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पर्यावरण : भागीरथी की संवेदनशीलता की अनदेखी, एक और त्रासदी के रूप में हमारे सामने

सुरेश भाई
Updated Thu, 07 Aug 2025 06:46 AM IST

सार

भागीरथी में बाढ़ और भूस्खलन का बहुत पुराना इतिहास है। वैज्ञानिक भी इस क्षेत्र को संवेदनशील मानते हैं, फिर भी अंधाधुंध तरीके से बस्तियां बसाई जा रही हैं।  
 
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गंगोत्री में भागीरथी का जलस्तर बढ़ा - फोटो : अमर उजाला


1750 में भी यहां पर 14 किमी लंबी झील बनी थी, जिसमें तीन गांवों का अस्तित्व मिट गया था। 6 अगस्त, 1978 को डबराणी स्थित कनोडिया गाड़ में बाढ़ से भागीरथी में बड़ी झील बनी थी। उस समय उत्तरकाशी शहर को खाली करवाना पड़ा था। तब बाढ़ से नुकसान इसलिए भी कम होता था कि नदी के किनारे लोगों ने अपने घर नहीं बनाए थे। नदी के बहाव को भी नहीं रोका गया था। अब बाढ़ से सबसे अधिक नुकसान नदियों के निकट बनी बस्तियों को हो रहा है।


2017-18 में भी खीरगंगा का जलस्तर बढ़ने से धराली गांव के घरों में मलबा जमा हो गया था। 2023 में भूस्खलन से कई दिनों तक गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग बंद रहा था। 2010-11 और 2012-13 में भी भागीरथी और इसकी सहायक अस्सीगंगा में बाढ़ आई, जिसमें दर्जनों लोगों की जान चली गई थी। धराली के पीछे की खड़ी पहाड़ी से आ रही खीरगंगा की जानलेवा आपदा को वर्ष 2021 में गौरादेवी के रैणी के बगल से बह रही है ऋषि गंगा की आपदा से भी जोड़ा जा रहा है, जहां ग्लेशियर झील टूटने से भीषण बाढ़ आई थी, तब वहां 203 लोगों की मौत हुई थी। खीर गंगा भी 12 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित श्रीकंठ पर्वत के ग्लेशियर से आती है, जिसमें  डेढ़ बजे दिन में आए सैलाब ने धराली गांव के होटल और बस्ती को मलबे में तब्दील कर दिया था। भागीरथी की इस सहायक नदी में आई बाढ़ के बारे में कहा जा रहा है कि यदि यहां बादल फटता, तो जल सैलाब के बाद घंटों तक पानी बहता रहता, लेकिन उसने तुरंत ही महाविनाश की जो स्थिति पैदा की उसके बाद बाढ़ जैसी स्थिति निरंतर नहीं बनी। वैज्ञानिक शोध के अनुसार, धराली के ऊपर पहाड़ी से ग्लेशियर के रूप में एकत्रित मलबे के खिसकने के रूप में भी माना जा रहा है।


 इन सबके बावजूद भी कोई सबक नहीं लिया गया। यहां पर अंधाधुंध पर्यटन के नाम पर जो दर्जनों बस्तियां खड़ी हुई हैं। वे सभी भागीरथी में मिलने वाले दर्जनों ग्लेशियर के गाड़ गदेरों के निकट ही बसी हैं। यहां बेतरतीब निर्माण कार्य जैसे बहुमंजिला इमारतें, बड़े पैमाने पर वनों का विनाश, निर्माण के लिए बड़ी-बड़ी जेसीबी और पोकलैंड मशीनों के उपयोग ने हिमालय की रीढ़ को हिलाकर कमजोर कर दिया है। गंगोत्री में भी सुरक्षा के नाम पर इसी तरह की स्थिति है। बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर कंचन नाला, पागल नाला, पापड़ी धार, पीपलकोटी आदि संवेदनशील जोन बने हुए हैं। बदरीनाथ मास्टर प्लान का भी लोगों ने विरोध किया है। हेलंग-उर्गम मोटर मार्ग बार-बार बंद होता रहता है। ज्योर्तिमठ के पास निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजना के चारों तरफ भूस्खलन हो रहा है। यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर भी भारी जनधन की हानि जून के महीने में हो चुकी है।


उत्तराखंड के लिए भी सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय महत्व रखता है, जिसमें हिमाचल प्रदेश की पारिस्थितिकी असंतुलन पर चिंता जताते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि हालात नहीं बदले, तो हिमाचल विलुप्त हो सकता है। पर्यावरण और पारिस्थितिकी की कीमत पर राजस्व नहीं कमाया जा सकता है। प्रदेश में चल रही गतिविधियों से प्रकृति नाराज है। आपदा से संबंधित अधिकतर घटनाओं के लिए इन्सान जिम्मेदार हैं। 28 जुलाई, 2025 को सुप्रीम कोर्ट में हुई इस सुनवाई के दौरान कहा गया कि हिमाचल में विनाश का सबसे बड़ा कारण जल विद्युत परियोजनाएं, चार लेन सड़कें, वनों की कटाई, बहुमंजिला इमारतें, अनियंत्रित पर्यटन हैं। इसके लिए सरकार को कहा गया की भू वैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों से सलाह के बाद ही कोई कार्य किया जाना चाहिए।


मानसून का प्रभाव उत्तराखंड व हिमाचल पर अधिक है। केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर भी सोनप्रयाग के पास अगस्त के प्रथम सप्ताह में लगभग 150 मीटर लंबा मार्ग पूरी तरह ध्वस्त हो गया, जिसके बाद छह किमी जंगल से पैदल जाना पड़ रहा है। केदारनाथ जाने वाले यात्रियों को कुल 22 किमी पैदल चलना पड़ रहा है। इसके बावजूद भी भारी बारिश के चलते मोटर मार्ग को खोलने का प्रयास भी बार-बार किया जाता है। पांच अगस्त तक हिमाचल में 193 लोग बाढ़ में जान गंवा चुके हैं। लगभग 1,500 करोड़ रुपये का नुकसान बताया गया है। उत्तराखंड में भी लगभग 70 से अधिक लोग बाढ़ और भूस्खलन में अपनी जान गंवा चुके हैं। लोग पूछ रहे हैं कि इस तरह की जानलेवा आपदाओं से कब सबक लेंगे? क्या सरकार समाज के साथ मिलकर हिमालय के विकास के लिए कोई अलग से विचार करेंगी?

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