वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 60.02 लाख मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था। यानी भाजपा को कुल जितने वोट मिले थे, उसका 3.49 फीसदी या कांग्रेस को कुल जितने वोट मिले थे, उसका 5.61 फीसदी। इनमें से 5.92 लाख से ज्यादा मतदाता उत्तर प्रदेश से थे। राष्ट्रीय चार्ट में जहां नीलगिरी 46,559 वोटों के साथ शीर्ष पर है, तो रॉबर्ट्सगंज 18,489 वोटों के साथ उत्तर प्रदेश के चार्ट में शीर्ष पर है।
2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 7.5 लाख से ज्यादा लोगों ने नोटा का बटन दबाया, जो बहुमत पाने वाली पार्टी भाजपा को मिले कुल वोट का 2.2 फीसदी है, बसपा के वोटों का 3.9 फीसदी, सपा के वोटों का चार फीसदी, कांग्रेस के वोटों का 13 फीसदी और निर्दलीय उम्मीदवारों को मिले वोटों का 33 फीसदी है। अगर नोटा कोई पार्टी होता, तो यह सातवें स्थान पर होता।
नोटा यानी उपर्युक्त उम्मीदवारों में से कोई नहीं की सुविधा भारतीय मतदाताओं को सितंबर, 2013 से उपलब्ध कराई गई है, ताकि वे चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के विकल्प के प्रति अपनी नाराजगी या असंतोष को व्यक्त कर सकें। नोटा का बढ़ता ज्वार राजनीति और उम्मीदवारों की गुणवत्ता के प्रति मतदाताओं के असंतोष और असहमति को दर्शाता है। 2018 में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में इसने अनुमानित रूप से 22 विधानसभा क्षेत्रों में जीत के अंतर को प्रभावित किया।
अब जबकि भारत अगली लोकसभा के लिए मतदान कर रहा है, तो यह पूछना लाजिमी है कि क्या मतदताओं की इस असहमति को राजनीतिक दलों की स्वीकृति या सुधारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। 2019 के लोकसभा चुनाव के उम्मीदवारों के नामांकन पर्चे की समीक्षा करें, तो वह दर्शाता है कि मतदाताओं की नाराजगी की काफी अनदेखी की गई है।
चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक पार्टियां विभिन्न कारकों को चुनती हैं-जाति से लेकर पंथ तक, लोकप्रियता से लेकर वंशावली तक और धन से लेकर बाहुबल तक। पूर्व में किए गए अपराध उनके लिए कोई मायने नहीं रखते। चाहे यह मुंबई हो, नीलगिरी, दाहोद, सिंघभूम या और कहीं, लगता है, नोटा अभी तक राजनीतिक दलों के चुनाव विश्लेषण में कोई कारक नहीं बन सका है।