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कूटनीति: पाकिस्तान और तालिबान की दुश्मनी, भारत को चतुराई के साथ उठाना चाहिए इसका फायदा

केएस तोमर
Updated Sat, 04 Jan 2025 07:21 AM IST

सार

पाकिस्तान के हवाई हमले के जवाब में तालिबान की जवाबी कार्रवाई से दोनों देशों के बीच कटुता बढ़ी है। ऐसे में पाकिस्तान में तालिबान के समर्थन से चलने वाले आतंकी गुट कमजोर पड़ेंगे, जिनका वह भारत के खिलाफ इस्तेमाल करता रहा है। भारत को चतुराई के साथ इस स्थिति का फायदा उठाना चाहिए।
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पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर कहां-कहां तालिबान। - फोटो : अमर उजाला


इस क्षेत्रीय अस्थिरता से रूस की चिंता भी बढ़ी है, जो उसके रणनीतिक हितों को प्रभावित कर रही है। मध्य एशिया मास्को के लिए महत्वपूर्ण बफर जोन है, जो चरमपंथ के प्रसार के लिए संवेदनशील है। यदि पाकिस्तान आतंकवाद को नियंत्रित करने में विफल रहता है, तो इससे उसका रूस के साथ रक्षा सहयोग खतरे में पड़ सकता है। मास्को अस्थिर अफगानिस्तान और पाकिस्तान गठजोड़ को भी क्षेत्र में अमेरिका की घटती भागीदारी के बीच प्रभाव हासिल करने के अपने लक्ष्यों के लिए हानिकारक मानता है। इस अस्थिर स्थिति में सुरक्षा संकट को रोकने के लिए समन्वित प्रयासों की जरूरत है।


संबंधित घटनाक्रम में, पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान पर किए गए हवाई हमले में हुई 46 लोगों की मौत से 2025 में भू-राजनैतिक गतिशीलता बदल सकती है, इसका दक्षिण एशिया की नीतियों पर भी असर पड़ेगा, क्योंकि इससे तालिबान शासन से खुले टकराव की स्थिति पैदा होगी, जिसने क्रूर जवाबी कार्रवाई की। विडंबना यह है कि पाकिस्तान, जिसे आतंकी समूहों का प्रशिक्षक और संरक्षक माना जाता है, अब अपनी ही सीमाओं के भीतरी आतंकवाद का खामियाजा भुगत रहा है और तेजी से अफगानिस्तान के साथ तनावपूर्ण संबंधों की ओर बढ़ रहा है।


पाकिस्तान दशकों से कश्मीर घाटी में आतंकी नेटवर्क के जरिये छद्म युद्ध जारी रखे हुए है और अब उसने यही खेल तालिबान के साथ खेलना शुरू कर दिया है, जो उसे भविष्य में काफी महंगा पड़ेगा। दोहा समझौता अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी को सुगम बनाने के लिए किया गया था, ताकि अफगान सरकार और तालिबान के बीच शांति वार्ता के लिए माहौल बनाया जा सके। लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के तत्कालीन आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फैज अहमद की काबुल के एक होटल में जश्न मनाने की तस्वीर वायरल हुई थी, क्योंकि उन्होंने इस वार्ता में पाकिस्तान की मध्यस्थता को जीत के रूप में दर्शाया था। पाकिस्तान ने दुनिया को यह दिखाने की कोशिश की कि भारत को इस बातचीत से बाहर रखा गया और अफगानिस्तान भविष्य में उसका सबसे करीबी सहयोगी होगा। लेकिन तालिबान भारत के साथ नजदीकी बढ़ा रहा है। हाल ही में तालिबान शासन ने भारत में अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया है, जो अफगानिस्तान पर अधिकार जमाने के बाद कूटनीतिक नजरिये से यह प्रयास उसका महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य भारत के हितों के साथ जुड़ना और दोनों देशों के बीच संचार को बढ़ावा देना है।


पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान के नागरिकों पर हमले ने सब कुछ बिगाड़ दिया, जिसके जवाब में तालिबान ने सबसे आक्रामक तरीके से पलटवार किया और दोनों मुल्कों के बीच तनाव और भी बढ़ गया है। दोनों पक्ष एक दूसरे पर क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करने का आरोप लगा रहे हैं। तालिबान, अपने घरेलू एकीकरण से उत्साहित होकर, पाकिस्तान के प्रभाव का विरोध कर रहा है, जो उनकी पिछली निर्भरता से बदलाव का संकेत है। वहीं, टीटीपी स्थानीय आबादी के बीच सहानुभूति पाने और विदेशी आक्रमण के खिलाफ खुद को रक्षक के रूप में पेश कर हमलों का लाभ उठा सकता है। दोनों पक्षों की ओर से हो रहे हवाई हमलों से हिंसा का चक्र और गहरा सकता है। टीटीपी के ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई करने की अफगानिस्तान की अनिच्छा से पाकिस्तान के साथ उसके संबंध खराब हो सकते हैं और शांति प्रयासों में जटिलता आ सकती है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान की कार्रवाइयों को बढ़ती हिंसा के रूप में देख सकता है, संयम बरतने का आग्रह करते हुए तालिबान पर टीटीपी की गतिविधियों को कम करने का दबाव भी डाल सकता है।


रिपोर्टों के अनुसार, अफगान तालिबान टीटीपी लड़ाकों को सुरक्षित पनाहगाह मुहैया करा रहा है, जिससे सीमा पार हमलों को बढ़ावा मिल रहा है। इससे पाकिस्तान की सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है और उसे आक्रामक कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच विवादित सीमा डूरंड रेखा झड़पों का केंद्र रही है। पाकिस्तान हवाई हमलों को अपने सैन्य संसाधनों के साथ आतंकवादी समूहों द्वारा घुसपैठ के खिलाफ अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के साधन के रूप में देखता है। हवाई हमले जमीनी युद्ध के मुकाबले तेज और ज्यादा असरदार विकल्प हैं।


तालिबान और पाकिस्तान के बीच बढ़ती दुश्मनी कई मायनों में भारत के लिए सकारात्मक हो सकती है, खासकर क्षेत्रीय स्थिरता, रणनीतिक लाभ और अफगानिस्तान में पाकिस्तान के प्रभाव का मुकाबला करने के मामले में। पाकिस्तान ने ऐतिहासिक रूप से अफगानिस्तान को एक ‘रणनीतिक पिछवाड़े’ के रूप में देखा है और भारत की उपस्थिति का मुकाबला करने के लिए तालिबान का समर्थन किया है। तालिबान के साथ बढ़ती दुश्मनी पाकिस्तान को अपने संसाधनों और ध्यान को अपनी पश्चिमी सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों पर केंद्रित करने के लिए मजबूर कर सकती है, जिससे वह भारत के खिलाफ कम खुराफात कर पाएगा।
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इसके अलावा, तालिबान से बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान के हक्कानी नेटवर्क और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी गुटों के लिए तालिबान का समर्थन कम हो सकता है, जिनका इस्तेमाल पाकिस्तान अक्सर भारत के खिलाफ करता है। वहीं, तालिबान शासन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को अपना समर्थन जारी रख सकता है, जिससे पाकिस्तान की घरेलू चुनौतियां बढ़ जाएंगी। नतीजतन पाकिस्तान की भारत के खिलाफ आतंकवाद प्रायोजित करने की क्षमता भी कम होगी। पाकिस्तान और तालिबान की दुश्मनी का भारत बड़ी चतुराई के साथ फायदा उठा सकता है। लेकिन भारत को इसका लाभ उठाने के लिए फूंक-फूंककर कदम रखना होगा, क्योंकि तालिबान चरमपंथ का पोषक है। इसलिए भारत को अपने हित को देखते हुए प्रभावी कूटनीति, रणनीतिक धैर्य और अफगानिस्तान के साथ लक्षित जुड़ाव बढ़ाकर ज्यादा से ज्यादा लाभ उठाना चाहिए।   

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