देश में कौशल विकास की तमाम पहलों के बीच नीति आयोग की रिपोर्ट का यह खुलासा कि देश में 90 फीसदी से अधिक स्नातक ऐसी नौकरियों में हैं, जो उनकी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप नहीं हैं, चिंताजनक तो खैर है ही, शिक्षा व रोजगार के बीच गहराते असंतुलन का भी प्रमाण है। यह दुर्भाग्य ही है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था अब भी डिग्री हासिल करने को सफलता का पर्याय मानती है, जबकि वर्तमान रोजगार बाजार अब व्यावहारिक दक्षता, तकनीकी ज्ञान, संचार क्षमता, समस्या समाधान और अनुभव की मांग करता है।
नीति आयोग ने इस विरोधाभास की एक बड़ी वजह पाठ्यक्रम को माना है, जो ज्यादातर संस्थानों में काफी पुराने हैं और इंडस्ट्री की जरूरतों के हिसाब से नहीं हैं। नतीजतन, ऐसी डिग्रियां, डिप्लोमा और प्रमाण-पत्र मिलते हैं, जिनसे अक्सर सीधे नौकरी नहीं मिलती।
अगर कोई युवा तीन या चार वर्ष किसी विषय को पढ़ने में लगाता है, पर डिग्री हासिल करने के बाद उसे ऐसा काम करना पड़ता है, जिसका उसकी पढ़ाई से कोई सीधा संबंध नहीं है, तो इसे शिक्षा व्यवस्था, कौशल प्रशिक्षण और अर्थव्यवस्था, तीनों के बीच तालमेल की कमी का नतीजा ही समझा जाना चाहिए।
रिपोर्ट यह भी कहती है कि देश में सभी ग्रेजुएट लोगों में बेरोजगारी दर 13 फीसदी और ग्रेजुएट महिलाओं में 20.4 फीसदी है, जो देश की औसत बेरोजगारी दर से कहीं अधिक है। यानी, उच्च शिक्षा हासिल करना अब बेहतर रोजगार की गारंटी नहीं रह गया है। कई मामलों में तो यह अपेक्षाओं और वास्तविक अवसरों के बीच की दूरी को और बढ़ा रहा है।
दरअसल, देश में विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ाई का बड़ा हिस्सा कक्षा व परीक्षा तक ही सीमित रहता है। छात्रों को वास्तविक कार्यस्थल, अप्रेंटिसशिप, परियोजना-आधारित शिक्षा तथा उद्योग विशेषज्ञों से सीखने के पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाते हैं। यहां समझना जरूरी है कि सामान्य डिग्रियां अपने आप में निरर्थक नहीं हैं। अगर बीए करने वाला विद्यार्थी डाटा विश्लेषण, डिजिटल संचार, शोध, वित्तीय साक्षरता या किसी अन्य रोजगारोन्मुख कौशल से भी परिचित हो, तो उसकी संभावनाएं कई गुना बढ़ सकती हैं।
लिहाजा, समाधान डिग्रियों को बदलती हुई अर्थव्यवस्था से जोड़ने में हो सकता है। भारत दुनिया की सबसे युवा आबादियों में से एक है। पर, यह जनसांख्यिकीय लाभ तभी आर्थिक शक्ति में बदलेगा, जब युवाओं की शिक्षा उनकी आजीविका से जुड़ेगी। ऐसे में, नीति आयोग की रिपोर्ट एक आईना है। कितने युवाओं को डिग्री मिली के बजाय उन डिग्रियों ने कितने युवाओं को सम्मानजनक आजीविका तक पहुंचाया, विकास की यही कसौटी होनी चाहिए।