चुनाव आयुक्त ओपी रावत के बयान पर देश में जिस तरह की बहस होनी चाहिए, वैसी नहीं हो रही। उन्होंने जो कुछ कहा है, वह आज का कटु सच है और भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की दृष्टि से उसका निदान किया जाना आवश्यक है। मसलन, उन्होंने कहा है कि राजनीतिक दलों में हर कीमत पर चुनाव जीतने की मंशा होती है, जहां नैतिकता के लिए कोई जगह नहीं होती। उन्होंने यह भी कहा कि जन प्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त को बेहतरीन राजनीतिक प्रबंधन माना जाता है और इस काम में राज्य मशीनरी का भी इस्तेमाल होता है। चुनाव आयोग की दृष्टि से देखें, तो यह बहुत बड़ा बयान है। उसकी भूमिका चुनाव को शांतिपूर्ण एवं निष्पक्ष तरीके से पूरा कराने की है। अपनी इस भूमिका में उसे जो रिपोर्टें मिली हैं, उन सबको ही उसने व्यक्त किया है। पर लगता नहीं कि चुनाव आयुक्त के ऐसे बयान का राजनीतिक दलों ने संज्ञान लिया है। किसी बड़े नेता की इस पर प्रतिक्रिया नहीं आई है। कांग्रेस की ओर से एकाध नेता की प्रतिक्रिया आई भी, तो यह कहते हुए कि हमने गुजरात के बारे में जो कहा, उसे चुनाव आयुक्त ने सही करार दिया है। चुनाव आयुक्त का बयान किसी एक चुनाव और एक दल को लेकर नहीं हो सकता। वास्तव में यह बयान गंभीर आत्ममंथन की मांग करता है।
रावत के बयान के पहले भाग को हम आम चुनाव के संदर्भ में देख सकते हैं। दूसरा भाग राज्यसभा चुनावों के संदर्भ में माना जा सकता है। जन प्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त की कोशिश तो उसी में होती है। राजनीतिक दल किसी कीमत पर चुनाव जीतना चाहते हैं, फिर उसमें नैतिकता के लिए जगह कहां बचती है। जाहिर है, हमारी राजनीति में व्यापक विकृतियां घर कर गई हैं। जब राजनीति जन सेवा की जगह सत्ता, संपत्ति और शक्ति का स्रोत हो जाए, तो उसमें हर वर्ग का आकर्षण होता है। चुनाव में विजय का आधार जाति, संप्रदाय, धन शक्ति और शरीर शक्ति बनने लगी, तो पार्टियों ने वैसे ही उम्मीदवारों का चयन करना शुरू किया, जो इन कसौटियों पर खरे उतरते हों।
हालांकि देश में चुनाव सुधार भी हुए हैं। हमने 1980 के दशक तक बाहुबल और धनबल का जैसा असर चुनावों में देखा है, उससे आज स्थिति काफी बेहतर है। 1991 के बाद से चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियां दिखानी आरंभ की। हम राजनीतिक दलों की आलोचना करते हैं, पर आयोग को यदि इनका समर्थन नहीं मिलता, तो वह बहुत कुछ नहीं कर पाता। चुनाव की आदर्श आचार संहिता पर राजनीतिक दलों ने ही सहमति दी। 2013 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद सजा पाए व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकते। पार्टियां अब ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देने से बचने लगी हैं, जिसे दो वर्ष या उससे अधिक की सजा मिलने की संभावना हो।
किंतु धनपति चुनाव आयोग की सारी व्यवस्थाओं को विफल करने में लगे रहते हैं। रावत के बयान ने सबको झकझोरा है कि हम अपने लोकतंत्र को स्वस्थ बनाएं। केवल चुनाव आयोग के चाहने से ऐसा नहीं होने वाला। हमारे यहां जन प्रतिनिधित्व कानून में वैसी सारी बातें है, जिनमें आप चुनाव में भ्रष्ट आचरण का प्रयोग करते हैं, तो आपका चुनाव रद्द हो सकता है, आपको सजा मिल सकती है। किंतु भ्रष्ट आचरण को पकड़ना और उसे साबित करना कठिन होता है। रावत ने इसे खत्म करने के लिए राजनीतिक दलों, आम नागरिकों और मीडिया का आह्वान किया है। राजनीति की व्यापक सफाई के लिए स्थानीय स्तरों से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर जनांदोलन खड़ा करना होगा।