यह जनादेश राजनेताओं को अंतर्दृष्टि देता है, तो सवाल भी पूछता है। चुनाव अभियान के दौरान तीन बच्चों की मां ने पूछा, 'क्या मुझे इस तथ्य पर वोट देना चाहिए कि डेढ़ हजार रुपये मेरे खाते में आ रहे हैं, या इस पर कि मेरा बेटा व बेटी दोनों बेरोजगार हैं।' देश की जनता ने एक शानदार फैसला सुनाया है। वर्ष 2004 में चुनावी नतीजों के तुरंत बाद लालकृष्ण आडवाणी ने जनादेश की राज्य के जनादेशों के सामूहिकीकरण के तौर पर परिभाषित किया था। इस तरह से देखें, तो 2024 के चुनावी नतीजे एक तरह से आय के पिरामिड के सबसे निचले स्तर पर स्थित लोगों की, जो सरकारी योजनाओं पर निर्भर भी हैं, गंभीर हताशाओं के समूह भी हैं। भाजपा के नेतृत्व वाले राजग ने कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार किया और कई राज्यों ने भी महिलाओं की आय में मदद करने वाली योजनाएं शुरू कीं। उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम, सबसे बड़ी स्वास्थ्य देखभाल योजना, सबसे बड़ा किसान सहायता कार्यक्रम, सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और सब्सिडी वाली आवास योजना चलाता है।
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल-सबसे ज्यादा सीटों वाले जिन राज्यों के नतीजों में भाजपा की संख्या में गिरावट दिखी, वह दरअसल यहां के उन लोगों की अधूरी इच्छाओं का समूह ही है, जो आजीविका कमाने की अपनी क्षमता में सम्मान और पहचान चाहते हैं। पिछले तीन साल में हुए हर जनमत सर्वे में बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दे को रेखांकित किया गया। भाजपा ने विभिन्न स्रोतों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया और तर्क दिया कि नौकरियां पैदा हो रही हैं। नौकरियां पैदा हो रही हैं, इससे कोई इन्कार नहीं है, लेकिन उसी तरह इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि जो नौकरियां हैं, वे पर्याप्त नहीं हैं। सबसे बुरी बात यह है कि केंद्र व राज्यों में तीस लाख से ज्यादा सरकारी पद खाली हैं, जो बेरोजगारी को लेकर तमाम शिकायतों के बावजूद भरे नहीं गए हैं। आय व रोजगार क्षेत्र की कमजोर वृद्धि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों में भी दिखती है। यह सच है कि भारत दुनिया की पांचवीं सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। यह भी सच है कि इस वृद्धि ने बीते मई में शेयर बाजार को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। लेकिन यह भी सच है कि जब हमारी अर्थव्यवस्था आठ फीसदी से ज्यादा की दर से बढ़ रही है, निजी अंतिम खपत, जो उपभोक्ताओं की उपभोग करने की क्षमता और इच्छा की माप है, महज चार फीसदी की दर से बढ़ रही है।
यह समृद्धि और अभाव के बीच के अंतर का प्रतिबिंब है। भारत के लिए चुनौतियों और अवसरों को रेखांकित करने वाला महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि देश का 45 फीसदी कार्यबल कृषि में लगा है और यह इतनी बड़ी आबादी राष्ट्रीय आय के महज छठे हिस्से पर निर्भर है। यह वास्तविकता राज्यवार वास्तविक प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों में परिलक्षित होती है। तेलंगाना की प्रति व्यक्ति आय तीन लाख रुपये से ज्यादा है, जबकि उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय 80 हजार रुपये से कम, तो बिहार की 55 हजार रुपये से भी कम है। जिलेवार आंकड़ों में यह अंतर अधिक स्पष्ट होता है। बिहार के शिवहर में प्रति व्यक्ति आय 18,692 रुपये है। एक के बाद एक आने वाली सरकारों ने कृषि में संलग्न लोगों को बेहतर आय वाली नौकरियों में स्थानांतरित करने के लिए नौकरियां पैदा करने के पवित्र वादे तो किए, लेकिन वे सभी पूरे नहीं हुए। ऐसे में, ताजा चुनावी नतीजे सरकारों को याद दिलाते हैं कि मतदाता बदलाव के लिए धैर्य रख सकते हैं, लेकिन उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। चुनाव से कुछ समय पहले एक बुजुर्ग की एक टिप्पणी मुझे याद आ रही है। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या '400 पार' की कहानी असली है? उन्होंने जवाब के लिए इंतजार नहीं किया और कहा कि विपक्षी दल इस सरकार को नहीं हरा सकते, लेकिन देश की जनता को हल्के में मत लीजिए, वह सही समय पर बोलेगी।
लोगों ने दरअसल जो दिख रहा था और राजनीतिक दलों की जो मंशा थी, उस पर बात की। दिवंगत अरुण जेटली ने कहा था कि चुनाव केवल 'गणित' नहीं, बल्कि 'केमिस्ट्री' के बारे में भी होते हैं। इस चुनाव में कई राजनीतिक दल केमिस्ट्री को भूलकर जाति और नकद के गणित का सहारा लेने में लगे रहे। फैजाबाद के रूप में भाजपा को वह सीट खोनी पड़ी, जहां अयोध्या स्थित है। यह बताता है कि केवल आस्था नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य की आशा है, जो ईवीएम पर बटन दबाती है। राजनीतिक दलों ने दूसरे दलों व नेताओं के बीच केमिस्ट्री के बारे में बात तो की, लेकिन लोगों के साथ बेहतर केमिस्ट्री बनाने में चूक की। यह जनादेश जनमत की व्यापक लामबंदी और संगठनात्मक ताकत के बारे में भी है। जमीनी स्तर पर राजनीतिक दलों ने चतुर चालें चलों तो गलतियां भी कीं। चुनाव का विश्लेषण होगा, तो जातियों, प्रत्याशियों और साजिशों पर भी बात होगी। लेकिन सबसे ज्यादा मायने रखती है राजनीतिक दलों की अपनी शिकायतें सुनने और उनके समाधान ढूंढने की क्षमता। जनता बड़े-बड़े दावे नहीं सुनना चाहती, वह तो सिर्फ यह चाहती है कि उसकी भी सुनी जाए और यही इस जनादेश का सबसे बड़ा सबक है।