पाकिस्तान के सैनिकों ने भारतीय सीमा में घुसकर कृष्णा घाटी में दो सैनिकों को मारने और एक सैनिक का सिर काटकर ले जाने की जिस दुस्साहसिक कार्रवाई को अंजाम दिया है, उसे लेकर पूरे देश में गुस्से का माहौल है। ध्यान देने वाली बात यह है कि दोनों देशों के बीच पिछले 12 महीनों में लाइन ऑफ कंट्रोल पर मुठभेड़ की यह 70वीं घटना है और पिछले 48 घंटों में संघर्षविराम के उल्लंघन की यह दूसरी घटना है। दरअसल परवेज मुशर्रफ के राष्ट्रपति काल में दोनों देशों के बीच संघर्षविराम लागू करने के पीछे कोशिश यह थी कि कश्मीर मुद्दे पर दोनों ही देश संयत मुद्रा में आ सकें।
इसके अलावा सीमा पर लोगों की आवाजाही आसान बनाने और संयुक्त प्रशासन व्यवस्था लागू करने के जो विचार लाए गए, वे कागज पर ही शोभा देते थे। सच्चाई तो यह है कि संघर्षविराम लाइन (एलओसी) पर भी दोनों देशों के सैनिकों के बीच कभी सौ फीसदी अमन जैसे हालात पैदा नहीं हो पाए। संघर्षविराम के दौरान बेशक भारी हथियारों का इस्तेमाल नहीं होता, लेकिन दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर गोलीबारी तो करते ही रहते हैं। स्पष्ट है कि इस संघर्षविराम के होने या न होने का कुछ खास फर्क नहीं पड़ा है।
पाकिस्तान के सैनिकों ने जिस इलाके में इस दुर्दांत घटना को अंजाम दिया है, वह सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। इतिहास बताता है कि ऐसी घटनाएं यहां के लिए नई नहीं हैं। दरअसल इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति पाकिस्तान के अनुकूल है। उसके लिए ऊंची पहाड़ियों से नीचे बसी भारतीय चौकियों पर हमला करना बेहद आसान हो जाता है।
गौरतलब है कि नियंत्रण रेखा सैनिक सीमा है। वहां दोनों ही तरफ के सैनिक बेहद तनाव में रहते हैं, जिसकी परिणति ऐसी घटनाओं में दिखती है। भारतीय सैनिकों के साथ हुई बर्बर कार्रवाई को अंजाम देने का काम पाकिस्तान बॉर्डर ऐक्शन टीम ने किया है। सेना की हर टुकड़ी में कुछ खूंखार कमांडो किस्म के सैनिक होते हैं। दोनों ही देशों में ऐसे सैनिकों को मिलाकर स्पेशल फोर्सेज बनाई जाती हैं। वरिष्ठ अधिकारी इनका इस्तेमाल ऐसी हिंसक कार्रवाइयों में करते हैं। इन टुकड़ियों को ही अलग-अलग नाम दे दिए जाते हैं।
जब भी ऐसी कोई घटना होती है, तो दोनों देशों के आपसी संबंधों की बात होने लगती है। पाकिस्तान में एक ऐसा वर्ग है, जो भारत के साथ अच्छे रिश्ते में अपना भविष्य तलाश रहा है। लेकिन जब दोनों देशों के सैनिकों के बीच लगातार गोलाबारी चल रही हो, तो फिर क्रिकेट या बॉलीवुड के जरिये संपर्क बढ़ाने की कोशिशों का क्या औचित्य है? जिस तरह से वैश्विक हालात बदल रहे हैं, उनसे साफ है कि विश्व के ज्यादातर देश पाकिस्तान से त्रस्त हैं।
लेकिन भारत सरकार की नीति ऐसी घटनाओं पर ध्यान न देते हुए संबंधों को सामान्य बनाने की रही है। आखिर 26/11 के बाद भी तो दोनों देशों के बीच संबंधों को बढ़ाने की कोशिशें की गईं। हमारी सरकार को यह समझने की जरूरत है कि आधे-अधूरे मन से रिश्तों में प्रगाढ़ता नहीं आती। जब पाकिस्तान के साथ संबंधों की बात आती है, तो सरकार का रुख तो ऐसा होता है, मानो उसे शांति के नोबल पुरस्कार की चाह हो। समय की यह मांग है कि पाकिस्तान के साथ नरमी बरतने के बजाय उसके साथ तमाम रिश्ते तोड़ लेने पर विचार किया जाए। इससे पाकिस्तान पर दबाव बनेगा।
जब पाकिस्तान को एहसास होगा कि वैश्विक समुदाय में वह अछूत बनता जा रहा है, तभी उसका दिमाग ठिकाने आएगा। अब समय आ गया है कि भारत अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए कमर कस ले। हमें यह समझना होगा कि बचाव की सबसे प्रभावी रणनीति आक्रमण की होती है। यह इसलिए भी जरूरी है कि कोई भी देश भारत के धैर्य को उसकी कमजोरी न समझ ले। पाकिस्तान के दिमाग में भारत का डर होना आवश्यक है। सीमा पर तैनात सैनिकों को भी चौकन्ना रहना होगा, क्योंकि जरा-सी ढील के नतीजे बेहद गंभीर हो सकते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तानी फौज की भूमिका केंद्रीय रही है। समय के साथ यह साफ हो चला है कि पाकिस्तानी फौज दो चेहरे रखती है। एक ओर तो वह आंतरिक आतंकवाद को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा बताती है, तो दूसरी तरफ आतंकियों के साथ साठगांठ भी रखती है। पाक फौज इन आतंकियों का इस्तेमाल ऐसी ही कार्रवाइयों को अंजाम देने के लिए करती है। अगर पाकिस्तानी सेना के संदर्भ में ऐसी हिंसक कार्रवाइयों का विश्लेषण किया जाए, तो कुछ निष्कर्ष उभरते हैं। एक तो यही कि वहां के सैनिक कमांडरों की सोच में कश्मीर ही प्रमुख मुद्दा है।
जब भी दोनों देशों का ध्यान इस मुद्दे से हटकर अन्य बातों की ओर जाता है, तब कश्मीर मुद्दे को केंद्र में लाने के लिए ऐसे हमले किए जाते हैं। दूसरे, पाकिस्तान जानता है कि अगर इसी गति से भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ता गया, तो जल्द ही वह समय आएगा, जब वह पाकिस्तान को तवज्जो देना बंद कर देगा। इसीलिए वह लगातार ऐसे हमले कर भारत के विकास को बाधित करने की नापाक कोशिश करता रहता है।
जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तब मन में स्वाभाविक ही यह सवाल उठता है कि क्या दोनों देशों के बीच की यह कड़वाहट कभी खत्म हो पाएगी। वस्तुतः दिल्ली, श्रीनगर और इस्लामाबाद में ऐसे दूरदर्शी नेताओं की जरूरत है, जिन्हें चुनाव में हार का डर न हो। दिक्कत यह है कि दोनों देशों के राजनीतिक क्षितिज में नेहरू, शेख अब्दुल्ला, अयूब खां और इंदिरा गांधी के बाद ऐसे नेताओं का नितांत अभाव है। इसके अलावा जब दोनों ही देशों में उन लोगों का अस्तित्व खत्म हो चुका होगा, जिनके दिल-ओ-दिमाग में विभाजन की यादें बसी हुई हैं, तब नई पीढ़ी व्यवहारिक निर्णय लेने से नहीं हिचकेगी, क्योंकि राजनीति में भावुक निर्णयों की कोई जगह नहीं होती।