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ताकि एसआईआर देश भर में सफल हो: चुनाव आयोग को बिहार के अनुभवों से सबक सीखना होगा, सावधानी बरतने की जरूरत

विराग गुप्ता
Updated Sat, 01 Nov 2025 05:06 AM IST

सार

बारह राज्यों में हो रही एसआईआर को विपक्ष शासित केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से चुनौती मिल सकती है। ऐसे में, देश भर में एसआईआर को सफल बनाने के लिए चुनाव आयोग को बिहार के अनुभवों से सबक लेते हुए कुछ मुद्दों पर सावधानी बरतने की जरूरत है। 
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बिहार में चुनाव आयोग ने मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद दूसरे राज्यों का रूख किया (सांकेतिक) - फोटो : एएनआई


एसआईआर के दूसरे चरण में विवादों को कम करने की दिशा में चुनाव आयोग ने चार जरूरी कदम उठाए हैं। पहला-वोटर लिस्ट से डुप्लीकेट नाम हटाने का तकनीकी प्रयोग दूसरे चरण में हो रहा है। इसके लिए सभी राज्यों की वोटर लिस्ट का डाटा मशीन रीडिंग फॉर्मेट में उपलब्ध कराया गया है। इससे मृत वोटर्स, दो स्थानों में रजिस्टर्ड डुप्लीकेट वोटर्स आदि की पहचान और मिलान आसान हो गया है। दूसरा- शुरुआती गणना फार्म के साथ मतदाताओं को कोई दस्तावेज नहीं देना पड़ेगा। 22 साल पहले अधिकांश राज्यों में मतदाता सूची का पुनरीक्षण हुआ था। उस पुरानी वोटर लिस्ट से वर्तमान मतदाताओं की पैतृक मैपिंग की जाएगी। जिनके नाम पुरानी वोटर लिस्ट में हैं, उन्हें अब कोई दस्तावेज नहीं देना होगा। जिनके माता-पिता, दादा-दादी या नामांकित रिश्तेदारों के नाम पुरानी वोटर लिस्ट में हैं, उन्हें पहचान का एक दस्तावेज देना पड़ सकता है। इस बार अधिक से अधिक लोगों का भौतिक सत्यापन होगा, जिससे आम लोगों की दुश्वारियां कम हो सकती हैं। तीसरा-सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आधार को लिखित तौर पर 12 दस्तावेजों में शामिल किया गया है। आधार में लिखे पते और जन्म तिथि की पड़ताल नहीं होती और यह नागरिकता का कानूनी दस्तावेज नहीं है। लेकिन इसे पहचान के प्रमाण के तौर पर कानूनी मान्यता मिलेगी। चौथा, राष्ट्रीय मतदाता केंद्र (एनसीसी) राज्यों के लिए केंद्रीय हेल्पलाइन के तौर पर काम करेगा। मतदाताओं की शिकायतों और शंकाओं के समाधान के लिए 36 राज्य व जिला स्तरीय हेल्पलाइन शुरू की गई हैं। चुनाव आयोग के पोर्टल के माध्यम से मतदाता बूथ स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) से बात करके शिकायत का निवारण कर सकते हैं। बारह राज्यों में हो रही एसआईआर को विपक्ष शासित केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती मिलना लाजिमी है। 


विवादों को सीमित करके देश भर में एसआईआर को सफल बनाने के लिए चुनाव आयोग को इन छह मुद्दों पर सावधानी बरतने की जरूरत है। पहला-प्रधानमंत्री ने घुसपैठ को खतरा बताते हुए उसके खिलाफ उच्चस्तरीय जनसांख्यिकी मिशन का एलान किया है। उसके अनुसार, गृह मंत्रालय ने अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्यवाही से जुड़े कानूनों के अमल में सख्ती बढ़ाई है। चुनाव आयोग को नागरिकता के निर्धारण का अधिकार नहीं है। फिर भी अनुच्छेद-326 के तहत पुरानी मतदाता सूची और 12 सहायक दस्तावेजों के आधार पर नागरिकों के नाम को ही मतदाता सूची में शामिल करना चुनाव आयोग की सांविधानिक जिम्मेदारी है। इसलिए, मतदाता सूची के शुद्धीकरण को घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई के तौर पर पेश करने के नैरेटिव से बचने की जरूरत है।


