यही वजह रही कि ग्रामीण क्षेत्रों में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए बेरोजगारी दर में कुछ कमी देखने को मिली है। इसके विपरीत, जुलाई में ही शहरी बेरोजगारी दर में कुछ वृद्धि, शहरों में रोजगार के अवसरों के घटने की ओर इशारा करती है, जो चिंताजनक है। यह असमानता शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच रोजगार के अवसरों में अंतर को रेखांकित करती है और नीतिगत हस्तक्षेप की मांग भी करती है।
मासिक आंकड़े बताते हैं कि जुलाई के दौरान महिलाओं की बेरोजगारी दर में कमी आई है और महिला श्रमबल की हिस्सेदारी बढ़ी है, जो उत्साह बढ़ाने वाला है। गौर करने वाली बात है कि ये आंकड़े वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी, एसएंडपी द्वारा भारत की दीर्घकालिक सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग को ‘बीबीबी माइनस’ से बढ़ाकर ‘बीबीबी’ करने के बाद आए हैं, जो 18 वर्षों में इस तरह की पहली प्रगति है।
एसएंडपी के अनुसार, वित्त वर्ष 2022 और 2024 के बीच हमारी वास्तविक जीडीपी वृद्धि औसतन 8.8 फीसदी रही, जो एशिया-प्रशांत में सबसे अधिक है, और अगले तीन वर्षों में इसके 6.8 फीसदी वार्षिक दर से बढ़ने की उम्मीद है, जिसका फायदा देश के रोजगार परिदृश्य को भी यकीनन मिलेगा। सरकार ने हाल ही में घोषणा की है कि वह अक्तूबर तक वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरों में कटौती करेगी। इससे घरेलू विनिर्माण को तो बढ़ावा मिलेगा ही, रोजगार सृजन भी बढ़ने की उम्मीद है।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विकसित भारत रोजगार योजना की शुरुआत भी देश के रोजगार परिदृश्य के रूपांतरण की क्षमता रखती है, जिसका अगले दो वर्षों में साढ़े तीन करोड़ नौकरियां देने का लक्ष्य है। कुल मिलाकर देखें, तो दूसरी तिमाही के शुरुआती महीने में बेरोजगारी दर में कमी और नई रोजगार योजना का शुभारंभ स्वागतयोग्य है, लेकिन सरकार को कौशल विकास और नवाचार पर आधारित अपनी नीतियों से देश को एक मजबूत व समावेशी रोजगार बाजार की ओर बढ़ाना होगा। फिलहाल इस सकारात्मक गति को बनाए रखने और अर्थव्यवस्था को ऐसा रूप देने की जरूरत है, जिसमें सभी के लिए अवसरों के द्वार खुले हों।