पाकिस्तान में सत्ता का केंद्र कई साल पहले रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय से इस्लामाबाद स्थानांतरित हो चुका है। लोकतंत्र के लंबे दौर में यहां कई सत्ताकेंद्र बन चुके हैं। मसलन, प्रबल रूप से स्वतंत्र प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आज देश में एक बड़ी ताकत है। इसके साथ-साथ बेरोकटोक चलने वाला सोशल मीडिया है।
जब प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सेंशरशिप जैसी स्थिति आती है, तब लोग सोशल मीडिया में खुलकर इसके खिलाफ लिखते हैं। सैन्य प्रतिष्ठान द्वारा ट्विटर और फेसबुक पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश का लोगों ने ऐसा भारी विरोध किया कि सरकार को तुरंत सक्रिय होना पड़ा। यह नहीं भूलना चाहिए कि जब भी किसी तरह का दबाव आया, तब स्वतंत्र न्यायपालिका, संसद और सिविल सोसाइटी एकजुट हो गईं।
यह सत्ता के इन विभिन्न केंद्रों के दबाव का ही नतीजा है कि इस सप्ताह हमने सेना को अपने पहले के रुख से पीछे हटते हुए पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट (पीटीएम) की मांग मानते हुए देखा। दरअसल हजारों पश्तून अपने लोगों का अपहरण कर उनकी हत्या कर देने के निरंकुश तरीके के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। वे सेना को इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं। इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले युवा मंजूर पश्तीन का दावा है कि फाटा और बलूचिस्तान में पाक तालिबान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के दौरान हजारों पश्तूनों को उठा लिया गया, फिर हत्या कर उनकी लाश गायब कर दी गई।
सोशल मीडिया पर हुए प्रचार के कारण पश्तीन की रैलियों में हजारों लोग शामिल हुए। जबकि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को पश्तीन की रैली की कवरेज करने से रोका गया। यह बड़ी बात है कि पीटीएम अपनी कुछ मांगों पर सेना को कायल कराने में सफल हुए। लाहौर की एक रैली में मंजूर पश्तीन ने देश की ताकतवर सेना द्वारा फाटा में चलाए गए अभियानों की तीखी आलोचना की। पाक तालिबान द्वारा फाटा के उत्तर और दक्षिण वजीरिस्तान के कुछ इलाकों पर कब्जा जमा लेने पर 2009 और 2014 में बड़ी सैन्य कार्रवाई हुई।
वजीरिस्तान में अब भी मीडिया की स्वतंत्र रूप से आवाजाही कठिन है। लाहौर के मोची गेट मैदान पर जब पश्तीन की रैली चल रही थी, तब लोगों को तितर-बितर करने के लिए सीवर का पानी छोड़ दिया गया। लेकिन उससे रैली में कोई बाधा नहीं पहुंची और लोग डटे रहे। पीटीएम को पहली सफलता तब मिली, जब कराची में एक बेकसूर पश्तून की हत्या करने के सिलसिले में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार किया गया।
पीटीएम को दूसरी सफलता वजीरिस्तान में मिली। वहां के व्यापारियों ने अपने आर्थिक पुनर्वास, गायब हुए लोगों की वापसी कराने, चुंगी नाकों को हटवाने और बड़े क्षेत्रों में खनन पर रोक लगाने की मांग की थी, जिन पर प्रशासनिक अधिकारी सहमत हो गए हैं। पूरे फाटा में खनन के लिए बिछाए गए आईईडी को बेअसर करने के लिए बयालीस टीमें लगाई गई हैं। खनन बंद करने से संबंधित 64 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। इन सबके बावजूद पाक मीडिया न्यायिक मार्शल लॉ की शिकायत कर रहा है, जिसके तहत उच्च न्यायपालिका और सेना ने हाथ मिला लिए हैं, ताकि नवाज शरीफ को आगामी चुनाव जीतने से और प्रेस को नवाज शरीफ और पीटीएम के विरोध प्रदर्शन को समर्थन देने से रोका जा सके।
ऐसा लगता है कि पाकिस्तान में अघोषित आपातकाल है और प्रिंट तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए दिशानिर्देश जारी किए जा रहे हैं कि क्या छापा और क्या प्रसारित किया जाए। बड़े अखबारों के संपादकीय पृष्ठों पर जिन लेखों में इन दिशानिर्देशों का उल्लंघन दिखाया देता है, दंडित होने के भय से प्रबंधन उन्हें हटा देता है। यह ठीक वैसी ही स्थिति है, जैसी कि जियाउल हक द्वारा लागू किए गए मार्शल लॉ के समय थी।
पाकिस्तान के सबसे लोकप्रिय टीवी चैनल जियो को तब अपना प्रसारण बंद कर देना पड़ा था, जब सरकार ने उसे कहा कि उसने यह दिखाने की अनुमति नहीं दी है। साफ है कि उसके पीछे देश का सैन्य प्रतिष्ठान था और जिसे न्यायपालिका का समर्थन हासिल था। इस तरह का प्रतिबंध इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के नियंत्रक पेमरा के निर्देशों का उल्लंघन तो है ही, यह दबाव कैंटोनमेंट क्षेत्र में ज्यादा दिखता है, जहां काली सूची में डाल दिए गए कई अखबारों को बांटने की अनुमति नहीं है।
दरअसल नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद से हटा देने के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक संकट गहरा गया है। मीडिया का जो हिस्सा नवाज को समर्थन दे रहा है, उसे हतोत्साहित किया जा रहा है। 'पहले हम देखते थे कि लोग गायब हो रहे हैं, लेकिन अब हमारे टीवी चैनल गायब हो रहे हैं,' बाबर सत्तार कहते हैं, जो एक वकील हैं और जियो टीवी पर नियमित रूप से विश्लेषक के तौर पर आते हैं। 'जिस तरह हम लोगों को गायब कर देने के तंत्र से वाकिफ थे, उसी तरह टीवी चैनलों के अचानक गायब हो जाने की वजह भी जानते हैं, लेकिन इस बारे में कुछ कहना दरअसल मुश्किलों को न्योता देने जैसा है', वह कहते हैं।
लोगों का कहना है कि ऐतिहासिक माने जाने वाले आम चुनाव से पहले मीडिया पर दबाव बनाते हुए प्रतिबंध लागू करने से आगामी चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। सैन्य प्रतिष्ठान समझ नहीं पा रहा कि ज्वलंत मुद्दों पर खुली चर्चा और बहस से सत्ता के प्रति भरोसा बढ़ता है।
हम अपने ही इतिहास से यह सबक नहीं ले रहे कि खुली बहस पर प्रतिबंध लगाने से लोगों का गुस्सा और बढ़ेगा ही। जियो के अध्यक्ष इमरान असलम कहते हैं, हम सेना की लाइन का पूरी तरह पालन नहीं करते, लेकिन अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए हमें अपने स्तर पर चीजें सेंसर करनी पड़ती है।
हमारे चैनल को संभवतः इसलिए ब्लैक आउट किया गया कि हम निष्पक्ष चुनाव की वकालत कर रहे थे। एक दूसरे लेखक ने कहा कि पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शनों की वजह लोगों की मुश्किलें हैं, आंदोलनकारियों को बाहर से कोई समर्थन नहीं देता।