है। यानी जब राज्य मिलने वाला था, तो राज्य नहीं मिला, वनवास मिल गया; वनवास में गए, तो पत्नी का अपहरण कर लिया गया और जब रावण से लड़ने के लिए गए, तो लगभग हारने के कगार पर पहुंच गए थे। आप तुलसी के राम को छोड़कर वाल्मीकि के राम और निराला (राम की शक्ति पूजा) के राम को देखें-'धिक जीवन को जो पाता ही आया विरोध/धिक साधन, जिसके लिए सदा ही किया शोध!/जानकी! हाय, उद्धार प्रिया का न हो सका।'  यहां हमें राम आशंकित दिखते हैं कि मैं कुछ कर नहीं पाऊंगा।


मिथकों की एक विशेषता यह होती है कि वे कहने को तो काल्पनिक होते हैं, लेकिन वे जीवन के सत्य का सार होते हैं। राम की शक्तिपूजा में निराला ने राम को स्वतंत्रता आंदोलन का नायक बना दिया, या यों कहें कि ब्रिटिश साम्राज्य से लड़ने वाला योद्धा बना दिया। इस कविता में कहा गया है कि अन्याय जिधर है उधर शक्ति यानी दैवी शक्ति अन्यायी (ब्रिटिश राज) के पास है। कहने का तात्पर्य यह है कि राम का मिथक ऐसा है, जो आज भी प्रासंगिक है। वह लोकनायक हैं और वह हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के नायक के प्रतीक बनकर भी आते हैं। उनका दुख आगे भी जारी रहता है। राम जब रावण वध करके अयोध्या लौटते हैं और गद्दी पर विराजते हैं, तो उन्हें सीता को वनवास देना पड़ता है। इस तरीके से एक बड़ी विचित्र बात यह है कि सीता और राम जीवन में ज्यादा देर तक साथ रह ही नहीं पाते। मेरे गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते थे, वाल्मीकि रामायण में क्रौंचवध की जो कथा है, वह रामकथा का वस्तु-निर्देश (पहले से ही घटित होने वाले घटनाक्रम का संकेत) है। जिस तरह से क्रौंच पक्षी के जोड़े का मिलन नहीं हो पाता है, उसी तरह से राम और सीता भी जैसे ही साथ रहने की सोचते हैं, तो किसी न किसी वजह से उन्हें अलग होना पड़ता है।


विजयदशमी का पर्व हमें बताता है कि भले ही राम का जीवन दुखी रहा हो, लेकिन उनके जीवन से जो हमें नैतिक संदेश मिलता है, वह मनुष्यता की विजय का है। इसलिए विजयदशमी मानवता की विजय का पर्व भी है। इसे दशहरा इसलिए कहा जाता है कि दशमुख रावण, जो अनैतिकता का प्रतीक है, नैतिकता के प्रतीक राम के हाथों मारा जाता है। मिथक अथवा पर्व-त्योहार का महत्व हमारे जीवन में इसलिए होता है कि हर युग में वह हमें अपने संकट से उबरने का एक संदेश देता है। तो आज विजयदशमी हमें कौन-सा संदेश देती है?


आज मानवता के सामने सबसे बड़ा संकट है कि मनुष्य अपने-आप में सिमट गया है, आत्मकेंद्रित हो गया है, मानो मनुष्य का मनुष्य से कोई संबंध ही नहीं रह गया है। इसके अलावा, आज मानवीय और सामाजिक मूल्यों का बहुत ज्यादा क्षरण हो गया है। मैं इस त्योहार के अवसर पर इसे राजनीति से परे रखना चाहता हूं, लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं, जिनके माध्यम से मैं अपनी बात स्पष्ट करना चाहता हूं। हाल के इतिहास में हमने देखा है कि जब दो देशों या दो पक्षों के बीच में संघर्ष या टकराव होता था, उनके बीच में सुलह-समझौते की गुंजाइश होती थी। इस समय इस्राइल गाजा पर लगातार हमले कर रहा है, लेकिन कोई उसे रोकने वाला नहीं है, चाहे रूस के पुतिन हों, या अमेरिका के जो बाइडन हों। इस्राइल को अमेरिका समर्थन दे रहा है, तो रूस यूक्रेन को तबाह कर रहा है। समझौते का कोई उपाय नहीं दिखता और इसका  खामियाजा पूरी मानवता को भुगतना पड़ रहा है। सब अपने-अपने फायदे देख रहे हैं। इस तरह से व्यक्ति से लेकर महाशक्तियां तक आत्मकेंद्रित हो गई हैं।


जिस तरह से व्यक्ति परिवार और समाज की चिंता छोड़कर केवल अपनी चिंता करता है, अपना सुख देखता है, उसी तरह से वे राजनीतिक शक्तियां भी, जिनका कर्तव्य है सामाजिक चिंता करना, अपने ही हित को देखती हैं और मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों की परवाह नहीं करतीं। सामाजिक मूल्यों की, मानवता की, पर्यावरण संरक्षण की किसी को कोई चिंता नहीं है और यह हमारे समय का सबसे बड़ा संकट है।


इस महान संकट की घड़ी में विजयदशमी का त्योहार हमें मानवता की विजय का संदेश देता है और मानवता की विजय का मतलब है सामाजिक चित्त की विजय। विजयदशमी का त्योहार रावण पर राम की विजय का संदेश देता है। विजयदशमी का त्योहार शक्ति के शिवत्व से जुड़कर मानव कल्याण का संदेश देता है। उसी तरह से आज की जो राजनीति है, वह शांति का आह्वान कर इस संकट पर विजय प्राप्त कर सकती है। विजयदशमी का यह त्योहार हमें प्रेरणा देता है कि हम सिर्फ अपनी चिंता न करें, बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थ और फायदों से ऊपर उठकर मानव कल्याण के लिए कार्य करें तथा दूसरों के हित का भी ध्यान रखें, तभी सही मायनों में यह मानवता की विजय का पर्व होगा।

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