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बराबरी की साझेदार

निर्मला सीतारमण Updated Wed, 07 Mar 2018 07:24 PM IST
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महिला सशक्तिकरण

प्रायः हर बच्ची को अपने मां-बाप को इस बात का जवाब देना पड़ता है कि वह कहां जा रही है और कब लौटेगी, लेकिन क्या कभी किसी बेटे से यह पूछा जाता है कि वह कहां जा रहा है, कब लौटेगा और कौन-कौन उसके दोस्त हैं? यदि कहीं से अपराध की खबर आती भी है, तो अपराधी किसी का बेटा ही होता है।



वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में अभूतपूर्व एवं ऐतिहासिक जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से दिए अपने पहले उद्बोधन में भारतीय समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता के इस मिथक को तोड़ा। प्रधानमंत्री का मकसद देशवासियों के लिए यह संदेश देना था कि महिलाओं की सुरक्षा का भार स्वयं महिलाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सारे देश की यह जिम्मेदारी है। वे करोड़ों लोग, जो सोशल मीडिया पर ऐसे विषयों पर बहस से भागते रहते थे, सामाजिक सरोकार के इस मुद्दे पर वे एकजुट हुए और प्रधानमंत्री के आह्वान पर इस विषय के समाधान के लिए खुलकर सामने आने लगे। प्रधानमंत्री का यह आह्वान एक तरह से देश में महिलाओं के सशक्तिकरण और उनके प्रति न्याय की जरूरत को रेखांकित करता है और यह भी कि सशक्तिकरण बिना किसी बंधन और लैंगिक भेदभाव के होना चाहिए। परिस्थितियों की आलोचना करने के बजाय महिलाओं को इन स्थितियों से निपटने में सक्षम बनाने की जरूरत है, जिस पर प्रधानमंत्री मोदी ने बखूबी ध्यान दिया है।

    

विगत चार वर्षों के कार्यकाल में, केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए महिला सशक्तिकरण को सबल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किया है। इस प्रक्रिया ने महिलाओं को नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित किया, उनके नेतृत्व को स्वीकृति मिलनी शुरू हुई, लैंगिक न्याय की यथास्थिति में परिवर्तन लाया गया, महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के अवसर सृजित किए गए और असमानता दूर करने की नीतियों का कार्यान्वयन किया गया।


महिला सशक्तिकरण से आशय है, उन्हें बेहतर अवसर उपलब्ध कराना, जिससे पुराने अवरोधों/मान्यताओं को तोड़ा जा सके। जनधन योजना के तहत 16 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को देश की बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा गया है। इतने बड़े पैमाने पर वित्तीय समावेशन से महिलाएं अब उज्ज्वला योजना और स्वच्छ भारत मिशन समेत केंद्र सरकार की कई योजनाओं के लिए प्रत्यक्ष नगदी हस्तांतरण के जरिये लाभावन्वित हो रही हैं। आज, महिलाएं न्यू इंडिया की कहानियां गढ़ रही हैं, जहां 7.88 करोड़ से अधिक महिलाएं मुद्रा योजना के तहत रोजगार सर्जक के रूप में उभरी हैं।  हरियाणा में बेटी बचाओ कार्यक्रम के शुभारंभ के अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा था कि एक देश के रूप में हम पीछे रह गए हैं, क्योंकि हम बच्चियों को जन्म तक नहीं लेने देते। आज हरियाणा के सर्वाधिक प्रभावित जिलों सहित कुल 104 जिलों के लिंगानुपात में सुधार हुआ है। सुकन्या समृद्धि योजना इस धारणा को बदलने में कामयाब रही है कि लड़कियां परिवार में आर्थिक असुरक्षा पैदा करती हैं। इस योजना के तहत माता-पिता अपनी बच्चियों की ऊंची शिक्षा अथवा शादी के लिए उच्चतम ब्याज दरों पर अपनी रकम सुरक्षित रख सकते हैं। लैंगिक समानता लाने की दिशा में सतत परिवर्तन बाहर से समाधान आयात करने के बजाय स्थानीय बाधाओं को समझने और उन्हें हल करने में निहित है।


महिलाओं के प्रति सामाजिक अपराधों के लिए उचित न्याय के बिना महिलाओं का सशक्तिकरण संभव नहीं है। यद्यपि मुस्लिम महिलाओं के उत्पीड़न जैसी समस्याओं के उन्मूलन के लिए अतीत में कई अवसर आए हैं, शाह बानो केस ऐसा ही एक उदाहरण है, जो यह दिखाता है कि किस तरह सामाजिक समस्याओं के समाधान के बजाय वोट बैंक की राजनीति हावी हुई। 2017 में तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाने वाला सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह जीत वास्तव में इस देश की हजारों मुस्लिम महिलाओं की है और वर्तमान केंद्र सरकार उनकी न्याय और गरिमा के लिए उनके संघर्ष में उनके साथ खड़ी हुई है। सरकार तीन तलाक को अपराध करार देने वाला बिल लेकर सदन में आई, लेकिन जैसा कि अपेक्षित था, राजनीतिक कारणों से विपक्ष ने संसद में इस महत्वपूर्ण विधेयक को गिरा दिया। ट्रांसजेंडरों का सम्मान करने की प्राचीन भारतीय संस्कृति के आलोक में सरकार ट्रांसजेंडर पर्सन राइट्स बिल (2016) लेकर आई है। यह विधेयक समुदाय के प्रति उदासीनता को खत्म करने, हठधर्मिता को चुनौती देने और शिक्षा, रोजगार एवं स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच में ट्रांसजेंडर्स के साथ भेदभाव को खत्म करने के उद्देश्य से लाया गया है।


यह सरकार महिलाओं की उड़ान और उनके भविष्य को परवाज देने के लिए समर्पित है, जिससे उन्हें देश की विकासगाथा रूपी माला में अनन्य भाव से पिरोया जा सके। वास्तव में विकास तब तक संभव ही नहीं है, जब तक महिलाएं देश की विकास की प्रक्रिया में बराबर की साझेदार नहीं हैं। आज महिलाएं रक्षा और विदेशी मामलों के मंत्रालयों का नेतृत्व कर रही हैं, जो समाज में यह स्वीकृति ला रही है कि लैंगिक असमानता कभी भी क्षमताओं को सीमित नहीं कर सकती है। आज महिलाओं को खाना बनाने हेतु अंगीठी जलाने के लिए लकड़ियां लाने की जरूरत नहीं है, अपने फेफड़ों को गलाने की जरूरत नहीं है। आज महिलाएं गांवों में स्वच्छ भारत अभियान का प्रतिनिधित्व कर रही हैं, क्योंकि उन्हें ही खुले में शौच के अपमान से हर दिन दो-चार होना पड़ता था। आज महिलाएं न केवल अपने परिवारों का प्रबंधन कर रही हैं, बल्कि वे अपना उद्यम भी शुरू कर रही हैं और न्यू इंडिया की परिकल्पना को भी परिभाषित कर रही हैं। मातृत्व लाभ अधिनियम के कारण आज महिलाओं को मातृत्व और आर्थिक सुरक्षा के बीच चुनाव की कोई असहज भावना नहीं रह गई है।


मातृत्व मृत्यु दर में गिरावट, लिंगानुपात में सुधार, महिलाओं के लिए धुआं-मुक्त किचन, लड़कियों के लिए स्कूल प्रांगण में ही शौचालय, एक महिला द्वारा एक छोटी दुकान की शुरुआत – ये सभी महिला सशक्तिकरण की नई कहानी है जो 'न्यू इंडिया' की परिकल्पना को साकार कर रही है।

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