दूसरा-जनगणना, मतदाता सूची के शुद्धीकरण और जातीय जनगणना जैसे काम राज्य सरकार की मशीनरी से होते हैं। इसमें प्रशासनिक बोझ बढ़ने के साथ बड़े पैमाने पर सरकारी पैसा भी खर्च होता है। एसआईआर के साथ अगले साल 2026 से देश भर में जनगणना का काम भी शुरू हो जाएगा। कनार्टक जैसे कई राज्य जातिगत जनगणना के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं। केंद्र सरकार को राज्यों के साथ मिलकर जनगणना के साथ राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को अपडेट करने के साथ आधार कार्ड के फर्जीवाड़े को दुरुस्त करने का प्रयास करना चाहिए।


तीसरा-बिहार में एसआईआर के बाद 68 लाख से ज्यादा नाम कटे और 21.53 लाख नाम जोड़े गए। कई आलोचक यह सवाल उठा रहे हैं कि बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया में कितने विदेशी लोगों के नाम काटे गए? स्पष्ट जवाब देने के बजाय इस मुद्दे पर चुनाव आयोग ने रणनीतिक चुप्पी साध रखी है। लेकिन विपक्षी दल भी प्रवासी या अल्पसंख्यकों के नाम संगठित तौर पर वोटर लिस्ट से हटाए जाने के आरोपों पर प्रामाणिक आंकड़े नहीं दे पा रहे हैं। प्रशासनिक भ्रष्टाचार और राजनीतिक कारणों से घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट से हटाना मुश्किल है। फिर भी वोटर लिस्ट के शुद्धीकरण को नागरिकता के सत्यापन की चर्चा से चुनाव आयोग को अलग रहने की जरूरत है। चौथा-एनआरसी के तहत सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में असम में 3.3 करोड़ लोगों की नागरिकता साबित करने का बड़ा अभियान चलाया गया था। मूल बजट से पांच गुना ज्यादा 1,600 करोड़ रुपये की लागत वाले उस अभियान के बाद 19 लाख लोगों का नाम सूची से बाहर कर दिया गया। लेकिन लंबी-चौड़ी कवायद के बावजूद किसी की नागरिकता रद्द करने का निर्णायक नतीजा नहीं निकला। इसलिए, एसआईआर के माध्यम से घुसपैठियों की पहचान करना मुश्किल हो सकता है। वैसे भी इस काम के लिए चुनाव आयोग के बजाय केंद्रीय गृह मंत्रालय को कानूनी अधिकार दिए गए हैं। 


पांचवां-घुसपैठियों की संख्या के बारे में सभी पार्टियों की सरकारों के दौरान आंकड़े सामने आए हैं। वर्ष 1997 में गृहमंत्री इंद्रजीत गुप्त (कम्युनिस्ट पार्टी) ने एक करोड़, वर्ष 2001 में भाजपा सरकार के टास्क फोर्स ने 1.5 करोड़, वर्ष 2004 में कांग्रेस सरकार में मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने 1.2 करोड़, वर्ष 2016 में भाजपा सरकार के गृहराज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने दो करोड़ अवैध अप्रवासियों का सरकारी अनुमान दिया था। ऐसे दो करोड़ घुसपैठियों का नाम एसआईआर के बाद नई मतदाता सूची में शामिल नहीं होना चाहिए। छठवां-प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार सान्याल के न्यायपालिका पर बयान के दूसरे पहलू पर चुनाव आयोग प्रभावी तरीके से अमल करे, तो अधिकांश विवाद खत्म हो सकते हैं। सान्याल ने कहा था कि एक फीसदी गलत लोगों पर अंकुश लगाने के लिए 99 फीसदी सही जनता पर सख्त कानून और जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया लागू करना गलत है। इसलिए, घुसपैठियों की पड़ताल के नाम पर करोड़ों अशिक्षित और गरीब लोगों को फार्म भरने और दस्तावेज देने की कठिन प्रक्रिया से बचाने का यत्न होना चाहिए। सिर्फ भारतीय नागरिकों का नाम वोटर लिस्ट में शामिल करने की सांविधानिक जवाबदेही पूरी करने के लिए चुनाव आयोग को संदिग्ध घुसपैठियों की डाटा मैपिंग करने की जरूरत है। 

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